Pratahkal - Suresh Goyal
हमारा जहाज अन्य क्रूज जहाजों से छोटा था फिर भी इसमें 1380 सफर कर रहे थे। जहाज के 658 कर्मचारी अलग थे, इनके उपर भी स अधिकारी थे। सिर्फ यात्रियों के लिये ही 690 कमरे थे। इनमें डबल बेड, वगैरह थे। कर्मचारियों अधिकारियों के रहने की व्यवस्था अलग से थी। कम से कम 2000 लोगों के लिये 7 दिन का 2 वक्त का खाना और चार वक्त का नाश्ता सुलभ करना मामूली बात नहीं थी जबकि दुनिया में ऐसे ऐसे क्रूज शिप भी है कि कुल मिलाकर 8 से 9 हजार लोग यात्रा करते हैं। रोयल बिया ओफ दी सीज दुनिया का सबसे बड़ा क्रूज शिप है। यह चार महीने पहले समुद्र उतारा गया है, इसमें 6780 यात्री व 2300 कर्मचारी यात्रा कर सकते हैं।
हमारा जहाज 16 साल पुराना है मगर साल भर पहले ही इसका पुनर्निर्माण कर इसे अत्याधुनिक स्वरूप दिया गया है। इसमें 10 डेक है अर्थात पानी से यह दस मंजिला है। जहाज के पैदे में दो-तीन मंजिलें अलग से होती है जि मशीनें, कर्मचारियों के रहने वगैरह की जगहें होती हैं। जहाज की औसत गति 25 नोट अर्थात 46 कि.मी. प्रति घंटे है। जहाज का वजन 60 हजार टन है। 780 फीट तथा चौड़ाई 105 फीट है। जहाज के अधिकारियों में यूरोपीय, अमरीकी, भारतीय वगैरा सब हैं मगर जहाज के तमाम कर्मचारी इण्डोनेशिया व फिलीपीन्स के हैं।
भगवान का नाम लेकर हम जहाज में चढ़े। अब 8 दिन तक उसी के भरोसे निरन्तर समुद्र में ही रहने वाले थे। समुद्री जहाजों की दुर्घटनाओं के किस्सों से दिन दहल जाता था। टाइटेनिक के बारे में तो सब जानते ही हैं, यह तो सौ साल पुरानी बात हो गई मगर पिछले कुछ सालों में भी जो समुद्री दुर्घटनाएं हुई हैं वो भी क्रूज के जहाजों की, उनको भी याद करके डर तो लगता ही है। सोमालिया के समुद्री डाकू हो, बर्फ की चट्टानों व मूंगे की चट्टानों से टक्कर हो या पावर फेल हो, कई आलीशान क्रूज लेने वाले यात्रियों की छुट्टियां दुस्वप्न बन कर रह गई।
हाल ही मेक्सिको की खाड़ी में कार्नीवल जहाज के इंजन में आग लग गई तो जहाज चार दिन तक समुद्री लहरों के भरोसे तैरता रहा, 4 दिन की यात्रा 8 दिन में बदल गई, न बिजली, न ए.सी., न पानी न अन्य कोई सुविधा यात्री परेशान हो गये। 5 साल पहले भी ईंजन में आग लगने से स्प्लेन्डर जहाज प्रशान्त महासागर में 3 दिन बाद इसके 4500 यात्रियों को छोटी छोटी नावों व स्टीमरों से सैन डियेगो तट पर लाया गया।
तैरता रहा। 3 दिन बाद इसके 4500 यात्रियों को छोटी छोटी नावों व स्टीमरों से
इटली के क्रूज शिप के मूगे की चट्टान से टकरा कर उलट जाने का किस्सा तो बहुत मशहूर हुआ। 4200 यात्रियों में से 32 को तो जान गंवानी पड़ी और 64 घायल हो गये। इस बात को चार साल हो गये मगर जहाज आज भी वैसा ही औंधा पड़ा है। 8-10 साल पहले एक क्रूज शिप पर सोमालिया के समुद्री डाकूओं ने स्पीड बोटों से पहुँच कर हमला कर दिया। डाकूओं ने बन्दूकों, बमों, राकेटों से हमला किया जिससे 300 यात्री घायल हो गये।
इसी तरह जहाजों में महामारी फैलने की घटनाए भी बहुत हुई। 2010 में के साउथ केरोलीना से निकले क्रूज के 2600 यात्रियों में से 400 यात्री किसी वाइरस से बीमार हो गये। जहाज में जिधर देखो उधर लोग उल्टीयां करते नजर आये। एक बार तो किसी क्रूज के दौरान समुद्र में 70 फुट ऊंची लहरें उठी जिससे जहाज के 62 कमरों में पानी भर गया। तूफान थम गया फिर भी 300 यात्री यात्रा बीच में छोड़ जहाज से उतर गये।
दो साल पहले ही रोयल केरेबियन के एक क्रूज शिप में एक साथ 700 यात्री व कर्मचारी बीमार पड़ गये। समुद्री यात्रा में बीमार पड़ने वालों की यह रिकार्ड संख्या थी। एक बार बीच समुद्र में जहाज का इंजिन फेल होने से कई दिनों तक जहाज पानी में पड़ा रहा। जहाज का खाना-पानी सब खतम, बिजली पानी कुछ नहीं, सारे टायलेट ओवर फ्लो और पूरे जहाज में इतनी बदबू फैल गई एक पल भी रहना मुश्किल फिर भी लोगों ने राहत नहीं आई तब तक सब झेला। छुट्टियां नर्क बन गई।
यही सब किस्से जहन में थे। गिरिराज धरण की जय करते हुए जहाज प्रवेश किया। प्रवेश के समय ही हमें बता दिया गया था कि सभी यात्रियों के जहाज में चढ जाने के बाद एक सेफ्टी ड्रिल होगी जिसमें किसी भी प्रकार की आपदा आ जाये तो उससे कैसे निपटा जाये इसके बारे में बताया जायगा। मैं यही समझा कि जिस तरह हवाई जहाज में उड़ने से पहले सुरक्षा उपाय बताये जाते हैं उसी तरह की कोई बात होगी।
सेफ्टी के नाम से अचानक मुझे याद आया कि मुनीश ने सी सीकनेस रोकने के लिये जो पेच खरीदा था वो लगाया कि नहीं। मुनीश से पूछा तो उसने अपनी गर्दन पर कान के नीचे लगा पेच बताते हुए कहा कि उसने यह दो दिन पहले ही लगा लिया था। लोस एंजलेस में डाक्टर ने कहा था कि यात्रा के दो दिन पहले लगा लेना ताकि इसका किसी प्रकार का रिएक्शन हो तो पता चले। अभी तक तो उसने क प्रकार का रिएक्शन महसूस नहीं किया था। मैं वह छोटी सी बेन्डेज जैसी गोप देखकर हैरान था कि इसे यहां चिपकाने से कैसे बीमारी पर नियन्त्रण मगर आज के आधुनिक युग में एसे एसे अजूबे देखने को मिलते हैं काल के चमत्कारों पर भी अब अचरज नहीं होता।
हम लोग चौथी मंजिल से जहाज में प्रविष्ठ हुए थे। हमारे कम दूरी पर थे। पास ही एक साथ चार लिफ्टों का बैंक था, पूरे जहाज में ऐसे तीन बैंक यानि कि 12 लिफ्ट हर बैंक के सामने सीढीयां अलग से थी। लिफ्ट थी, एक साथ 15-20 यात्री खड़े हो सकते थे। दूसरी मंजिल या दूसरे क हमारे कमरे लिफ्ट के पास ही थे, यह अच्छी बात थी जिससे लिफ्ट हेतु ज्याद चलना नहीं पड़ेगा।
दोनों कमरे पास-पास ही थे। कमरे अच्छे खासे बड़े थे। मुझे इतने बड़े की अपेक्षा नहीं थी। बाथरूम भी बड़ा था, उसमें टब भी लगा था। ये तो शिप के सबसे कम कीमत वाले कमरे थे। उपर के डेकों पर और भी मंहगे कमरे व ईट वहां तो और भी ज्यादा सुविधाएं होगी। कमरे के बीचों बीच क्वीन बेड लगा थ मुनीश के कमरे के लिये तो यह ठीक था मगर मैं और राजा दोनों खर्राटेबाज इसलिये सोच में पड़ गये कि दोनों इस पर एक साथ कैसे सोएंगे। मुनीश ने कहा कि टिकिट खरीदते वक्त उसने एक कमरे में क्वीन बेड व एक में अलग अलग बेड लि था। बेड के एकदम पीछे दो बड़ी बड़ी खिड़कियां थी जिनसे समुद्र का दृश्य बहुत अच्छा दिखाई देता था।
ज्यूंही इस खिड़की से हमने झांका तो सामने ही माउन्ट रेनियर का ज्वालामुख और इसकी हिमाच्छादित पहाड़ियां नजर आ गई खिड़की से जब यह इतना अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था तो जहाज के सबसे उपर के डेक से कितना सुन्दर दिखता होगा।
हमारा सामान अब तक नहीं पहुँचा था, सोचा तब तक पूरे जहाज का एक चक्कर लगा कर देख लें कि कहां कहां क्या क्या है। हम कमरे से निकले तो सामने ही एक कर्मचारी नजर आ गया। यह इण्डोनेशियाई था, हमें देख कर किसी हिन्दी फिल्म का गाना गाने लगा और नमस्कार करते हुए अमिताभ बच्चन का नाम लिया। इसमें कोई शक नहीं कि हमारी फिल्मों और हमारे कलाकारों की हम कितनी ही मजाक उड़ाएं या उनके योगदान को नजरअंदाज करें मगर यह वास्तविकता है कि जगत में ये हमारी पहचान बन चुके हैं। हम उनसे पहचाने जा रहे हैं। बही उनकी मान्यता क्या होगी। अमिताभ बच्चन निस्संदेह भारत के प्रतीक हैं। मुझे याद आता है कि एक बार प्रधानमंत्री के दल में जब मैं जापान गया की सड़क पर लोग हमें देखते ही अमिताभ अमिताभ करने लगते थे ।
Editorial

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