Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal
केसीनो से बाहर निकले तो सामने ही ड्यूटी फ्री शोप थी। जानबूझ कर ये ऐसी जगहों पर रखी जाती थीं जहां से होकर यात्री को गुजरना ही पड़ता है और वह आकर्षित होकर कुछ न कुछ खरीद ही लेता है। विश्व के अनेक देशों के पर्यटन स्थलों पर भी यही होता है, यात्री ने टिकट ले लिया तथा वह पर्यटन स्थल में प्रवेश करने ही वाला है मगर उसे एक गिफ्ट शोप में होकर ही जाना पड़ेगा। राजा फिर इस शोप पर अटक गया। मैं उसे खींच कर ले गया। रात अधिक हो चुकी थी, सोना जरूरी था क्यूंकि मुझे तो सुबह 4 बजे वापस उठ कर ट्विटर भेजना था।
अन्ततः हम लोग कमरे में पहुंचे बिस्तर पर अगले दिन के कार्यक्रम समग्र विवरण देने वाले सकूलर तथा अन्य कागजात थे। इन्हीं में एक ब्रेकफास्ट का आर्डर देने का फार्म भी था। इसके तहत सुबह का नाश्ता हमारे कमरे में ही सर्व सकता था। फार्म में सभी प्रकार के व्यंजनों, फलों, पेयों के नाम लिखे थे, समिष निरमिष सब हमें जो जो मंगाना है, उसके आगे टिक लगाना था। यह फार्म रात्रि 8 बजे तक भर कर कमरे के बाहर लटकाना था मगर 9 तो कब के बज चुके थे।
कमरे में एक टी.वी. लगा था। इस पर खबरी, फिल्मी अमरीकी कार्यक्रमों की चैनलों के अलावा एक चैनल पर जहाज की स्थिति बताई जा रही थी। उत्तरी पश्चिमी अमेरिका तथा दक्षिणी पश्चिमी कनाडा के तटों पर विभिन्न छोटे छोटे द्वीपों के पश्चिम में हमारा जहाज अग्रसर हो रहा था। इस चैनल पर चित्र बदलते जा रहे थे, कभी चलते हुए जहाज का अग्र भाग तथा कभी पृष्ठ भाग के जीवन्त चित्र दर्शाये जा रहे थे। टी.वी. पर यही चैनल हर दम चलता रहता था, कोई कार्यक्रम देखना हो तो चैनल बदल सकते थे।
जहाज की यात्रा का हमारा पहला दिन पूरा हो रहा था। दिन भर इतनी घटनाएं घटी तथा एसी व्यस्तता रही कि एसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम कई दिनों से जहाज में हैं। सुबह 4 बजे का एलार्म लगा कर सो गया। बत्ती बुझा कर लेटा एहसास हुआ कि जहाज चल रहा है। दिन भर की गहमा गहमी में जहाज के चलने की अनुभूति नहीं होती थी। अब जब बिस्तर पर निश्चल पड़ा था तो एसे लग रहा था जैसे कोई होले होले से झूला दे रहा है।
सुबह 4 बजे उठ कर काम निपटाया और घन्टे भर बाद वापस सो गया। सात-आठ बजे के करीब वापस नींद खुली। राजा तब तक सो ही रहा था। 15 अगस्त हो गया था। भारत में तो 15 अग. आते हैं, चले जाते हैं, ज्यादा से ज्यादा टी.वी. देख लिया और हो गया मगर भारत के बाहर रह कर इसकी महत्ता का एहसास हो रहा था। मन करता था जहाज पर उपस्थित भारतीय मूल के यात्रियों को एकत्र कर कोई छोटा मोटा सा कार्यक्रम करें। न्यूयार्क में तो अच्छी खासी परेड निकलती है, इस बार तो बाबा रामदेव भी परेड को सम्बोधित करने वाले थे। इन्हीं सब विचारों में डूबता उत्तराता में उठा। चाय नाश्ते के लिये वापस उपर ही जाना था। रात को अगर जल्दी से नाश्ते का फार्म भर देते तो नाश्ता कमरे में ही आ जाता, आज इस बात का ध्यान रखने का सोच कर मैं कमरे से बाहर निकला। बगल के कमरे में मुनीश भी सो रहा था मगर प्रीति कब की जा चुकी थी। जहाज में सुबह से ही इतनी गतिविधियां शुरू हो जाती हैं कि यात्रियों के लिये यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किस गतिविधि में भाग ले, किस में नहीं प्रीति को बहुत कि वह हर एसी गतिविधि में भाग ले, इसके लिये वह सुबह से ही जुट जाती ।
मैं उपरी डेक पर पहुंचा दरवाजा खोलते ही टेबल टेनिस का टेबल नजर आया। यहां टेबल टेनिस प्रतियोगिता चल रही थी। एक दिन पूर्व सभी यात्रियों से हेतु अपने अपने नाम लिखाने को कह दिया था। टाईज पटक कर प्रतियोगियों की सूची लगा दी गई थी। हम तो दिन भर एसे मशगूल रहे कि इसका ही नहीं चला वरना राजा और मुनीश जरूर अपना नाम लिखते।
बां तरफ पूल साईड कैफे के काउन्टर पर भीड़ लगी थी। लोग गर्मागर्म भुट्टे हो ले कर उसका आनन्द उठा रहे थे। भुट्टे ओवन में बाफ कर दिये जा रहे थे, मुझे तो खीरों पर सेके भुट्टे खाने में ही मजा आता है, वह भी एक एक दाना खेर कर। यहाँ प्रीति भी नजर आ गई। स्पोर्टस शू पहने वह एकदम खिलाड़ी सी चुस्त नजर आ रही थी। वह 6 बजे ही उठ गई थी। सबसे पहले तो चौथे डेक पर स्थित वाक वे थोड़ी देर तक घूमी वहां बहुत भीड़ थी। कई यात्री अपनी मोर्निंग वाक के लिये आदर्श स्थान मानते थे। उसके पश्चात उसने एरोबिक क्लास में भाग लिया इसमें नृत्य के साथ व्यायाम किया जाता है। संगीत की धुन चलती रहती है। एक प्रशिक्षित टीचर सभी यात्रियों को इसका अभ्यास कराती थी। शिप की पूरी यात्रा के दौरान यह क्लास चलने वाली थी। इसे यहां कार्डियों क्लास कहते हैं क्यूंकि इसका सीधा सम्बन्ध हमारे हृदय की धमनियों को दृष्ट-पुष्ट रखने से है। प्रीति इससे बहुत प्रभावित थी, टीचर कुछ अच्छे व्यायाम सीखा रही थी। मैं उससे बात कर रहा था तभी राजा भी उठ कर आ गया। उसे सुबह सुबह चाय-सिगरेट नहीं मिले तो उसकी उतरती नहीं। हम केफेटेरिया की तरफ बढे, प्रीति को भी आने को कहा तो बोली वो फ्लावर एरेन्जमेन्ट क्लास जोईन करने जा रही है। मैंने सोचा कि यह यहां छुट्टियां मनाने आई है कि क्लास एटेन्ड करने। एक के बाद एक क्लास।
हम उसे वहीं छोड़ आगे बढे पूल में ढेर सारे लोग धमा चौकड़ी मचाए हुए थे। राजा एक कप चाय लेकर बाहर डेक पर सिगरेट पीने निकल गया। मैं भी कुछ ब्रेड, क्रोइसां, टमाटर का रस लेकर उसके पीछे हो गया। बाहर तेज हवाएं चल रही थीं, लहरें आन्दोलित थी, जहाज हलका सा डगमगा रहा था, पहली बार एहसास हो रहा था कि हम समुद्र के बीचों बीच हैं।
जहाज पर एक अच्छा खासा जिम भी था। इसमें व्यायाम करने क तरह की मशीनें थी। यहां भी एक ट्रेनर रहता था जो मशीनों का उपयोग करन सीखाता था। यहीं एक हाल में योग की क्लासेज भी चलती थी अत्यन्त उत्साह से भाग लेते थे। जहाज में एक प्रार्थना घर भी था। यहां एक निश्चित समय पर प्रार्थना करता था व प्रवचन देता था। बाकी समय प्रार्थना घर का इस्तेमाल अन्य धर्म के लोग भी अपने अपने पूजा-पाठ केल सकते थे।
कई तरह की क्लासेज और वर्क शोप्स दिन को चलती थी। इसमें एक वर्क शोप एसी थी जिसमें लोगों को ढंग से चलना सिखाया जाता था। मैंने तो मुझे हंसी आ गई कि बच्चों को तो चलना सिखाते हैं मगर क्या बड़ों को सिखाना पड़ता है। यहां के ट्रेनरों का मानना था कि ढंग से नहीं चलने के घुटने तथा पुढे खराब हो जाते हैं। यहां पर चाल सिखाने के अलावा जूतों के की गुणवत्ता पर भी ध्यान केन्द्रित करते थे। जूतों में लगाने वाले पेडिंग तथा इन्सर्ट भी यहां बेचे जाते थे। कुल मिला कर देखा जाय तो यह अपने उत्पाद की मार्केटिंग का प्रयास ही ज्यादा था बनिस्पत लोगों की चाल ठीक करने के।
हम लोग चाय नाश्ता करके लौटे तो रास्ते में फिर केसीनो मिल गया। सुबह का वक्त था फिर भी कुछ वरिष्ठ बैठे हुए थे मशीनों पर पास ही लाइब्रेरी भी थी। यह किसी खेल की तैयारी की जा रही थी।
Editorial

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