Pratahkal-Acharya Mahashraman-Speed ​​is achieved automatically on the basis of deeds
मुम्बई । तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) के आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने मंगलवार को अपने प्रवचन में कहा कि भगवान पार्श्वनाथ के समय के मुनि गांगेय चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर (Bhagwan Mahavir) के पास आते हैं और उन्होंने भगवान महावीर से प्रश्न किया कि जो जीव नरक में पैदा होते हैं, वे वहां स्वतः पैदा होते हैं अथवा कोई शक्ति होती है, जो उन्हें वहां पैदा होने के लिए भेजती है।
भगवान महावीर ने इसका उत्तर देते हुए कहा कि जीव मरने के बाद किस गति में जाएगा, यह उसके द्वारा किए गए कर्मों के आधार पर आत्मा स्वतः उस गति में चली जाती है, उसे वहां भेजने के लिए कोई और शक्ति नहीं होती है। जैन दर्शन में कर्म को ही गति प्रदान करने का मुख्य कर्ता माना गया है। जो प्राणी जैसा कर्म करेगा, उसके आधार पर वह ऊर्ध्वगति अथवा अधोगति में चला जाता है। कर्मों के बंध और उदय तथा कर्मों की गुरुता के कारण आत्मा स्वतः नरक अथवा स्वर्ग की ओर गति करती है। देव गति अथवा आगे की गति के लिए शुभ कर्म का उदय और अधोगति अथवा नरक गति की प्राप्ति के अशुभ कर्मों का उदय कारण बनता है। इसलिए आदमी को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। कर्मों में निर्मलता है, सरलता है, सुहृदयता है तो गति अच्छी हो सकती है और छल, कपट, झूठ, हिंसा आदि के कारण अधोगति की प्राप्ति हो सकती है। इसके बाद उन्होंने आचार्य कालूगणी की मालवा प्रदेश की यात्रा का वर्णन किया।

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