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मुंबई। मंगलवार को तीर्थंकर (Tirthankar) समवसरण में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahasramana) ने कहा कि भगवती सूत्र में प्रवृत्ति के तीन साधनों मन, वाणी और काया की बात बताई गई। इनमें दो साधनों की विस्तार से चर्चा के बाद गौतम स्वामी (Gautam Swami) ने तीसरे माध्यम काया अर्थात् शरीर के संदर्भ में भी प्रश्न किए। भगवान महावीर (Lord Mahavir) ने कहा कि शरीर और आत्मा का बहुत गहरा सम्बन्ध होता है। शरीर के बिना आत्मा को खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता है। शरीर और आत्मा एक दूसरे से अभिन्न भी है और भिन्न भी बताया गया है। शरीर में आत्मा होती है तो अनुभूति भी होती है। कहीं कांटा चुभ जाए, कहीं कट जाए, कहीं चोट लग जाए तो आदमी को अनुभूति होती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शरीर और आत्मा एक है। दूसरी ओर कोई मर जाए तो आत्मा आगे चली जाती है और स्थूल शरीर यही रह जाता है तो इसलिए शरीर और आत्मा अलग-अलग भी हैं। आत्मा और काया पानी-दूध, मिट्टी-सोना मिलीजुली होती है। मनुष्य यह सोचे कि इस मानव शरीर का कितना बढ़िया सदुपयोग हो सके। मृत्यु के बाद भौतिक धन व शरीर भी साथ नहीं जाता, किन्तु कर्म और धर्म तो साथ ही जाता है। आदमी जैसा कर्म करता है, फल तो साथ ही जाता है। साधु साधना के बाद शरीर भले साथ न ले जा सके, किन्तु उसकी आत्मा (soul) के साथ संवर और निर्जरा अवश्य जाता है, जो आत्मकल्याण में सहायक बनता है। सामान्य मनुष्य भी सौभाग्य से प्राप्त इस मानव जीवन का सदुपयोग करते हुए अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए।
Editorial

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