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अलास्का जहाज यात्रा 11 : चलते जहाज से डोल्फीनें देखने का मजा आ गया
By EditorialPublished on
यहां जीयोपार्डी खेल की तैयारी हो रही थी। यह प्रश्नोत्तर का खेल होता है। जिस तरह हमारे यहां कौन बनेगा करोड़पति गेम शो होता है, यह भी कुछ उसी तरह का है। इसमें सही उत्तर देने वालों को नकद या वस्तुओं में ईनाम दिया जाता है। इसी तरह के कई पजल शो भी आयोजित होते थे जिनमें यात्रियों को पहेलियां बुझानी पड़ती थी।

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यहां जीयोपार्डी खेल की तैयारी हो रही थी। यह प्रश्नोत्तर का खेल होता है। जिस तरह हमारे यहां कौन बनेगा करोड़पति गेम शो होता है, यह भी कुछ उसी तरह का है। इसमें सही उत्तर देने वालों को नकद या वस्तुओं में ईनाम दिया जाता है। इसी तरह के कई पजल शो भी आयोजित होते थे जिनमें यात्रियों को पहेलियां बुझानी पड़ती थी।
जहाज एक दिन पूर्व जब से चला था अब तक कहीं भी रूका नहीं था, आज पूरे दिन व पूरी रात चलने वाला था। अगले दिन दोपहर के बाद जूनू पहुँचने वाला था। तब तक सभी लोग जहाज में ही मौज मजे करने वाले थे। हम लोग कमरे में पहुँच, नहा-धो कर तैयार हो गये और वापस पूल साईड के डेक पर पहुँच गये। केफेटेरिया में नाश्ता शुरू हो गया था। मैंने तो सुबह चाय के साथ जो ब्रेड वगैरह ली थी उसी से पेट भर गया था। घर पर भी मैं यही करता हूं, चाय के साथ एप्पल व सब्जियों का जूस लेता हूं, उसके बाद सीधा भोजन। यहां तो नाश्ता ही भोजन से कहीं ज्यादा सजा हुआ था। पूल साईड केफे में गर्म गर्म फ्राईज मिल रहे थे। केफेटेरिया में हर तरह का बाकी का गर्म नाश्ता था। पूरा केफेटेरिया खचाखच भरा था, बैठने की भी जगह नहीं थी। जहाज का पहला नाश्ता था इसलिये सभी एक साथ आ गये थे।
जो लोग नाश्ता करके उठते जा रहे थे उनकी टेबलों से झूठी प्लेटें हटाकर उनकी फटाफट सफाई की जा रही थी ताकि प्रतीक्षारत यात्रियों को जगह मिल इस काम में जुटे थे, सभी इन्डोनेशियाई थे मगर इनमें एक गोरे अमेरिकन को देख आश्चर्य हुआ। इसने नेवी की ड्रेस पहन रखी थी, यह कोई अधिकारी प्रतीत हो रहा था। इसे इस तरह प्लेटें उठाते देख यकीन हो रहा था कि काम प्रधान है, चाहे कैसा भी हो।
हम लोग उसी टेबल पर बैठ गये जिसे यह अधिकारी साफ कर रहा था। प्रीति अधिकारी की प्रशंसा करते हुए उससे बात करने लगी तो पता चला कि यही पर पीटर नामक अधिकारी है जिससे सम्पर्क करने को हमें भोजन प्रमुख गिलबर्ट अल्वा ने कहा था। प्रीति ने मेरी तरफ इशारा करते हुए उससे कहा कि लंच में इनके लिये भारतीय भोजन की व्यवस्था करनी है। उसने कहा कि आप लोग जिस वक्त ध करने आओ मुझे बता देना, मैं यहीं मिलूंगा। पीटर से मिल कर निश्चित हो गये कि खाने में अब फालतू चीजें खाने को नहीं मिलेंगी। प्रीति द्वारा लाये गये पराठे अब तक काम ही नहीं आये थे। अब यहां भारतीय भोजन की व्यवस्था हो गई थी तो उन्हें फेंकना ही पड़ेगा। वैसे भी दो दिन पुराने तो हो ही गये थे।
नाश्ते पर कई भारतीय नजर आ रहे थे। मेरी इच्छा थी कि 15 अग. के बारे में किसी से बात करूं। हमारे पास ही एक भारतीय दम्पत्ति बैठी थी। मैंने हिम्मत कर उनसे चर्चा की कि आज 15 अग. है. जहाज पर कई भारतीय हैं, क्यूं नहीं हम लोग कोई छोटा मोटा आयोजन कर लें। उस व्यक्ति ने हंसते हुए क्षमा मांगी और कहा कि वह मेरी भावनाओं का आदर करता है पर वह भारतीय नहीं वरन पाकिस्तानी है। मुझे ऐसे लगा जैसे किसी ने करन्ट लगा दिया हो। मैं बुरी तरह झेंप गया और आत्मग्लानि से भर गया। वह व्यक्ति मेरी स्थिति समझ गया। वातावरण सामान्य करने के लिये मुझसे बात करने लगा और भारत के बारे में पूछने लगा।
उसने अपना नाम सज्जाद बताया और कहा कि वह अमरीकी नागरिक मगर पाकिस्तानी मूल का है। उसने कहा कि उसकी बड़ी इच्छा थी कि किसी भारतीय से बात करे मगर हिचकिचाहट होती थी। अब जब मैंने स्वयं कर ली तो उसे बहुत अच्छा लगा। उसकी बातों से निश्चित रूप से मेरी वह समाप्त हो गई।
हम लोग खिड़की के पास ही बैठे थे। पानी में हल्की सी हलचल हमारे पास के टेबल पर बैठे एक परिवार की छोटी लड़की पानी की तरफ करते हुए खुशी से चीख पड़ी। वह अपने हाथों से बार बार समुद्र की तरफ करते हुए उछल रही थी। अब सबका ध्यान उस लड़की की तरफ चला गया कि क्या कहना चाहती है, तभी किसी ने कहा- डोल्फीन ! डोल्फीन ! अब सब समुद्र की तरफ देखने लगे। कुछ नजर नहीं आया, अगले ही पल लड़की वापस चीखी इस बार वाकई एक डोल्फीन उछली और वापस पानी में समा गई। अब सब लोग पानी की तरफ ही नजरें गड़ाए देखते रहे, कुछ ही पलों में एक साथ तीन चार डोल्फीनें नजर आईं। सब उछली और पानी में समा गई। इस बीच किसी ने दूरबीन निकाल ली तो कहने लगा ये डोल्फीने दूर तक नजर आ रही हैं। हम लोग जहाज के उपरी डेक पर थे, पानी की सतह से बहुत ऊंचे इसलिये डोल्फीनें छोटी छोटी नजर आ रही थी मगर वे अच्छी खासी बड़ी थी। अब तो जैसे उनका सिलसिला चल गया। जहाज आगे बढ रहा था और डोल्फीन देखने का मुफ्त का नजारा भी साथ साथ चल रहा था। मुफ्त इसलिये क्यूंकि डोल्फीन देखने के लिये विशेष शो होते है जिनमें टिकट खरीद कर जाना पड़ता है। जहाज की यात्रा में हम एक जगह व्हेल देखने जाने वाले थे, उसके भी पहले से ही टिकट ले रखे थे। जहाज थोड़ी देर इस डोल्फीन क्षेत्र में चलता रहा। कई यात्री तो बाहर के खुले डेक में पहुँच कर इसका आनन्द ले रहे थे। मगर बाहर हवा बहुत तेज चल रही थी इसलिये हमने हिम्मत नहीं की। धीरे धीरे डोल्फीनें लुप्त हो गई, जहाज आगे बढता रहा।
नहाना-धोना भी हो गया था, नाश्ता भी हो गया था, अब लंच करना था। जहाज पर यही काम रह गया था इसलिये दिन भर तरह तरह के आयोजन रखे गये थे जिनमें व्यस्त होकर यात्री समय की गणना करना भूल जाता है। इनमें बिन्गो नामक खेल का आयोजन अत्यन्त लोकप्रिय था। यह अंकों का खेल होता है। भाग लेने वालों को विभिन्न नम्बरों के कार्ड दे दिये जाते हैं, आयोजक एक एक नम्बर बोलता है, प्रतिभागी वह नम्बर अपने कार्ड में काटता रहता है। हमारे यहां जिस तरह हाउजी और तम्बोला का खेल होता है, यह भी कुछ इसी तरह का खेल है।
भारतीय पारिवारिक गृहिणियों के जनजीवन में जिस तरह टी.वी. सीरीयलों की भूमिका हो गई है कमोबेश उसी तरह की भूमिका किट्टी पार्टियों और हाउजी खेल की हो गई है। इनसे उनके जनजीवन में अभूतपूर्व मनोरंजन का संचार हो गया है। हाउजी के खेल का जो आकर्षण हमारी गृहिणियों में नजर आता है वैसा ही यहां जहाज में उपस्थित वरिष्ठ नागरिकों में देखने को मिलता था। स्त्री-पुरूष दोनों में यह खेल अत्यन्त लोकप्रिय था और एक के बाद एक खेल होते ही रहते थे।
केफेटेरिया से निकल कर हम लोग वापस पूल की तरफ आये तो जहां टेबल टेनिस का टेबल लगा था वहां कतार से कई टेबले लगा कर तरह तरह की वस्तुएं सजा दी गई थीं। पास आकर देखा तो यह जहाज का एक तरह का हाट बाजार था। टेबलों पर अलग अलग तरह की चीजें बिक रही थीं। कहीं कपड़े थे तो कहीं गिफ्ट आईटम तो कही कुछ। अगले दिन हम अत्यन्त ठण्डे प्रदेश में जाने वाले थे इसलिये यहां गर्म जेकेट्स तथा फर के कपड़े भी बिक रहे थे। मैं तो भारत से ही अत्यन्त गर्म जेकेट लेकर आया था मगर मुनीश ने मेरे लिये और भी गर्म एस्कीमो जेकेट ले लिया था। राजा को भी गर्म जेकेट लाने को कहा था मगर वह जो लेकर आया था पर्याप्त नहीं था। सबने उसको यहा से एक जेकेट खरीदने को कहा तो वह मान गया। उसने एक सुन्दर सा जेकेट पसन्द कर लिया मगर यह ज्यादा गर्म नहीं था। उसे हुड वाला जेकेट लेने को कहा मगर उसे हुड वाला पसन्द नहीं था। हम लोग शून्य से भी बहुत कम डिग्री के तापमान में जाने वाले थे, मगर उसने अपनी पसन्द का ही जेकेट लिया।

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