Pratahkal - Lekh Update - Why does the social fabric break somewhere?
बद्री नारायण
कभी पश्चिम बंगाल, कभी महाराष्ट्र, तो कभी हरियाणा, देश के विभिन्न कोनों से हिंसा की खबरें आती रहती हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? भारतीय समाज, जिसे अपेक्षाकृत शांत माना जाता है, वह वक्त-बेवक्त यूं आक्रामक क्यों होने लगा है? दरअसल, जब भी किसी समाज में संवाद की कमी हो जाती है, तो उसमें तनाव बढ़ जाता है, जो बाद में हिंसा के रूप में सार्वजनिक होता है। संवाद के लिए जरूरी है, अनुकूल सामाजिक माहौल का कायम रहना। इसमें आपसी विश्वास की भी दरकार होती है। जब ये सब चीजें छीजने लगती हैं, तो हिंसा के लिए जमीन तैयार होने लगती है। हरियाणा के मेवात में अभी जो कुछ हो रहा है, उसका कारण भी यही सब है ।
सांप्रदायिक हिंसा अथवा तनाव की दूसरी वजह है, समाज का जड़ होते जाना जो समाज जितना अधिक लचीला होता है, उसमें संवाद की गुंजाइश उतनी अधिक होती है। समाज के अनुदार होते ही वह रूढ़ होने लगता है, जिसमें अस्मिता भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । हाल- फिलहाल तक हम अस्मिता को 'इम्पावरिंग एजेंसी' मानते रहे हैं, यानी यह लोगों को सशक्त बनाने में मददगार मानी जाती रही है, पर अब यह 'कॉन्टेस्टिंग एजेंसी', यानी प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने वाला कारक बनती जा रही है। इससे सामाजिक समरसता खत्म होने लगी है। मणिपुर में आज जो कुछ हो रहा है, उसका कारण यही अस्मिता का संकट है। कुकी और मैतेई, दोनों समुदायों के लोग अपनी-अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। इसके लिए उन्हें शासन में पर्याप्त जगह और सत्ता में उचित भागीदारी चाहिए।
सामाजिक असुरक्षा के कारण भी लोगों में तनाव पैदा होता है। यह अविश्वास बढ़ाने का एक प्रमुख कारक है, और जब अविश्वास बढ़ता है, तब तनाव व हिंसा के लिए जगह बनने लगती है । अस्मिताओं का रूढ़ होना भी सामाजिक असुरक्षा बढ़ाता है। यही कारण है कि पहचान अथवा अस्मिता को लचीला बनाने के प्रयास किए जाते हैं। अस्मिता की राजनीति करने वालों के लिए यह बहुत जरूरी है कि वे अस्मिता के प्रति लोगों की कट्टरता को कम करने का भी काम करें। सामाजिक असुरक्षा की स्थि में यह दायित्व प्रशासन का है कि वह तनाव को जन्म देने वाली स्थितियों का दमन करे।
हमें सामाजिक बहाव को भी जड़ होने से रोकना होगा। अगर सामाजिक रिश्ते उदार होते हैं, तो वे लोगों को आपस में जोड़ने का काम करते हैं। मगर इस रिश्ते का अनुदार होना सामाजिक संघर्ष के लिए खाद-पानी का काम करता है। फिर, सामाजिक असुरक्षा, संवाद की कमी, आपसी अविश्वास, अस्मिता का संकट आदि सब मिलकर नकारात्मक माहौल पैदा करते हैं और सामाजिक ताने-बाने को तोड़ देते हैं। सांप्रदायिक हिंसा कोई अपवाद नहीं है। इसके लिए भी अनवरत एक माहौल बनता रहता है।
ऐसी हिंसा का दंश कोई एक व्यक्ति या परिवार नहीं भोगता, पूरा समाज इस घाव की टीस महसूस करता है। जिस परिवार का कोई अपना हिंसा में जान गंवाता है, उसके लिए तो यह जीवन भर का दुख होता है। इतना ही नहीं, इससे एक तरह का सामाजिक खौफ भी पैदा होता है। जो व्यक्ति किसी अपने को दंगे में खोता है, उसे हमेशा खोने का डर बना रहता है। यह खौफ बाद में कभी खत्म न होने वाला दुख बना जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हिंसा की चपेट में जो लोग नहीं आते, वे इससे प्रभावित नहीं होते। उन पर सामाजिक सरंचना के दरकने का असर होता है। चूंकि ऐसी हिंसा में समाज टूटता है, इसलिए सामाजिक तनाव के बीच अपनों को खोने के खौफ में वे जीने को अभिशप्त रहते हैं। समाज तो इससे लंबे समय तक कराहता रहता है।
बेशक, हिंसक घटनाएं अथवा दंगे क्षणिक होते हैं और कुछ समय के बाद थम जाते हैं, लेकिन उनका प्रभाव बरसों तक बना रहता है, लोग मानसिक तौर पर इससे बाहर नहीं निकल पाते। इससे समुदायों के बीच में इतनी दूरियां पैदा हो जाती हैं कि उसे भरने में बरसों बरस लग सकते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इसकी भरपायी संभव ही नहीं है। इसीलिए, हिंसा पर जल्द से जल्द काबू पाने और तनाव के कारकों को दूर करने की वकालत की जाती है, ताकि सामुदायिक विश्वास पटरी पर लौट सके। इसके लिए अस्मिताओं में बहाव का बना रहना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो बार-बार सामाजिक खुशी की बात कहते हैं। यह दरअसल उसी सामाजिक समरसता की देन है, जिसकी कमी समाज में तनाव अथवा हिंसा पैदा करती है। यहां संसाधन के महत्व को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। संसाधन का एक रूप रोजगार भी है। जब लोगों के पास काम-धंधे होते हैं और वे अपनी मुश्किलों से लड़ने में खुद को सक्षम पाते हैं, तो उनमें असुरक्षा-बोध पनप नहीं पाता। इससे आपसी तनाव भी पैदा नहीं होता इसीलिए यहां समुदायों के स्थानीय नेताओं की भूमिका काफी अहम हो जाती है। वे लोगों को आपस में जोड़ने की कड़ी होते हैं। वे अपने लोगों के 'सुख-दुख में साथ होते हैं, इसलिए उनको समाज में एक अलग प्रतिष्ठा मिली होती है। इसका लाभ तनाव कम करने में मिलता है। साहित्यकारों अथवा रचनाकारों का कद भी सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं से कम नहीं होता, अलबत्ता कई मामलों में तो ज्यादा ऊंचा ही रहता है। चूंकि साहित्य में सामाजिक तनावों के दर्द को बखूबी जगह मिलती है, इसलिए इससे एक अलग माहौल बनता है। भारतीय साहित्य में ऐसे कई उपन्यास हैं, जिनका मूल कथ्य सामाजिक तनाव है। ऐसे में, साहित्यकारों की मदद भी ऐसी हिंसा को रोकने में ली जा सकती है। वे 'ओपिनियन मेकर' की तरह काम करते हैं और समाज में अपनी विशेष प्रतिष्ठा होने के कारण लोगों को जोड़ने में मददगार साबित होते हैं।
कबीर गाया करते थे, झीनी- झीनी बीनी चदरिया । समाज भी चदरिया की तरह ही है, जिसको बड़े जतन और बड़े होश से बुनना चाहिए। राष्ट्र या राज्य ऐसी व्यवस्था बनाता है, जिससे तनाव दब सकता है, लेकिन तनावपूर्ण माहौल को समरस सामाजिकता में बदलने के लिए समुदायों के नेता, साहित्यकार जैसे 'आइकॉन' ही कारगर साबित होते हैं। हमें इसी रणनीति के तहत सांप्रदायिक तनावों का समाधान करना चाहिए ।

Editorial

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