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शशि शेखर : चंद्रयान- 3 (Chandrayaan3) के सात्विक उन्माद के गुजरने और जी-20 के उत्सवी उछाह के आने के बीच एक बड़ी राजनीतिक घटना आकार लेने जा रही है। वह है, 'आई. एन. डी.आई.ए.' (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलायंस) की 31 अगस्त और 1 सितंबर को होने वाली तीसरी बैठक। इस बैठक पर राजनीति के जिज्ञासुओं की गहरी नजर है। क्या इस बार 'इंडिया' खुद को एक ठोस सियासी विकल्प के तौर पर पेश कर पाएगा?
ऐसा पूछने की सबसे बड़ी वजह यह है कि अब तक इस गठबंधन की ओर से मिश्रित संकेत आते रहे हैं। पटना में अरविंद केजरीवाल की नाराजगी और बहिर्गमन की खबरें उछली थीं, तो बेंगलुरू में नीतीश कुमार की तथाकथित उपेक्षा की। ये दोनों मुद्दे संसद के मानसून सत्र के दौरान दम तोड़ गए। इंडिया के सभी घटक पूरी दृढ़ता के साथ दिल्ली सेवा बिल के खिलाफ एकजुट दिखाई पड़े। यही नहीं, उनके बयानों और विचारों में भी स्पष्ट समानता दिख रही थी, लेकिन इतना काफी नहीं है ।
सांसदों के किये-धरे पर उस समय पानी फिर गया, जब कांग्रेस की युवा नेत्री अलका लांबा ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि उनकी पार्टी दिल्ली की सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। कहने की जरूरत नहीं कि 'आप' की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और कांग्रेस ने समय रहते इस बयान से दूरी बना ली, पर नुकसान आकार ग्रहण कर चुका था। अलका लांबा तो राजनीति में अपेक्षाकृत नई हैं। देश के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक शरद पवार भी इंडिया और एनडीए, दोनों के लिए पहेली बने हुए हैं।
मराठा क्षत्रप शरद पवार 12 अगस्त को अपने भतीजे अजित पवार से मिले और दोनों की भावप्रवण तस्वीरें वायरल होने लगीं। कुछ घंटों को तो छोड़ दीजिए, सिर्फ चंद मिनटों में इंडिया के भविष्य पर लोगों ने सवालिया निशान जड़ने शुरू कर दिए। पवार ने बाद में सफाई दी, मगर उनकी नीयत पर लगे प्रश्नचिह्न अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं।
इसकी वजह भी खुद पवार हैं।
पटना सम्मेलन को याद कीजिए। इस जुटान में पवार के साथ प्रफुल्ल पटेल भी शामिल हुए थे। अगले 10 दिनों में ही पटेल अजित पवार के साथ बगावती मुद्रा में भाषण देते नजर आए थे। अब वह अजित पवार गुट के दिल्ली में प्रतिनिधि और रणनीतिकार माने जाते हैं। क्या शरद पवार इतने अनाड़ी हैं कि वह अपने भतीजे और सबसे खास सिपहसालारों की बगावत को समय रहते आंक नहीं सके ? यह सवाल तब भी उठा था, जब अजित पवार ने साढ़े तीन बरस पहले एनसीपी - कांग्रेस गठबंधन को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था और सरकार में शामिल हो गए थे। पवार उस बगावत में पलीता लगाने में कामयाब जरूर रहे, पर पार्टी की अंदरूनी खदबदाहट किसी से छिपी न थी ।
इसके बावजूद पार्टी के प्रथम पुरूष शरद पवार आश्वस्त थे, तो कैसे ?
उनका राजनीतिक इतिहास रहस्यमय अंतरविरोधों से घिरा हुआ है। उम्र के इस पड़ाव पर उनसे यह अपेक्षा करना कि वह नेकनीयती का सुबूत फिर से दें, उनके साथ न्याय नहीं है, पर करें क्या? परिस्थितियों का तकाजा यही है। उनके आलोचक कह रहे हैं कि वयोवृद्ध मराठा नेता राजनीतिक तराजू के दोनों पलड़ों का भार आंक रहे हैं और समय आने पर कुछ भी कर गुजरने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता। उन्हें इस कुहासे को साफ करना ही होगा। इसमें उनका और इंडिया, दोनों का भला है।
यही नहीं, इंडिया के वरिष्ठ नेताओं को अपनी वाणी और संयमित करनी होगी। वे पहले के मुकाबले यकीनन ज्यादा एकजुट नजर आते हैं, फिर भी उन्हें सोच-समझकर हर कदम उठाना होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सामने भारतीय जनता पार्टी का सबल संगठन है। भगवा दल के दिग्गज आनन-फानन में बयानों के अपने हिसाब से अर्थ निकालने और प्रचारित करने में सक्षम हैं। मसलन, बुधवार को लालू यादव ने कहा कि इंडिया में कई संयोजक हो सकते हैं। तुरंत सोशल मीडिया पर खबरें फैलने लगीं कि नीतीश कुमार का भविष्य खतरे में है । यह समय मोल तोलकर हर शब्द बोलने का है।
यही नहीं, इंडिया के नेताओं को घर से बाहर कदम रखते समय भी तमाम एहतियात बरतने होंगे। एक उदाहरण देता हूं। बीते हफ्ते ही एक खबर टेलीविजन की सुर्खियां बन गई कि नीतीश कुमार के काफिले के लिए एक एंबुलेंस को जबरन रोक दिया गया। क्या ऐसा सिर्फ बिहार में होता है? इसी तरह छाता थामकर लालू यादव के साथ चल रहे एक शख्स को पुलिस उपाधीक्षक बताकर सवाल उठाए गए। अगर आप अपने आसपास देखें, में तो प्रतिदिन छोटे-मोटे वीआईपी के लिए इस पलीता लगाने में तरह के दृश्य देखने को मिल जाएंगे, पर वे वायरल नहीं होते ।
राजद और जदयू अतीत में सतर्कता और समन्वय की सक्षमता का परिचय दे चुके हैं। वर्ष 2015 का बिहार चुनाव याद कीजिए । नीतीश कुमार और लालू यादव मिलकर लड़े थे। वह चुनाव समन्वय की अनूठी मिसाल था। दोनों ने सिर्फ एक साझा रैली की थी। उनकी सारी रैलियां अलग-अलग हुईं, पर वे एक ही बात बोलते थे। लालू यादव की रैली में जदयू के बड़े नेता और नीतीश कुमार की सभाओं में राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ सदस्य उनके पीछे खड़े रहते थे। इससे मतदाताओं में साफ संदेश गया कि सियासी भरत मिलाप आकार ले चुका है। चुनावी नतीजे इस भावना के गवाह बने ।
स्पष्ट है, मुंबई बैठक में इंडिया को अपने मोर्चे का स्वरूप, संदेश और समन्वय का प्रकार तय करना होगा। उन्हें 2015 के बिहार मॉडल को साफ-सुथरे और बड़े स्वरूप में प्रस्तुत करना ही होगा।
इंडिया के कर्णधारों को मीडिया से बातचीत के लिए साझा टीम भी बनानी होगी। आज इसके नेता बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सीमा के विवाद पर अलग-अलग टिप्पणी करते हैं, लेकिन वे मुद्दा नहीं बन पातीं। उन्हें आधिकारिक प्रवक्ताओं के अलावा अन्य लोगों को बोलने से रोकना भी होगा ।
इसमें जितनी देर लगेगी, मतदाताओं के बीच यह संदेश प्रबल होता रहेगा कि नरेंद्र मोदी का अपनी कद-काठी के किसी नेता या गठबंधन से मुकाबला नहीं है।
इंडिया के दल यह न भूलें कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए प्रधानमंत्री मोदी के पीछे पूरी तरह एकजुट है। दिल्ली से लेकर देश की सूबाई राजधानियों तक उनका संदेश समान रहता है। इससे मतदाता के मन में यह धारणा रह-रहकर पुष्ट होती है कि 'आएगा तो मोदी ही'। इंडिया को मुंबई में इसकी काट खोजनी होगी। उसे ध्यान रखना होगा कि लाल किले से अपनी तीसरी पारी की रूपरेखा खींचकर प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव का आगाज कर दिया है।
Editorial

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