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संजय गुप्त । भारत (India) ने अपनी अध्यक्षता में जी-20 भारत शिखर सम्मेलन (G-20 India Summit) के रूप में सबसे बड़ा कूटनीतिक आयोजन सफलतापूर्वक आयोजित किया । इस भव्य आयोजन के चलते समस्त विश्व की नजर भारत की ओर है। भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता हासिल करने के बाद जिस तरह देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक विषयों पर तमाम बैठकें आयोजित कीं, उनसे यही प्रकट हुआ कि वह सबको साथ लेकर वैश्विक समस्याओं का समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसीलिए उसने जी-20 शिखर सम्मेलन की थीम 'वसुधैव कुटुंबकम' रखी और 'एक पृथ्वी, एक कुटुंब, एक भविष्य' को आदर्श वाक्य बनाया। इसके माध्यम से उसने यही संदेश दिया कि वह विश्व कल्याण के लिए तत्पर है।
जी-20 शिखर सम्मेलन के पहले जो अनेक बैठकें हुईं, उनसे भारत विश्व को अपनी सांस्कृतिक विरासत और विविधता से परिचित कराने में सफल रहा। इस आयोजन के लिए दिल्ली का जो कायाकल्प हुआ, वह भी चमत्कृत करने वाला है। जी-20 शिखर सम्मेलन जिस स्थल यानी भारत मंडपम में हो रहा है, वहां भी भारत की सांस्कृतिक छटा का भव्य प्रदर्शन हो रहा है।
उल्लेखनीय यह भी रहा कि देश ने जी- 20 शिखर सम्मेलन में स्वयं को भारत के रूप में प्रस्तुत किया, न कि इंडिया के रूप में। न केवल राष्ट्रपति के निमंत्रण पत्र में भारत शब्द का उपयोग हुआ, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के सामने रखी पट्टिका में भी । इससे दुनिया को यही बताया गया कि इस देश की सांस्कृतिक पहचान भारत के रूप में भी है और वह एक प्राचीन एवं समृद्ध विरासत का प्रतिनिधि है विपक्ष ने इस मामले में नुक्ताचीनी कर अपनी मुश्किल बढ़ाने का ही काम किया।
जी-20 शिखर सम्मेलन में इस समूह के सभी देशों के नेताओं के अतिरिक्त एक दर्जन से अधिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुख भी हिस्सा ले रहे हैं। भारत ने इस सम्मेलन में 9 मित्र देशों को मेहमान के रूप में आमंत्रित किया है। भारत ने अफ्रीकी यूनियन को इस समूह का सदस्य बनाने की जो पहल की, वह सफल रही। अफ्रीकी देशों के इस संगठन को जी-20 का सदस्य बनाने में भारत को जो सफलता मिली, उससे वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में इन देशों का समर्थन हासिल करने और वहां अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल होगा। यह बड़ी बात है कि भारत जी-20 को जी - 21 का रूप देने में समर्थ रहा। भारत ने ग्लोबल साउथ यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के हितों का भी ध्यान रखने का मुद्दा उठाकर यह स्पष्ट किया कि वह वैश्विक व्यवस्था में सभी के हितों की रक्षा का हामी है।
जी 20 की स्थापना 1999 में की गई थी। विकसित और प्रमुख विकासशील देश इस संगठन का हिस्सा बने। इसमें 19 देश हैं और 20 वें सदस्य के रूप में यूरोपीय यूनियन है। प्रारंभ में इस संगठन का उद्देश्य विश्व में आर्थिक वित्तीय स्थिरता स्थापित करना था।धीरे-धीरे उसके उद्देश्यों में जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, कृषि, ऊर्जा, स्वास्थ्य जैसे विषय शामिल होते गए। भारत की इस संगठन में महत्ता तबसे बढ़नी शुरू हुई, जबसे उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। हाल के वर्षों में जी-20 के जो शिखर सम्मेलन हुए, उनमें प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में इसलिए सफल रहा, क्योंकि उसने निर्धनता निवारण का बड़ा काम करने के साथ डिजिटल क्रांति को एक नया आयाम दिया।
आज भारत में जिस बड़े पैमाने पर डिजिटल लेन-देन हो रहा है, उससे उन्नत देश भी चकित हैं। भारत की डिजिटल क्रांति की प्रशंसा विश्व बैंक सरीखी संस्थाएं भी कर चुकी हैं। भारत ने वित्तीय समावेशन का जो उदाहरण पेश किया, वह भी विश्व के लिए अनुकरणीय है। आज पूरी दुनिया में भारत के यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआइ की चर्चा है। विश्व के कई देश इस व्यवस्था को अपनाना चाहते हैं।
भारत का महत्व बढ़ने का एक कारण यह भी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी के नेतृत्व में देश ने अपनी कूटनीतिक क्षमता को धार देना शुरू किया। मोदी सरकार ने कोविड काल में जिस तरह अनेक देशों की मदद की, उससे भी विश्व को यह संदेश गया कि भारत की सामर्थ्य बढ़ गई है। यूक्रेन संकट पर भारत जिस प्रकार अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहा, उससे सभी देश और यहां तक असहमत देश भी प्रभावित हुए और उन्होंने यह समझ लिया कि भारत को दबाव में नहीं लिया जा सकता। भारत की बढ़ती अहमियत का पता इससे भी चलता है कि जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन समेत 15 देशों के नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिल्ली आकर सबसे पहले भारतीय प्रधानमंत्री से द्विपक्षीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विस्तार से चर्चा की। यह भारत के बढ़ते रूतबे को दर्शाता है। यह ठीक है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन दिल्ली नहीं आए, लेकिन यूक्रेन युद्ध के कारण उनके न आने की आशंका पहले से थी। इसके विपरीत चीनी राष्ट्रपति का भारत न आना रहस्यमय है। शायद वह भारत के बढ़ते कद से परेशान हैं और इसीलिए नई दिल्ली आने से कन्नी काट गए। इसके बाद भी भारतीय प्रधानमंत्री जिस तरह सभी देशों में सहमति कायम करने में सफल रहे, वह बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह माना जा रहा था कि खेमों में बंटे देश और खासकर रूस और चीन के रवैये के चलते साझा घोषणापत्र पर सहमति बना पाना कठिन होगा, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने एक तरह से असंभव को संभव कर दिखाया। दिल्ली घोषणा पत्र पर सभी देशों की सहमति भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।
प्र.म. मोदी (P.M. Modi) ने विषम परिस्थितियों में जी- 20 देशों के बीच सहमति कायम कर यह साबित किया कि वह एक ऐसे नेता हैं, जो विश्व को दिशा देने में सक्षम हैं। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि वह मतभेदों के बीच सहमति की राह निकालने में दक्ष हैं। यह तय है कि अब प्रधानमंत्री के रूप में मोदी एवं भारत का कद और बढ़ेगा। इसका एक कारण यह भी है कि भारत शीघ्र ही तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी न केवल इसके प्रति संकल्पित हैं कि भारत जल्द तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बने, बल्कि इसके लिए भी कि अमृतकाल में इतनी तेजी से प्रगति हो कि 2047 तक देश एक महाशक्ति बन जाए।
Editorial

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