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सुरेंद्र किशोर... कांग्रेस (Congress) की देखा-देखी आज लगभग हर प्रदेश में कोई न कोई राजनीतिक परिवार ऐसा है, जो वहां की राजनीति के एक हिस्से को नियंत्रित कर रहा है। वंश के आधार पार्टी या फिर सरकार का नेतृत्व सौंपने में जब कांग्रेस ने योग्यता- क्षमता का कोई ध्यान नहीं रखा तो अन्य दल क्यों रखेंगे? आज देश की राजनीति करीब तीन सौ परिवारों तक सिमट कर रह गई है। मार्क्सवाद का सिद्धांत भी परिवारवाद को नहीं रोक पाया । केरल के मुख्यमंत्री के दामाद उनके मंत्रिमंडल के सदस्य हैं।
वंशवादी राजनीति की शुरूआत आजादी की लड़ाई के दिनों ही हो चुकी थी। अपने पुत्र को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने के लिए आतुर मोतीलाल नेहरू
(Motilal Nehru)
ने 23 अगस्त 1927 को गांधीजी को लिखा, "मेरे समझाने के बावजूद एकमात्र संभावित विकल्प के रूप में आम तौर पर सभी जवाहर लाल की ही मांग कर रहे हैं।" इससे पहले गांधी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए जवाहर लाल को अयोग्य मानते हुए 19 जून 1927 को मोतीलाल को लिखा था, “कांग्रेस का जो रंग ढंग है, उससे यह राय दृढ़ होती है कि अभी जवाहर लाल का कांग्रेस अध्यक्ष बनना ठीक नहीं। 1928 में मोतीलाल नेहरू कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उन्होंने गांधी जी को दो और चिट्ठियां लिख कर जवाहर लाल को 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष बनवा ही दिया। तब यह कहा गया कि कांग्रेस मुख्यालय के लिए इलाहाबाद (Allahabad) में आनंद भवन देने की पूरी कीमत मोतीलाल जी ने वसूल ली।
1929 में कांग्रेस में जवाहर लाल की अपेक्षा अधिक योग्य अनेक नेता थे, जो अध्यक्ष बन सकते थे। गांधी जी भी इसे समझते थे। इसीलिए उन्होंने मोतीलाल की दो चिट्ठियों को तो नजरअंदाज किया, पर तीसरी चिट्ठी पर मान गए। 1946 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव होना था, पर गांधीजी ने सरदार पटेल (Sardar Patel) के दावे की अनदेखी कर जवाहर लाल नेहरू को पहले कांग्रेस अध्यक्ष और बाद में प्रधानमंत्री बनवा दिया । किसी राजनीतिक परिवार से कोई सत्ता के ऊंचे पद पर बैठे, इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए, बशर्ते वह उस पद के योग्य हो ।
सवाल तब उठता है, जब उस पद की योग्यता न होने के बावजूद किसी को पद दे दिया जाए। आज वंशवादी दल यही करने में लगे हुए हैं। क्या जवाहर लाल प्रधानमंत्री पद के योग्य थे? क्या उनमें इस देश की मूल समस्याओं की समझ थी? यदि समझ होती तो उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार पनपने नहीं लगता । याद करें कि 1947 और 1985 के बीच कौन -कौन प्रधानमंत्री थे। उनमें से तीन तो नेहरू-गांधी परिवार से ही थे ।
यदि नेहरू में राष्ट्रीय सुरक्षा की समझ होती तो चीन हमारी हजारों वर्ग मील जमीन नहीं हड़प पाता। नेहरू के शासनकाल में सरकारी भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई थी। उसने हमारे साधनों को दीमक कीड्ड तरह चाट खाया। 1963 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष डी. संजीवैया को यह कहना पड़ा, "वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, आज करोड़पति बन बैठे हैं।" उन्होंने यह भी कहा था कि झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने ले लिया है। नेहरू मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ सदस्य ने जब भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक संस्था बनाने की जरूरत बताई तो नेहरू ने कहा कि इससे शासकों में पस्तहिम्मती आएगी।
एक खास परिवार से होने के कारण ही 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। इंदिरा को यह पद दिए जाने के खिलाफ कांग्रेस सांसद महावीर त्यागी ने 31 जनवरी 1959 को लिखा, "मेरी राय है कि इंदु को अध्यक्ष चुने जाने से रोको या फिर आप प्रधानमंत्री पद से मुक्त हो जाओ |%% जवाब में नेहरू ने त्यागी को लिखा कि इस वक्त उसका कांग्रेस अध्यक्ष बनना उचित होगा।
कल्पना कीजिए कि 1959 में कांग्रेस में कितने अधिक नेता इंदिरा से इस पद के लिए अधिक योग्य रहे होंगे। वास्तव में नेहरू अपनी पुत्री को प्रधानमंत्री की लाइन में खड़ा करना चाहते थे। इंदिरा को कांग्रेस नेताओं के एक छोटे समूह ने 1966 में इसलिए प्रधानमंत्री बनवा दिया, ताकि उन पर दबाव डालकर अपने अनुकूल काम कराया जा सके। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी इंदिरा को सदन के नियमों का ज्ञान नहीं था और इसीलिए 1966 में लोकसभा के स्पीकर सरदार हुकुम सिंह के समक्ष उन्हें खेद प्रकट करना पड़ा था। दरअसल जब स्पीकर खड़े होकर बोल रहे थे, तभी प्रधानमंत्री सदन से बाहर निकल गईं थीं । प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा ने बांग्लादेश युद्ध
(Bangladesh war)
जीतने के अलावा कौन सा महत्वपूर्ण काम किया? हां, उनके शासनकाल में सरकार में भ्रष्टाचार को संस्थागत स्वरूप जरूर मिल गया। इससे पहले लालबहादुर शास्त्री ने भी 1965 में पाकिस्तान (Pakisthan) को युद्ध में हराया था, पर भ्रष्टाचार को लेकर वह सख्त थे ।
वंशवाद के आधार पर सत्ता में आईं इंदिरा ने 'गरीबी हटाओ' का नारा तो दिया, पर अपने पुत्र संजय गांधी के लिए सरकारी मदद से कार कारखाना खुलवा दिया । वह फेल कर गया । तब उन्होंने संजय को राजनीति में उतार दिया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद किन परिस्थितियों में राजीव गांधी को प्र.म. पद की शपथ दिलवाई गई, वह सबको ज्ञात है। जिस दल ने वंशवाद के सहारे राजीव को सत्ता सौंपी, उसने इसका ध्यान नहीं रखा कि एक अनुभवहीन व्यक्ति कैसे देश को चलाएगा?
राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) देश के लिए हितकारी साबित नहीं हुए । उनके शासनकाल में कांग्रेस को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिलना बंद हो गया। देश की समस्याओं को लेकर राजीव गांधी की ढुलमुल नीतियों के कारण ऐसा हुआ। वंशवाद न सिर्फ देश को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि संबंधित पार्टी को भी । वंशवाद के आधार पर ही तो राहुल गांधी (Rahul gandhi)- सोनिया गांधी (Soniya gandhi) कांग्रेस के शीर्ष नेता हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस के पुनरूद्धार के कोई संकेत नहीं हैं, फिर भी कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सोनिया-राहुल-प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) को ढो रहे हैं।
वंशवादी दलों के साथ यही दिक्कत है कि गलत नीतियों के कारण पार्टी भले डूब रही हो, पर नेतृत्व में बदलाव की कोई गुंजाइश कभी नहीं रहती। इससे न सिर्फ लोकतंत्र, बल्कि शासन तंत्र को भी नुकसान होता है। हालांकि प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण के साथ परिवारवाद पर भी प्रहार किया, लेकिन कोई नहीं जानता कि देश को वंशवादी राजनीति से छुटकारा कब मिलेगा ?
Editorial

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