✕
सांप्रदायिक हिंसा का भयावह सिलसिला
By EditorialPublished on
हरियाणा के नूंह में पिछले दिनों हिंदू संगठनों की जलाभिषेक यात्रा पर सुनियोजित तरीके से मुस्लिम समुदाय की एक उन्मादी भीड़ के हमले के बाद भड़की हिंसा में 6 लोगों की मौत ने केवल सांप्रदायिक तनाव के दुष्परिणाम ही उजागर नहीं किए, बल्कि इसकी लपटें जिस तरह पड़ोसी जिलों और उत्तर भारत के एक प्रमुख आईटी केंद्र गुरूग्राम तक पहुंच गईं, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खराब संदेश गया।

x

संजय गुप्त
हरियाणा के नूंह में पिछले दिनों हिंदू संगठनों की जलाभिषेक यात्रा पर सुनियोजित तरीके से मुस्लिम समुदाय की एक उन्मादी भीड़ के हमले के बाद भड़की हिंसा में 6 लोगों की मौत ने केवल सांप्रदायिक तनाव के दुष्परिणाम ही उजागर नहीं किए, बल्कि इसकी लपटें जिस तरह पड़ोसी जिलों और उत्तर भारत के एक प्रमुख आईटी केंद्र गुरूग्राम तक पहुंच गईं, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खराब संदेश गया।
भारत सरीखे तेजी से उभरते देश में हिंसा की ऐसी घटनाओं के लिए कहीं कोई जगह नहीं हो सकती, जो स्पष्ट तौर पर विधि के शासन को चुनौती देने वाली हों। वैसे भी सभ्य समाज में ऐसी घटनाओं को न तो सहन किया जा सकता है और न ही उनकी अनदेखी की जा सकती है। यह गंभीर चिंता का विषय है कि देश में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक तनाव के कारण हिंसक घटनाओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इन घटनाओं में लिप्त तत्वों के दुस्साहस पर लगाम न लग पाने के कारण ही जब- तब सद्भाव का वातावरण प्रभावित होता रहता है। स्वतंत्रता के पहले से कट्टरपंथी सोच के कारण हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास की जो भावना उपजी, उसने न केवल दोनों समुदायों के कुछ वर्गों में एक-दूसरे के प्रति घृणा और वैमनस्य की भावना भर दी, बल्कि उसकी परिणति देश के विभाजन के रूप में सामने आई। विभाजन की इस आग में दोनों समुदाय अभी भी जल रहे हैं। वोट बैंक की राजनीति ने इस आग को भड़काया है। देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने मुस्लिमों के बीच बार-बार यह झूठ प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि हिंदू उनका हक छीन रहे हैं।
दुर्भाग्य से मुस्लिम समुदाय के भीतर से भी ऐसी आवाजें नहीं उभरीं जो इस दुष्प्रचार के प्रति अपने लोगों को आगाह करतीं । उलटे मुस्लिम बुद्धिजीवियों और नेताओं ने भी वोट बैंक की राजनीति वाले तौर-तरीकों को ही बढ़ावा दिया। यही कारण है कि मुस्लिम समुदाय ने उन दलों को ही अपना हितैषी माना जो उनके भय को बढ़ाकर उनसे हमदर्दी दिखाने का दिखावा करते रहे हैं। यही मुस्लिम तुष्टीकरण का आधार बना। मुस्लिम समुदाय को लेकर लगातार हो रही ऐसी संकीर्ण राजनीति के चलते ही सद्भाव का ऐसा वातावरण कायम नहीं हो पा रहा है जो तनाव की घटनाओं को बड़ा और गंभीर रूप लेने से रोके।
नूंह की घटना के संदर्भ में यह किसी से छिपा नहीं कि सबसे अधिक हिंसा उस स्थान पर हुई जो मुस्लिम बहुल है। यहां हिंदू संगठनों की ओर से प्रति वर्ष निकाली जाने वाली यात्रा पर जिस तरह पत्थरबाजी की गई और यहां तक कि गोलियां और बम भी चलाए गए, उससे साफ हो गया कि हमला पूरी तैयारी के साथ किया गया। यह हमला इस अफवाह के आधार पर किया गया कि इस यात्रा में संदिग्ध गोतस्करों की हत्या में शामिल बजरंग दल का एक कार्यकर्ता शामिल हो रहा है। कोई भी समझ सकता है कि अनुमति के उपरांत एक तय मार्ग से निकल रही यात्रा पर हमले का यह एक बहाना भर था। इस हमले के बाद हिंदू समुदाय के लोगों ने भी जिस तरह अपना आपा खोकर हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया, उन्हें किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। हरियाणा में हुई हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकारों को भड़काऊ भाषणों पर रोक लगाने और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती के निर्देश दिए, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उसकी ओर से पहले भी ऐसे निर्देश दिए जाते रहे हैं। कभी-कभी तो उच्चतम न्यायालय की ओर से शासन-प्रशासन पर सख्त टिप्पणियां भी की जाती हैं, लेकिन जमीनी धरातल पर सुधार के संकेत नजर नहीं आते। यह संकेत तब तक नहीं उभरेंगे जब तक आंतरिक सुरक्षा को लेकर राज्यों की पुलिस और खुफिया तंत्र का रवैया नहीं बदलेगा इसके लिए पुलिस को किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर पेशेवर तरीके से काम करना होगा। हरियाणा की घटनाओं के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उपद्रवियों की पहचान करने के लिए उनकी रिकार्डिंग सुरक्षित रखी जाएं। नूंह की घटना ने यह साबित कर दिया है कि यह पहल शायद ही सफल हो, क्योंकि यहां भीड़ ने जब थाने पर हमला बोला तो वहां के सारे कैमरे भी तोड़ दिए। हमलावर नकाब भी लगाए थे। स्पष्ट है कि इस पर यकीन नहीं किया जा सकता कि केवल कैमरे लगा देने से उपद्रवी तत्व हतोत्साहित हो जाएंगे। पिछले कुछ समय से नूंह और मेवात का क्षेत्र साइबर अपराध के लिए कुख्यात हो रहा है। ऐसे संकेत हैं कि साइबर अपराध में शामिल तत्वों ने थाने को घेरकर आग लगा दी। यह दंगे की आड़ में किया गया जघन्य अपराध है। यह आश्चर्यजनक है कि पुलिस और खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी कि इस यात्रा को निशाना बनाया जा सकता है और सैंकड़ों लोग हथियारों के साथ एकत्र हो रहे हैं। यह उनकी चूक नहीं, बल्कि असफलता की पराकाष्ठा है। यह चिंताजनक है कि जब हिंसक घटनाएं बेकाबू हो गईं तो उन्हें रोकने के लिए पुलिस के पास संसाधनों का अभाव भी दिखा। पुलिस और खुफिया तंत्र की इस कमजोरी ने नूंह- मेवात सरीखे क्षेत्रों में कट्टरपंथियों से निपटने के लिए हरियाणा सरकार के तौर-तरीकों पर भी सवाल खड़े किए हैं।
यह ठीक है कि उपद्रवियों की गिरफ्तारी के बाद अब उनके ठिकानों पर कार्रवाई शुरू की गई है। इसके तहत हिंसा में शामिल रोहिंग्याओं के अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाया गया है, लेकिन यह काम तो तभी किया जाना चाहिए था जब ये निर्माण किए जा रहे थे उचित यह होगा कि हरियाणा सरकार अपने पुलिस और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से ध्यान दे ।
हाल के वर्षों में धार्मिक आयोजनों, खासकर शोभायात्राओं पर हमले की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इसके पीछे भड़काऊ भाषणों को मुख्य कारण बताया जाता है, लेकिन उन्हें रोकने के लिए जिन प्रयासों की आवश्यकता है, वैसा कुछ होता हुआ नजर नहीं आता। उलटे भड़काऊ भाषणों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उचित ठहराने की कोशिश की जाती है और कभी इसे किसी घटना की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताने की चेष्टा होती है । प्रायः भड़काऊ भाषण सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक लाभ लेने की प्रवृत्ति का परिणाम होते हैं । इन पर अंकुश तभी लगेगा जब सभी दल अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और समाज अपने नैतिक तथा नागरिक दायित्वों के प्रति सजग - सचेत होगा।

Editorial
Next Story
Related News
X
