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मनीष पुरोहित... बुधवार की शाम करोड़ों भारतीयों एवं बुधवार भारतप्रेमियों की सांसें अटकी हुई थी इसरो के लैडर का चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) की सतह पर स्पर्श होते ही लोगों ने राहत की सांस ली और उत्साह के साथ इस उपलब्धि के आनंद में डूब गए। इस उपलब्धि की गूंज न केवल भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान के पवित्र मोंदर में सुनी गई, बल्कि पूरे विश्व ने संसार में पहली बार भारत को मिली इस अद्भुत सफलता पर उसका नमन अभिनंदन किया। लँडर विक्रम (Lander vikram) के चंद्रमा की सतह पर उतरने के साथ ही अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नए ऐतिहासिक अध्याय का आरंभ हुआ। विक्रम की सक्रियता के साथ रोवर प्रज्ञान ने भी अपना कार्य करना शुरू कर दिया। इसरो के इस अभियान ने अंतरिक्ष अनुसंधान पर अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी हैं, जो मिटाए नहीं मिट सकेगी।
वास्तव में, चंद्रयान-3 के माध्यम से दक्षिणी ध्रुव पर विजयी लैंडिंग तक की यात्रा मानवीय नवाचार और अटल समर्पण का एक अनुपम उदाहरण है। इसका पूरा श्रेय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के उस परिवेश को जाता है, जहां ऐसी आकांक्षाओं को संकल्प के पंख लगे। स्मरण रहे कि 1976 से पहले रूस के 24 लूना मिशनों में साफ्ट लैंडिंग सफलता दर लगभग 20 प्रतिशत थी। उस हिसाब से इसरो की सफलता को सहज ही समझा जा सकता है। इसरो की सफलता न केवल चंद्रमा से जुड़े अन्वेषण को नया आयाम देगी, बल्कि वहां स्थायी मानव बस्तियों की बसावट का सपना भी दिखा सकती है।
चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) की सफलता का महत्व वैज्ञानिक उपलब्धि की सीमा से कहीं आगे है। इसमें साफ्ट पावर के विस्तार की भी अपार क्षमता है। यह भारत को वैश्विक मंच पर एक उज्जवल एवं प्रेरक पात्र के रूप में प्रस्तुत करती है चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सबसे पहले उतरने वाले देश के रूप में भारत ने अपनी तकनीकी दक्षता और अन्वेषण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया है। यह उपलब्धि भारत को उन विशिष्ट देशों को पांत में खड़ा करती है जो अपनी दूरदर्शिता से आकांक्षाओं को वास्तविकताओं में परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं इसरो की यह सफलता विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारत को सिरमौर बनाने के साथ ही अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में देश के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलने वाली है।
भारत का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष आर्थिकी में 9 प्रतिशत की हिस्सेदारी हासिल करे। चंद्रयान 3 की सफलता इसमें सहायक सिद्ध होगी। यह मिशन वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर भारत की क्षमताओं में एक नया आत्मविश्वास उत्पन्न करेगा। इसरो का किफायती, लेकिन प्रभावी दृष्टिकोण दुनिया भर में प्रशंसित है। चंद्रयान-3 जैसे मिशन अपने अनुमानित दायरे से कहीं अधिक प्रभाव छोड़ते हैं। यह संसाधन कुशलता और नवाचार का जीवंत प्रमाण है। इससे इसरो और भारत की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी बढ़ी है। विभिन्न वैश्विक संस्थान इसरो के साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं। जैसे जापान के जाक्सा को अपने ल्युपेक्स मिशन में भी भारत के विक्रम की मदद महसूस हो रही है।
स्पष्ट है कि भारत विश्व के लिए एक उचित विकल्प के रूप में स्थापित हो रहा है। इस सफलता के पीछे पुरुषार्थ एवं परिश्रम को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यदि 2019 के चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) की असफलताओं से सीख नहीं ली जाती तो इसरो शायद चंद्रयान 3 के रूप में सफलता हासिल नहीं कर पाता। जब 2019 में चंद्रयान-2 का लेंडर अपनी मंजिल से चंद मीटर की दूरी पर क्रश हो गया था तो तमाम सवाल उठे थे इसरो की क्षमताओं और भारत की प्राथमिकताओं को प्रश्नांकित किया गया था। असफलताओं से हताश होना तो इसरो जैसे संस्थानों के शब्दकोश में ही नहीं चंद्रयान 2 से मिले डाटा का इसरो ने गहराई से अध्ययन किया। अपनी गलतियों को परखा। उनके परिमार्जन का खाका तैयार किया। उसे मालूम पड़ा कि कैमरा कास्टिंग फेज में जब विक्रम
(Vikram)
चांद की सतह की फोटो लेकर उन्हें सीधे साझा करते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था तो एल्गोरिदम की कुछ गलतियों के कारण अस्टर (इंजन) की गड़बड़ को पकड़ नहीं पाया था। इसके चलते 39 सेकंड के उस चरण के बाद चंद्रयान-2 नियंत्रण से बाहर हो गया और इसके साथ हो चांद की धरती को चूमने का भारतीय सपना भी ध्वस्त हुआ।
उस नाकामी के बाद इसरो चंद्रयान 3 की तैयारी में जुट गया। इस अभियान के लिए उसने 'फेलियर बेस्ड डिजाइन' जैसी एक अनूठी अवधारणा को अपनाया। यह संकल्पना उन गलतियों पर भी नजर रखती है, जिनमें दस लाख में से एक बार गलतो की आशंका रह जाती है। अपनी तैयारी में इसरो ने ईंधन किफायत के लिए विक्रम लँडर से एक इंजन कम करके उसे सिर्फ चार इंजनों से लैस किया। संख्या घटाई तो इंजन की क्षमताएं बढ़ाई लैंडर की लेग्स को मजबूत किया। बेहतर कैमरा और सेंसर लगाए। एल्गोरिदम को इतना दुरूस्त किया कि गलती को कोई गुंजाइश ही न रहे। सोलर पैनल का विस्तार कर उसे और समृद्ध किया। लांच से पहले सभी प्रक्रियाओं को इतनी कसौटियों पर कसा कि मायूसी के लिए कोई जगह न रह जाए। उसके बाद जो हुआ उस इतिहास के हम सभी 23 अगस्त को साक्षी बने।
चंद्रयान-3 का असली काम अब शुरू हुआ है। इस पर लगे पेलोड से हमें चांद से जुड़ी तमाम बारीकियां पता चलेंगी। इसके चार पेलोड को हम चांद की धरती के इतिहास का संग्रहालय भी कह सकते हैं, जिनके माध्यम से हमें तमाम गुत्थियां सुलझाने में मदद मिलेगी। चांद पर आने वाले उन भूकंप के बारे में अहम जानकारियां मिलेंगी, जो भविष्य में मून बेस कैंप के लिए काफी आवश्यक होंगी। इसके पेलोड चांद को मिट्टी में उपस्थित खनिजों की पड़ताल भी करेंगे। विक्रम और प्रज्ञान 14 दिन तक अपने काम में जुटे रहेंगे। प्रज्ञान विक्रम से सीधी बात कर सकता है, लेकिन पृथ्वी से नहीं। प्रज्ञान, विक्रम के 500 मीटर के दायरे में घूम सकता है। इसे कैमरे की मदद से इसरो ग्राउंड स्टेशन से नियंत्रित किया जाएगा। कुल मिलाकर, अगले करीब एक पखवाड़े के दौरान देश के शीर्ष अंतरिक्ष विज्ञानी इन दोनों के साथ व्यस्त रहकर मानव जाति के लिए चंद्रमा से जुड़ी नई-नई जानकारियां तलाशने और उनकी व्याख्या करने में लगे रहेंगे। (लेखक इसरो के पूर्व विज्ञानी हैं)
Editorial

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