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तालिबान से परेशान पाकिस्तान
By EditorialPublished on
आप कोई अखबार उठाएं टेलीविजन या रेडियो ऑन करें और दुनिया भर में कहीं से भी किसी अच्छी खबर से आपका सामना हो जाए, इसका यकीन न के बराबर है। क्या करें, अब यही जिंदगी है और हम इसके आदी हो चुके हैं। लेकिन इस हफ्ते पाकिस्तान से एक अच्छी खबर सुनने को मिली।

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मरिआना बाबर
आप कोई अखबार उठाएं टेलीविजन या रेडियो ऑन करें और दुनिया भर में कहीं से भी किसी अच्छी खबर से आपका सामना हो जाए, इसका यकीन न के बराबर है। क्या करें, अब यही जिंदगी है और हम इसके आदी हो चुके हैं। लेकिन इस हफ्ते पाकिस्तान से एक अच्छी खबर सुनने को मिली। खबर दो बेमिसाल पाकिस्तानी महिलाओं के बारे में थी, जो हाल में सुर्खियों में रही थीं। इनमें से पहली थीं सायरा पीटर, जो एक पाकिस्तानी सूफी ओपेरा गायिका हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह दुनिया की पहली सूफी ओपेरा गायिका हैं और अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, उर्दू, सिंधी, सराइकी, तमिल और दूसरी कई भाषाओं में गाकर दर्शकों का दिल जीत चुकी हैं। हाल ही में, उन्होंने अपनी एक फ्यूजन कव्वाली रबीम वेर के बारे में बात की, जो मौलाना जलालुद्दीन रूमी की मसनवी पर आधारित है। कव्वाली की दुनिया में वैसे तो अब भी दक्षिण एशिया में पुरूषों का दबदबा कायम है, मगर सायरा कहती हैं कि इसमें एक सामाजिक छूट मौजूद है, जो कि महिलाओं के स्वतंत्रतापूर्वक काम करने के लिए जरूरी भी है। अब महिलाओं को इस क्षेत्र में उनकी कोशिशों बदले काफी इज्जत मिल रही है। उनके मुताबिक, कला कोई भी हो, वह बदलाव के एक सफर पर होती है और दुनिया जिस तरह से बदल रही होती है, उसके मुताबिक वह भी नए आकार लेती है। अब जरा दूसरी खबर पर नजर डालते हैं। 8,000 फीट की ऊंचाई वाली ब्रॉड पीक दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में शुमार है। यह बाल्टिस्तान में पाकिस्तान और चीन की सीमा पर काराकोरम रेंज में स्थित है। इस चोटी पर पहुंचकर नैला कियानी ब्रॉड पीक पर चढ़ने वाली पहली पाकिस्तानी महिला बन गई हैं। इसके साथ ही उन्होंने दुनिया भर में 8,000 मीटर से ज्यादा ऊंची कुल आठ चोटियों को भी फतह करने का रिकॉर्ड बनाया है। इसके पहले वह विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर भी अपने मुल्क का झंडा फहरा चुकी हैं। रावलपिंडी की रहने वाली नैला कियानी बताती हैं कि पर्वतारोहण की कोई पृष्ठभूमि न होने के बावजूद उन्होंने ये कामयाबियां हासिल की हैं । दूसरी ओर, पाकिस्तान में एक क्षेत्र ऐसा भी है, जहां महिलाएं बिल्कुल भी नहीं दिखतीं ।
यह वह मंच है, जहां देश की सुरक्षा नीतियां बनाई जाती हैं। हालांकि अब महिलाएं आवाजें उठाने लगी हैं कि देश की सुरक्षा व आर्थिक नीतियों के निर्माण में ज्यादा पाकिस्तानी महिलाओं को शिरकत करने का मौका मिले। अब जरा बुरी खबरों पर भी नजर डालें। अभी पिछले हफ्ते की बात है। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर शहर में हो रही किसी राजनीतिक मीटिंग में खूनी हमला हुआ। 60 से ज्यादा लोगों की मौत हुईं और सैंकड़ों घायल लोग अपनी जिंदगी बचाने की कशमकश में लगे हैं। अफगानिस्तान की ओर से पाकिस्तान में होने वाले आतंकी हमलों में दिन-ब-दिन इजाफा हुआ है। खासकर, जब से अफगान तालिबान ने काबुल की सत्ता हथियाई है।
इससे पहले अशरफ गनी सरकार के समय में ऐसे हमलों के लिए पाकिस्तान सरकार भारत पर इल्जाम लगाती थी। लेकिन आजकल तो अफगानिस्तान के भीतर भारत की ज्यादा मौजूदगी नहीं है। फिर इन बढ़े हुए हमलों के लिए दोषी किसे माना जाए? यह बिल्कुल जाहिर है कि अफगान तालिबानों को समर्थन और काबुल पर उसके कब्जे का इस्तकबाल करने की पाकिस्तान की नीति ने उसे नुकसान ही पहुंचाया है। पाकिस्तान को लेकर अफगान तालिबान की तरफ से बिल्कुल हमदर्दी नहीं दिखाई जा रही है और तमाम कोशिशों के बावजूद तालिबान, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की तरफ से हमलों को नहीं रोक रहे हैं, जिनकी जड़ें अफगानिस्तान के भीतर तक हैं। आंकड़े गवाह हैं कि अगर काबुल के पतन से 500 दिन पहले और उसके बाद की तुलना करें, तो जाहिर होता है कि अफगानिस्तान की ओर से होने वाले हमलों की तादाद बढ़ी है। शायद इसीलिए पाकिस्तान ने दो हाई-प्रोफाइल पदाधिकारियों को काबुल भेजा । इनमें से पहली थीं विदेश राज्यमंत्री हिना रब्बानी खार। यह तालिबान को एक इशारा भी था कि पाकिस्तान में महिलाओं को न सिर्फ काम करने की आजादी है, बल्कि उन्हें सरकार में बड़े पद भी दिए गए हैं। तालिबान को खार का संदेश बिल्कुल साफ था कि उन्हें अपनी सीमा नहीं भूलनी चाहिए और अपनी जमीन से पाकिस्तान पर हमलों की इजाजत भी नहीं देनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान पर हो रहे ये हमले दोहा समझौते के भी खिलाफ हैं, जो न तो आतंकियों को अफगानिस्तानी जमीन पर पनपने की इजाजत देता है और न ही दूसरे देशों पर हमले की । अफगानिस्तान की यात्रा करने वाले दूसरे शख्स थे रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ, जो आईएसआई प्रमुख को भी अपने साथ ले गए थे। उन्होंने कहा, मैंने अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार से कहा है कि अगर वे पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों पर लगाम नहीं कसेंगे, तो पाकिस्तान वहां पनाह लिए आतंकियों पर कार्रवाई करने से गुरेज नहीं करेगा। अगर तालिबान ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, तो हमें कदम उठाने ही होंगे। पर इस सीधी बातचीत के बाद भी अफगान तालिबान ने हमलों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया है। अलबत्ता, उसने पाकिस्तान से कहा है कि वह टीटीपी से बात करे । पाकिस्तान के सिविल व सैन्य नेतृत्व ने इससे इन्कार करते हुए कहा है कि वे आतंकियों से बात नहीं करेंगे।
पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने बाजौर हमले पर जवाब देते हुए कहा है कि अगर काबुल अपने पनाहगार आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक खुद की हिफाजत के लिए अफगानिस्तान में पनाह लिए आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने का सिर्फ एक ही रास्ता पाकिस्तान के पास बचेगा।
बिलावल आतंकियों के खिलाफ काफी मुखर रहे हैं, क्योंकि उनकी मां दिवंगत प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या भी आतंकियों ने ही की थी और वह इसे भूले नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने साफ कहा है कि अफगानिस्तान के भीतर आतंकियों पर हमला करना पहला रास्ता नहीं है। और अगर अफगान तालिबान टीटीपी से छुटकारा पाने में खुद को नाकाबिल पाते हैं, तो पाकिस्तान इसमें उनकी मदद भी कर सकता है। उन्होंने कहा, हम ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहते, पर अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक हमें अपनी हिफाजत करने का पूरा अधिकार है।
अब ऐसा महसूस होता है कि अपने नागरिकों को जीवन की गारंटी न देने वाली सुरक्षा नीतियों के खिलाफ उठ रही आवाजों के बीच पाकिस्तान के पास अफगानिस्तान के भीतर टीटीपी पर हमला करने के सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं है।

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