Pratahkal-Soulism and karmaism are the pillars of religion-Gaur Gopal Das
मुंबई । रविवार को नन्दनवन (Nandanvan) परिसर में तीर्थंकर समवसरण में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने कहा कि धर्म व अध्यात्म जगत के लिए आत्मवाद और कर्मवाद मानो आधार स्तम्भ हैं। अध्यात्म का जो जगत है, अध्यात्म की साधना आत्मवाद पर निर्धारित है। आत्मा है तो धर्म और अध्यात्म की साधना का विशेष महत्त्व हो सकता है। आत्मा है ही नहीं, तो अध्यात्म और धर्म का विशेष मूल्य नहीं रह जाता। आत्मा शाश्वत है, इसलिए आत्मा की निर्मलता व सुख-शांति के लिए धर्म-अध्यात्म की साधना होती है। इन्द्रियों से ग्राह्य और भौतिक पदार्थों से प्राप्त सुख क्षणिक होता है, किन्तु कर्म की निर्जरा, साधना, ध्यान, जप योग से प्राप्त होने वाला आत्मिक सुख वास्तविक और स्थाई होता है। इसलिए आदमी को स्थाई सुख की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। निर्मल व शुद्ध आत्मा मोक्ष का भी वरण कर सकती है। आचार्यश्री के प्रवचन से पूर्व साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा ने उपस्थित जनता को उद्बोधित किया।
प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने 12 सितम्बर से आरम्भ होने जा रहे पर्यूषण महापर्व के संदर्भ में कहा कि आठ दिनों का यह पर्व धर्म की साधना में लगाने वाले दिन हैं। सांसारिक कार्यों को थोड़ा गौण कर धर्म की प्रभावना करने का प्रयास करना चाहिए। व्रत, उपवास व त्याग में एक त्याग व उपवास डिजिटल उपकरणों का भी हो। इस प्रकार अपने जीवन को धर्म के आचरण से युक्त बनाने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवास व्यवस्था समिति द्वारा आचार्यश्री के सानिध्य में ट्रान्सफायर कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम के निदेशक दिलीप सरावगी ने विचार रखे। श्वेता लोढ़ा ने मोतीलाल ओसवाल का परिचय दिया। ओसवाल ने कहा कि मेरा सौभाग्य है कि मुझे आचार्य महाश्रमण सन्निधि प्राप्त हुई।
इस्कॉन (Iskcon) के संत गौर गोपालदास (Gaur Gopal Das) महाराज पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि भौतिकता के दौड़ में इतने लोग आचार्य महाश्रमण की सन्निधि में आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए पहुंचे हैं। आदमी अपने विचारों की दिशा सही रखे तो सही दिशा में तरक्की भी हो सकती है। परिस्थितियों से पार पाने के लिए मनःस्थिति को अच्छा बनाना होगा।
Editorial

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