✕
विदेश में रहते हुए भी जीवन में बना रहे धर्म-ध्यान का प्रभाव
By EditorialPublished on
आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सानिध्य में शनिवार को 16 देशों के 200 से अधिक श्रद्धालु उपस्थित थे। यह पहला अवसर था जब इतने देशों में रहने वाले श्रद्धालु एक साथ आचार्य महाश्रमण के सम्मुख उपस्थित हुए थे। अवसर था तेरापंथी महासभा के तत्वावधान में आयोजित एनआरआई समिट का।

मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सानिध्य में शनिवार को 16 देशों के 200 से अधिक श्रद्धालु उपस्थित थे। यह पहला अवसर था जब इतने देशों में रहने वाले श्रद्धालु एक साथ आचार्य महाश्रमण के सम्मुख उपस्थित हुए थे। अवसर था तेरापंथी महासभा के तत्वावधान में आयोजित एनआरआई समिट का।
आचार्य महाश्रमण ने भगवती सूत्र आगम के आधार पर श्रुत और शील सम्पन्न बनने की प्रेरणा प्रदान की। अप्रवासी श्रद्धालुओं से उन्होंने कहा कि चार प्रकार की दृष्टियां बताई गई हैं- द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव। इन चारों दृष्टियों पर ध्यान दिया जाए तो ज्ञान स्पष्ट हो सकता है। क्षेत्र की दृष्टि से देखें तो लोकाकाश और अलोकाकाश दो होते हैं। लोकाकाश में ही सारे प्राणी, पुद्गल आदि अवस्थित हैं। इनमें अनेक क्षेत्र ऐसे जहां मनुष्य निवास करते हैं। भारत से बाहर के देशों में साधु-संतों का इतना मेला और संख्या भारत की तुलना में ना के बराबर है। इस दृष्टि से देखें तो भारत तो मानों धर्म क्षेत्र है। गुरुदेव तुलसी के समय समण श्रेणी के रूप में एक तेरापंथ धर्मसंघ को एक अवदान मिला। जिसके माध्यम से समणियां विदेशों में जाकर वहां रहने वाले लोगों को धर्म, ध्यान आदि लाभान्वित कराती हैं और अब तो तकनीक आदि के माध्यम से गुरुओं की वाणी सुनने का भी अवसर मिल रहा है तो तकनीक से कुछ क्षेत्रीय निकटता हुई है, किन्तु एक टेलीविजन पर देखने और एक साक्षात देखने और अनुभव करने की बात अलग होती है। वर्तमान साध्वीप्रमुखा भी पहले समणी रूप में रहते हुए विदेश यात्रा भी की हैं। हमारे साध्वीवर्या भी समण श्रेणी में रही हुई हैं। मूल बात यह है कि विदेश में रहने पर भी जीवन में धर्म-ध्यान का प्रभाव बना रहना चाहिए। कोरी भौतिकता के युग में भी आदमी का दृष्टिकोण आध्यात्मिकता से परिपूर्ण रहे। कोरी भौतिकता चिंता, कुंठा में ले जा सकती है।

Editorial
Next Story
Related News
X


