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औपनिवेशिक कानूनों से मुक्ति की ओर भारत
By EditorialPublished on
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर स्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने लाल किले (Red Fort) से देश को संबोधित करते हुए कहा कि अब हम जो भी करेंगे वह देश के आगामी हजार वर्षों का भविष्य लिखेगा । देश के हजार वर्षों का भविष्य स्वर्णिम बने इसके लिए हमें कानून (Law), न्याय तंत्र और अर्थव्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा । यदि देश के कानून के लिहाज से देखा जाए तो इसे ब्रिटिश कानून से मुक्त कर नया भारतीय कानून का अमलीजामा पहनाने का प्रयास पिछले दिनों ही शुरू कर दिया गया था। गृहमंत्री अमित शाह ने ल

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लालजी जायसवाल : स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर स्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने लाल किले (Red Fort) से देश को संबोधित करते हुए कहा कि अब हम जो भी करेंगे वह देश के आगामी हजार वर्षों का भविष्य लिखेगा । देश के हजार वर्षों का भविष्य स्वर्णिम बने इसके लिए हमें कानून (Law), न्याय तंत्र और अर्थव्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा । यदि देश के कानून के लिहाज से देखा जाए तो इसे ब्रिटिश कानून से मुक्त कर नया भारतीय कानून का अमलीजामा पहनाने का प्रयास पिछले दिनों ही शुरू कर दिया गया था। गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में भारतीय न्याय संहिता विधेयक, भारतीय साक्ष्य विधेयक और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक प्रस्तुत कर दिया है। विधेयक पारित होने के बाद देश में आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़ा बदलाव होगा।
ये कानून 1860 से 1872 के बीच लागू हुए थे और अभी तक वैसे ही चल रहे थे। लेकिन आने वाले समय में बदले रूप में ये कानून देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत करेंगे, क्योंकि इन पुराने प्रमुख आपराधिक कानूनों में संशोधन की बहुत दिनों से आवश्यकता थी। वैसे इन विधेयकों को जांच के लिए स्थायी समिति के पास भेजा गया है। इन्हें प्रस्तुत करते समय गृह मंत्री ने कहा कि अंग्रेजों के कालखंड में आइपीसी सीआरपीसी, साक्ष्य अधिनियम 1860 1898 और 1872 में कानूनों के रूप में लाए गए थे। इनमें अब आमूलचूल परिवर्तन किया जाएगा। ये विधेयक अंग्रेजी शासन को मजबूत करने के उद्देश्य से लाए गए थे। लेकिन अब हमारे परिवर्तित कानूनों का उद्देश्य इसके माध्यम से न्याय देना है।
ध्यातव्य है कि कानून और न्याय व्यवस्था में परिवर्तन थोड़े बहुत तो होते रहे हैं, लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि सरकार बड़े पैमाने पर परिवर्तन का मन बना चुकी है। लिहाजा, अब ऐसे कानून का निर्माण होगा जो भारतीय समाज के अनुकूल होगा। इसके लिए बड़े पैमाने पर आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम आदि में संशोधन किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि चार साल तक व्यापक विचार विमर्श के बाद तीनों विधेयकों को तैयार किया गया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट से सभी न्यायाधीशों, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों, सभी सांसदों, विधायकों, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासकों के साथ ही विधि विश्वविद्यालयों से भी सलाह मांगी गई थी। इनमें से 18 राज्यों, छह संघ शासित प्रदेशों, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, 16 हाई कोर्ट, 142 सांसदों, 270 विधायकों और बड़ी संख्या में आम जनता से सुझाव मिले, जिन्हें इनमें शामिल किया गया है। अतः व्यापक विचार विमर्श के बाद इन तीनों विधेयकों को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया है।
कानून की दशा में बड़ा बदलाव : भारतीय दंड संहिता, 1860 की जगह भारतीय न्याय संहिता, 2023 जगह लेगी। ये नया विधेयक आइपीसी के 22 प्रविधानों को निरस्त करेगा । साथ ही नए विधेयक में आईपीसी के 175 वर्तमान प्रविधानों में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है। नए विधेयक में नौ नई धाराएं भी जोड़ी गई हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 में कुल 356 धाराएं हैं। आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 लेगी। इसके जरिये सीआरपीसी के नौ प्रविधानों को निरस्त किया जाएगा। इसके अलावा, विधेयक में सीआरपीसी के 107 प्रविधानों में बदलाव और नौ नए प्रविधान की पेशकश की गई है। भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 में साक्ष्य अधिनियम के पांच वर्तमान प्रविधानों को निरस्त किया जाएगा। विधेयक में 23 प्रविधानों में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है और एक नया प्रविधान प्रस्तुत किया गया है। इसमें कुल 170 धाराएं हैं। इन तीनों कानूनों में गुलामी की निशानियां भरी हुई थीं और 475 स्थानों पर पार्लियामेंट आफ यूके, प्रोविंशियल एक्ट, लंदन गजट जैसे शब्द लिखे हुए थे। यही नहीं, अंग्रेजों ने प्राथमिकता के आधार पर राजद्रोह और ट्रेन डकैती जैसे अपराधों को सबसे ऊपर रखा था। जबकि प्रस्तावित विधेयक में महिलाओं के साथ अपराध और हत्या जैसे मामलों को पहले चैप्टर में स्थान में मिला है। साथ ही अब नए प्रविधान के तहत तीन साल के भीतर मामलों का निपटारा होगा। पुलिस और वकील जवाबदेह बनेंगे । अपराधियों की सजा सुनिश्चित की जाएगी। पुलिस अपने अधिकारों का दुरूपयोग न करे इसका भी प्रविधान किया गया है । राजद्रोह जैसे कानून को हटाया गया है और उनके स्थान पर अधिक स्पष्ट अलगाववाद और आतंकवाद से जुडे कानून को लाया गया है। इनमें माब लिंचिंग और पहचान बदलकर यौन शोषण को अपराध बनाया गया है। संगठित अपराध के विरूद्ध मजबूत कानून लाया गया है। इस तरह तमाम बड़े बदलाव को एकीकृत किया गया है जिससे कानून और न्याय व्यवस्था आम लोगों के लिए सुगम हो सके।
भारतीय समाज के विपरीत : सवाल उठता है कि अंग्रेजों द्वारा निर्मित दंड संहिता का उपयोग आज तक हम क्यों करते आ रहे हैं, जो भारतीय समाज के विपरीत है ? बता दें कि आईपीसी और सीआरपीसी आदि सभी इतनी अचूक हैं, जिसमें चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं है। यही वजह है कि आज तक हम ब्रिटिश प्रणाली को अपनाए हुए हैं। लेकिन अब बदलते दौर में इस प्रणाली को साथ लेकर चल पाना संभव नहीं दिख रहा है। आज भी प्रशासन में ब्रिटिश प्रणाली के भरपूर दर्शन होते हैं। ध्यातव्य है कि ब्रिटिश सरकार भारत के लोगों से अलग व्यवहार करती थी और ब्रिटेन के लोगों से अलग। ब्रिटेन के नागरिकों को अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों पता थे, लेकिन भारतीयों को नहीं । इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश सरकार ने काफी अत्याचार किए। तमाम अधिनियम ऐसे बनाए गए जिसमें भारतीयों को बहुत दबाया गया। उसी में से एक धारा 124 (अ) यानी राजद्रोह भी था, जो अभी भी देश में लागू है और दुरूपयोग की वजह से भरपूर चर्चा में भी रहा था ।
इसी प्रकार कई कानून आज भी विद्यमान हैं, जो बदलते भारतीय समाज के विपरीत हैं, जिनका कोई औचित्य ही नहीं है। वस्तुतः अंग्रेजों द्वारा पुलिस अधिनियम, सिविल प्रक्रिया संहिता, फौजदारी प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता आदि में ऐसे प्रविधान किए गए, जिससे भारतीय लोग प्रशासनिक अधिकारियों के अधीन बन जाएं। भारतीयों को विश्वास पात्र से भी अलग रखा जाता था। उनकी किसी बात पर विश्वास नहीं किया जाता था । उनके लिखे गए घोषणापत्र को ब्रिटिश अधिकारी सत्यापित करते थे । यही परंपरा हम भी अपनाए हुए थे। लेकिन अच्छी बात यह है कि सुधार हेतु सरकार ने अनेक प्रयास वर्षो पहले ही शुरू कर दिए थे । अक्सर आपने देखा होगा कि पहले किसी भी दस्तावेज को गजेटेड अधिकारी से प्रमाणित करवाना पड़ता था । लेकिन सरकार ने अब कई मामलों में सुधार किया है, जिसके तहत अब व्यक्ति स्वयं ही अपने दस्तावेज को प्रमाणित कर सकता है। फिलहाल, अभी भी बहुत से कानून ऐसे हैं, जो ब्रिटिश मानसिकता लिए हुए हैं। उन सब में परिवर्तन हेतु विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया जा चुका है।

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