Indian Penal Code Reforms
विभूति नारायण राय : विश्व की सबसे पुरानी और मूल स्वरूप से बिना बहुत छेड़छाड़ के सबसे अधिक समय तक अस्तित्व में रहने वाली दंड संहिता, जिसे आमफहम भाषा में आईपीसी (इंडियन पीनल कोड) कहा जाता है, शीघ्र ही अतीत की वस्तु बन जाएगी। 1860 में निर्मित और आज कई राष्ट्रों में विभक्त भारतीय उपमहाद्वीप में पहली बार कोई इतनी विस्तृत और मानवीय गतिविधियों के लगभग हर क्षेत्र को छूने वाली इस संहिता के बनने और प्रयोग में आने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। लगभग इसी के साथ अस्तित्व में आई दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी 1882 और 1973 ) तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम (1872 ) भी अपना वर्तमान नाम व स्वरूप खो देंगे।
डेढ़ शताब्दी से भी अधिक समय से भारत में फौजदारी न्याय व्यवस्था का मेरूदंड रही आईपीसी कई अर्थों में विशिष्ट है। इसके निर्माता वह प्रतिभाशाली लॉर्ड थॉमस बेबिंगटन मैकाले है, जिसे कई कारणों से भारत में गालियां मिली हैं। कोई शक नहीं कि वह नस्लवादी था और उसका यह दंभी वक्तव्य भी बार-बार दोहराया जाता है कि भारतीयों द्वारा रचित सारा वाङ्गमय किसी यूरोपीय पुस्तकालय के एक शेल्फ में समा सकता है। इसके बावजूद उसने भारत में न सिर्फ सही अर्थों में आधुनिक शिक्षा की नींव डाली, बल्कि मानवीय गतिविधियों के हर क्षेत्र को छूने वाली एक विस्तृत दंड संहिता भी बनाई । उसके द्वारा रचित यह इंडियन पीनल कोड कई अर्थों में अद्भुत है। पहली बार जातियों में विभक्त भारतीय समाज को ऐसा कानून मिला, जिसके समक्ष सभी बराबर थे । रूढ़िबद्ध वर्णाश्रमी समाज में तब्दील होने के बाद पहली बार ऐसा हो रहा था कि एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मण व शूद्र को अदालत समान प्रक्रिया द्वारा समान दंड देने लगी । शायद यही कारण है कि भारत में वर्चस्ववादी तबकों द्वारा मैकाले को बहुत कोसा गया है और आज भी उसके नाम से तरह-तरह के मनगढ़ंत वाक्य किताबों और नेट पर उद्धृत किए जाते हैं। खुद कानून के व्यावहारिक पहलुओं की बहुत कम जानकारी होने के बावजूद उसने इतने रोचक उदाहरणों द्वारा संहिता में वर्णित अपराधों का वर्णन किया कि एक समकालीन लेखक को कहना पड़ा कि उसके द्वारा रचित आईपीसी पढ़ते हुए किसी साहित्यिक कृति सा आनंद देती है।
अपराध और उनके लिए निर्धारित दंड समय सापेक्ष होते हैं। समाज अपने प्रचलित मूल्यों के अनुसार कुछ कृत्यों को अपराध घोषित करता है और फिर उनके लिए सजा का प्रावधान करता है। धर्म इन मूल्यों को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्था है । उदाहरण के तौर पर हम मैकाले की समलैंगिकता को लेकर बनी समझ को ले सकते इंडियन पीनल कोड अनुसार, यह एक दंडनीय अपराध है। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा शासित लगभग आधे विश्व ने आईपीसी के नमूने पर बने अपने कानूनों में इसे अपराध घोषित किया । इसी तरह मनुष्य के इतिहास में मृत्युदंड को आम स्वीकृति हासिल थी और आईपीसी ने भी कई अपराधों के लिए इसका प्रावधान कर रखा है। राजद्रोह एक ऐसा ही क्षेत्र है, जिस पर खूब विवाद होता है।त्रियों, बच्चों और युद्ध बंदियों जैसे वर्गों के खिलाफ किन कृत्यों को अपराध माना जाएगा, यह भी मूल्य सापेक्ष है और मैकाले भी अपने समय की मान्यताओं के अनुकूल ही व्यवहार करता है । जाहिर है, इन पर ईसाई धर्म का निर्णायक प्रभाव है।
यह तो स्वाभाविक ही था कि डेढ़ शताब्दियों तक चलने वाले इस कोड में मूलभूत बदलाव लाए जाते, पर यह देखना बड़ा रोचक होगा कि ये बदलाव किस हद तक उसे बदले समय के अनुकूल बना सके हैं । आज जब दुनिया भर में समलैंगिकता और समलैंगिक विवाहों को वैध बनाने के आंदोलन चल रहे हैं और भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे दंडनीय कृत्य की श्रेणी से हटा दिया है, आईपीसी का नया अवतार भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) इससे संबंधित धाराओं को काफी हद तक बनाए रखता है। महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न की परिभाषाएं विस्तृत की गई हैं, लेकिन वैवाहिक बलात्कार या 'मैरिटल रेप' पर यह खामोश है। शायद उसे लगता है कि भारतीय समाज में मूल्यों के स्तर पर अभी जरूरी बदलाव नहीं हुए हैं और पश्चिम द्वारा स्वीकृत इन मूल्यों तक पहुंचने में काफी समय लगेगा। एक और क्षेत्र है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परेशान करता है और यह राजर्दोह से जुड़ा है। आईपीसी की जगह बीएनएस का मसौदा पेश करते समय दावा यह किया गया कि यह औपनिवेशिक मानसिक दंडनीय दासता से मुक्ति का दस्तावेज है, लेकिन इसमें है। भी नाम बदलकर कई ऐसे प्रावधान मौजूद ब्रिटिश साम्राज्य रखे गए हैं, जिनका सरकारें असहमति के द्वारा शासित स्वर को दबाने के लिए दुरूपयोग कर सकती हैं। फांसी की सजा भी नए कानून में मौजूद है। आज जब दुनिया के अधिकांश सभ्य समाजों ने मृत्युदंड समाप्त कर दिया है, इसे बनाए रखने का हमारा फैसला यही दर्शाता है कि अभी अपनी न्याय प्रणाली को मानवीय बनाने के लिए हमें एक लंबी यात्रा करनी है। भीड़ हत्या या मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं से निपटने के लिए अपराध की एक नई श्रेणी जोड़ी गई है और अगर कार्यपालिका ने जरूरी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया, तो इसका दूरगामी परिणाम भारतीय समाज पर पड़ेगा।
प्रस्तावित तीनों नए कानूनों में कुछ रेखांकित किए जाने लायक परिवर्तन शामिल हैं। तकनीक के बढ़े इस्तेमाल से पुलिस तफतीश अधिक पारदर्शी होगी और मुकदमों के निस्तारण में भी तेजी आएगी। यदि सरकारें जरूरी संसाधन और प्रशिक्षण उपलब्ध करा पाईं, तो फोरेंसिक साइंस का प्रयोग तफतीशी अधिकारी का पूरा प्रोफाइल ही बदलकर रख देगी। तकनीक का उपयोग अदालतों की कार्यवाही में भी आमूल-चूल परिवर्तन ला सकता है, जिससे समय और संसाधन, दोनों की बचत हो सकेगी। इन सबके बावजूद सीआरपीसी के नए अवतार बीएनएसएस में अदालतों में देरी के कई प्रमुख कारणों से निपटने की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। आम जानकारी है कि मुकदमों में लंबे स्थगन आदेशों के पीछे अदालतों से जुड़े लोगों का ही हाथ होता है, पर उनसे यह नया कानून कैसे निपटेगा, बहुत स्पष्ट नहीं है।
जनता के अनुभवों से उपजी कई धारणाएं हमारे समाज में मौजूद हैं, जिनमें एक यह है कि दीवानी का मुकदमा दादा दाखिल करता है और फैसला पौत्र (यदि सौभाग्यशाली हुआ) के जीवन में होता है । दूसरा फौजदारी मामलों को लेकर है, जिसके अनुसार, यदि कोई ताकतवर है, तो अपने जीवन भर अदालतों को चक्कर में डाले ही रख सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि नए कानून इन धारणाओं को किस हद तक बदल पाते हैं।
Editorial

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