Pratahkal-Acharya Mahashraman-Worship of knowledge, philosophy and character is the way to salvation
मुम्बई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के दौरान नन्दनवन (Nandanvan) परिसर में रविवार प्रातः ‘महाश्रमण कीर्तिगाथा’ नामक म्युजियम का शुभारम्भ उनके मंगलपाठ का श्रवण कर तथा उनके संसारपक्षीय अग्रज सुजानमल दूगड़ के हाथों फीता काटकर किया गया। इस म्युजियम का आचार्यश्री ने विस्तार से अवलोकन किया।
इसके बाद प्रवचन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि प्रश्न किया गया कि आराधना कितने प्रकार की होती है? उत्तर देते हुए कहा गया कि आराधना तीन प्रकार की प्रज्ञप्त है-ज्ञानाराधना, दर्शनाराधना और चारित्राराधना। ये अध्यात्म जगत के तीन रत्न हैं। दुनिया में अनेक प्रकार के रत्न होते हैं, किन्तु दुनिया में तीन रत्न बताए गए हैं- जल, अन्न और सुभाषित। यहां शास्त्रकार ने ज्ञान दर्शन और चारित्र को रत्न बताते हुए कहा कि आदमी के जीवन में यदि सम्यक् ज्ञान की आराधना, आसेवन, अभ्यास और आत्मसात का प्रयास हो तो ज्ञानाराधना अच्छी फलित हो सकती है। ज्ञान अथाह है, इसलिए आदमी को अपने जीवन में सारभूत ज्ञान को ग्रहण करते हुए ज्ञानाराधना करने का प्रयास करना चाहिए।
दर्शनाराधना में बताया गया कि आदमी में सच्चाई के प्रति श्रद्धा, निष्ठा रहे। देव, गुरु और धर्म के प्रति आस्था, श्रद्धा का भाव रहे सम्यक् दर्शन अच्छा रह सकता है और दर्शनाराधना पुष्ट बन सकती है। आदमी को अपने जीवन में चारित्र की आराधना को पुष्ट बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। साधुत्व जीवन स्वीकार कर आजीवन चारित्र की आराधना किया जाता है।
गृहस्थ भी अपने जीवन में चारित्र की आराधना के सामायिक आदि के माध्यम से प्रयास करते हैं। इसके साथ आदमी के जीवन में अहिंसा, संयम और तप हो, भोजन नॉनवेज से मुक्त हो, नशा से दूरी हो, सामायिक, उपवास, व्रत, जप का क्रम चलता रहे तो चारित्राराधना अच्छी हो सकती है। इन तीनों आराधना मानों मोक्ष की दिशा आगे बढ़ने का मार्ग है।
ज्ञानाराधना, दर्शनाराधना और चारित्राराधना के माध्यम से अपने जीवन को मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा और साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा ने भी प्रेरित किया।
Editorial

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