Pratahkal-Strengthening of morale is the achievement of life-Bhagwan Mahavir
मुंबई । प्रवृत्ति के तीन साधन-शरीर, वाणी और मन बताए गए हैं। मन होता है, जिसके माध्यम से आदमी मनन करता है, चिन्तन करता है, विचार करता है। भगवती सूत्र में मन के संदर्भ में पूछा गया कि मन आत्मा होता है या अन्य? भगवान महावीर (Bhagwan Mahavir) ने कहा कि मन आत्मा नहीं, मन तो अन्य है। जिस प्रकार भाषा आत्मा नहीं होती, उसी प्रकार मन भी आत्मा नहीं होता। वह आत्मा से अन्य। पुनः प्रश्न आया कि मन रूपी होता है या अरूपी? भगवान महावीर ने कहा कि मन रूपी होता है, अरूपी नहीं। पुनः प्रश्न किया गया कि मन अचित्त होता है या सचित्त? पुनः उत्तर प्रदान किया गया कि मन सचित्त नहीं होता, मन अचित्त होता है। पुनः प्रतिप्रश्न किया गया कि मन जीव होता है कि अजीव? भगवान महावीर ने बताया कि मन जीवों के होता है, अजीवों के नहीं होता।
मन एक ऐसा तत्व है, जिसे रूपी कहा गया है, अचित्त कहा गया है। मन के चार प्रकार बताए गए हैं। मन अच्छा भी हो सकता है और मन बुरा भी हो सकता है। मन में अच्छे विचार आते हैं तो बुरे विचार भी आते हैं। मन इतना गतिशील है कि क्षण में कहां से कहां पहुंच सकता है। विचारों का प्रवाह-सा चलता है। विचारों से आदमी दुःखी और विचारों से आदमी प्रसन्न भी हो सकता है। जिस प्रकार आदमी के जीवन में शरीर बल का महत्व है, उसी प्रकार आदमी के जीवन में मनोबल का भी बहुत महत्व है। मनोबल कमजोर हो जाए तो आदमी को कठिन कार्य करना मुश्किल हो सकता है। मनोबल मजबूत हो तो आदमी कठिन से कठिन भी कार्य कर सकता है। मनोबल का मजबूत होना जीवन की अच्छी उपलब्धि होती है। वे आदमी बलवान होता है, जिसमें मनोबल होता है। कठिनाई में भी आदमी को हिम्मत बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। उक्त जीवनोपयोगी संदेश आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने नंदनवन (Nandanvan) में दिए।
Editorial

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