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अलास्का जहाज यात्रा 17 : अविस्मरणीय रहेगा ग्लेशियर पर उतरने का आनन्द
By EditorialPublished on
एक के बाद एक सभी हेलीकोप्टर उपर उठ गये। एक साथ हवा में उड़ते ये हाल लाल हेलीकोप्टर ऐसा दृश्य उपस्थित कर रहे थे जैसा अक्सर टी.वी. पर वायुसेना के विमानों के करतबों के दौरान दिखाई देता है। उपर उठते ही जूनू के पहाड़ झीलें और समुद्र का अदभुत नजारा हमारे समक्ष था। शीघ्र ही अन्य चोपर ओझल हो गये। हमारे चोपर ने भी अर्ध गोलाकार मोड़ लिया और अचानक हम धवल सतह के उपर उड़ने लगे। आकाश में विमान उड़ते हैं तो कई बार नीचे बादलों की भैया नजर आती है मगर यह दृश्य तो एकदम अलग था। न कोई हरियाली, न पहाड़, न पानी - नीचे एकदम सपाट स

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एक के बाद एक सभी हेलीकोप्टर उपर उठ गये। एक साथ हवा में उड़ते ये हाल लाल हेलीकोप्टर ऐसा दृश्य उपस्थित कर रहे थे जैसा अक्सर टी.वी. पर वायुसेना के विमानों के करतबों के दौरान दिखाई देता है। उपर उठते ही जूनू के पहाड़ झीलें और समुद्र का अदभुत नजारा हमारे समक्ष था। शीघ्र ही अन्य चोपर ओझल हो गये। हमारे चोपर ने भी अर्ध गोलाकार मोड़ लिया और अचानक हम धवल सतह के उपर उड़ने लगे। आकाश में विमान उड़ते हैं तो कई बार नीचे बादलों की भैया नजर आती है मगर यह दृश्य तो एकदम अलग था। न कोई हरियाली, न पहाड़, न पानी - नीचे एकदम सपाट सफेद भूमि थी। हेलीकोप्टर ज्यू ज्यूं इस भूमि के उपर उठता गया तो प्रतीत हुआ यह कोई भूमि नहीं मगर एसी वस्तु है जैसे किसी नदी का पाट, सिर्फ इस नदी में पानी नहीं था और जो श्वेत धरातल नजर आ रहा था वह जमा हुआ बर्फ था। वास्तव में यही मेन्डेनहाल ग्लेशियर था। जीवन में पहली बार किसी ग्लेशियर को देख कर रोमांचित हो गया।
चोपर के पंखों का शोर नियमित हो रहा था, एसे में आपस में बात करना संभव नहीं था, मैंने अपनी मुखमुद्रा और हाव भावों से अपने साथियों को मेरे उल्लास का आभास कराया। सभी प्रकृति के इस अजूबे को देख मंत्र मुग्ध थे। स्कूल में पढ़ता था जब पहली बार ग्लेशियर नाम सुना था। हमारी पुस्तक में पिण्डारी ग्लेशियर पर एक पाठ था। तब पढा था कि ग्लेशियर बर्फ की नदी होती है, तब से लेकर आज तक यही जानकारी थी मगर कभी इसके वास्तविक स्वरूप की कल्पना नहीं की थी। फिल्मों वगैरा में कभी कोई दृश्य देखा भी हो तो उस पर ध्यान नहीं दिया। आज उन पढी-सुनी बातों का साक्षात रूप मेरे सामने था तो में हम था।
हेलीकोप्टर उड़ता रहा, मीलों तक इस श्वेत द्रव्य से परिपूर्ण हिमनद का छोर नजर नहीं आ रहा था, इसके दोनों तरफ काले काले से पहाड़ थे ऐसा लगता था जैसे इन पहाड़ों को चीर कर कोई नदी निकल रही है। चोपर ने एक नीची उड़ान भरी और इस हिमनद को निकट से देखने का अवसर मिला बर्फ सफेद तो था ही - कहीं कहीं यह नीला भी था जिससे इसकी सुन्दरता और बढ़ गई थी। अब चोपर ने वह हिस्सा भी दिखाया जहां ग्लेशियर समुद्र में विलीन हो रहा था। उड़न खटोला फिर उपर उठ गया और अब हमें एक सपाट स्थान की तरफ ले गया। यहाँ कुछ। लोग नजर आये, हेलीकोप्टर भी नजर आये। ये सब वे थे जिन्होंने हमारे साथ ही उड़ान भरी थी। कुछ पहले से आये यात्री भी थे।
हमारा हेलीकोप्टर भी इन्हीं के पास उतर गया। इसके रुकते ही एक लड़की चोपर के पास आई। दरवाजा खोल कर हमें नीचे उतरने में मदद करने लगी। ज्यू ही दरवाजा खुला तीखी हवा का एसा हमला हुआ कि सारा शरीर सिहर गया। सीट बेल्ट खोल, हेड फोन उतार एक एक करके हम सब नीचे उतरे। अब तक उपर से जिस बर्फ को देख कर रोमांचित हुए जा रहे थे, उसी बर्फ पर हमने अपने पांव रखे यह अनुभूति आजीवन अविस्मरणीय रहेगी। कुछ ही पलों में हम सब लोग ग्लेशियर के उपर खड़े थे।
जो हेलीकोप्टर हमें लेकर आये थे उनमें अब हमसे पहले आये यात्री बैठने लगे। हमें उतारने वाली लड़की ही अब इन्हें बिठाने में मदद कर रही थी। हमने ग्लेशियर पर चहलकदमी की जितने तो ये हेलीकोप्टर वापसी की उड़ान भर गये। यही हेलीकोप्टर वापस नये यात्रियों को लायेंगे और हमें लेकर जायेंगे। दिन भर यही सिलसिला चलता रहता है। प्रत्येक हेलीकोप्टर 10-12 उड़ानें भर लेता है।
ग्लेशियर पर जबर्दस्त ठंड थी। जेकेट के गर्दन तक बटन लगाने, टोपा ग्लव, मफलर सब शरीर पर डाल लेने के बावजूद असहनीय ठंड लग रही थी। हवा इतनी तीखी और ठंडी थी कि एसा प्रतीत होता था जैसे किसी घातक हथियार से शरीर पर प्रहार हो रहा है।
हमारे हेलीकोप्टरों के दल से उतरे तमाम यात्रियों को एकत्र कर यहां उपस्थित एक महिला गाईड ने ग्लेशियर के बारे में जानकारी देना शुरू किया । उसने कि हम इस समय (-) 10 डि.से के तापमान में खड़े हैं। उपर सूरज तेजी से चमक रहा था, वरना यह तापमान और भी कम हो जाता है।
जिस बर्फ पर हम खड़े थे उसे गौर से देखा तो उसमें नीली नीली झांई के दर्शन हुए। बर्फ कहीं नीला, कहीं पारदर्शी तो कहीं सफेद था। पारदर्शी बर्फ ही कहीं कहीं से नीला नजर आ रहा था। गाईड ने बताया कि यह नीला बर्फ अत्यन्त पुराना है जबकि सफेद बर्फ नया है। नया बर्फ जब जमते जमते पुराना हो जाता है तो पारदर्शी नीला रूप ले लेता है
हमें जिस जगह पर उतारा गया था यह समतल हिस्सा था। शायद पर्यटकों की सुविधा के लिये ही इस स्थान का चयन किया गया था। यहीं एक टेन्ट भी लगा हुआ था। टेन्ट देखकर हमें अचरज हुआ कि इतने न्यूनतम तापमान में यहां टेन्ट लगा कर कौन रहता होगा तब हमें बताया गया कि पर्यटक तो आते हैं और चले जाते हैं मगर हम लोगों को तो दिन भर यहीं रहना पड़ता है। वाकई जब हमारे लिये यहाँ 20 मिनट भी रूकना भारी पड़ रहा था तो ये लोग कैसे रहते होंगे। टेन्ट में हीटर वगैरा की सुविधा के कारण यहां रहने वाले बारी बारी से अपने आप को गर्म रखते हैं।
शेष ग्लेशियर का हिस्सा इतना सपाट नहीं था। दिनभर लोगों की आवाजाही लगी रहने से यहां जगह जगह बर्फ नरम भी पड़ गया था और पिघल भी रहा था। ग्लेशियर पर एक दरार भी नजर आई। यह डेढ से दो फुट चौड़ी और अत्यन्त गहरी खाई सी थी, इसके बीच से ग्लेशियर का पिघलता हुआ पानी रिस रिस कर बह रहा था। इस दरार की खाई गहरी नीली नजर आ रही थी, यह एसा अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर रही थी कि सभी इसके साथ सेल्फी और फोटो लेने में लग गये गाईड सभी को इस दरार से दूर रहने के लिये कह रही थी मगर कोई मान नहीं रहा था। राजा ने तो इसके उपर से ही छलांग लगा ली।
चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आ रही थी, यहां से उपर और बर्फ के पहाड़ थे जहां जाने की अनुमति नहीं थी। पर्यटन कम्पनियों को यहां भी टूर संचालित करने के लिये विशेष लाइसेन्स लेने पड़ते हैं और पर्यटकों को इसी स्थान तक ही ले जा सकते हैं।
कई यात्री गाईड का साथ छोड़ अपने आप पहाड़ की तरफ जाने लगे तो गाईड ने उन्हें रोक दिया। पास ही एक और स्थान पर दरार नजर आई। यह कम चौड़ी थी, मगर यहां पिघलता पानी तेजी से बह रहा था। हमें यहां आये 10 मिनट हो चुके थे, अभी 10 मिनट और रूकना बाकी था मगर मेरे लिये तो यहां एक पल और रूकना भी मुश्किल हो रहा था। 10 मिनट कैसे निकलेंगे मगर कोई चारा भी नहीं था, नीचे से यात्रियों को लेकर हेलीकोप्टर आयेंगे तभी तो वापस जा पायेंगे।
राजा मेरी मजाक उड़ाने लगा, इतने पैसे खर्च कर यहां आये हैं तो थोड़ा तो इसका आनन्द लो में उसे क्या कहता, आनन्द तो ले ही रहे थे मगर ठण्ड इतनी लग रही थी तो क्या करता। मैं क्या सभी ठिठुर रहे थे। इस बीच सभी लोग उस दरार से चुल्लु में लेकर पानी पीने लगे। प्रीति ने भी पानी पिया तो उसने मुझे भी पीने को कहा। मैंने भी झुक कर अपने चुल्लू में पानी लिया और पिया तो ऐसा लगा जैसे अमृत पी रहे हों। इतना मीठा और इतना शुद्ध पानी एकदम अमृत तुल्य ही हो सकता है। इस पानी की भी अजीब दास्तां है, समुद्र में विलीन होने के पूर्व यह न जाने कितनी बार जम कर बर्फ बन जाता है और कितनी बार पानी कोई नहीं कह सकता।

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