Pratahkal-Try to give proper respect to elders-Acharya Mahashraman
मुंबई । गुरुवार को आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने तीर्थंकर समवसरण में भगवती सूत्र के माध्यम से पाथेय प्रदान करते कहा कि अपनों से बड़े, प्रिय और मेहमान के प्रति प्रियता, विनय और सम्मान का भाव रखा जाता है। क्या ऐसा व्यवहार नारकीय जीवों में भी होता है? भगवान महावीर ने कहा नहीं, यह व्यवहार देवों और मनुष्यों में ही होता है। थोड़ा-थोड़ा व्यवहार तीर्यंचों में भी होता है। मानव जीवन में परस्पर व्यवहार-सम्मान की बात होती है। अपने से बड़ों के आने पर उचित सम्मान करना, आगे तक पहुंचकर उन्हें आदर सहित ले आना और जाने पर कुछ दूर जाकर उन्हें विदा करने, उनके उचित मान-सम्मान का ध्यान रखने और अनुकूल व्यवहार करने की परंपरा भी है। यह शिष्टाचार भी होता है। अपने से बड़े अर्थात् माता, पिता, गुरु अथवा प्रियजनों के प्रति उचित सम्मान, आदर का भाव होना चाहिए। संत परंपरा में भी परस्पर विनय, प्रणाम, वंदन, सम्मान आदि का क्रम चलता है। जब बड़े संत बाहर से आ रहे होते हैं तो उनके आगे पहुंचकर उनको वंदन करना, उनके बोझ आदि को लेने की परंपरा है। जब विदाई होती है तो उन्हें दूर तक छोड़ने की परंपरा है। मिलने पर एक परस्पर प्रेम, विनय, सम्मान, आदर का भाव होता है। उसी प्रकार सामान्य मनुष्यों के जीवन में भी शिष्टाचार व सम्मान की बात होती है। अपने से बड़ों को समुचित सम्मान देने का प्रयास करना चाहिए।
Editorial

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