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अपनी हदें पार करता अंध विरोध
By EditorialPublished on
लोग किसी दल या नेता कुछ या फिर सरकार अथवा संस्था का विरोध करते-करते किस तरह देश विरोध की हद तक चले जाते हैं, इसका ताजा उदाहरण पेश किया अभिनेता प्रकाश राज ने। उन्होंने बीते रविवार को एक्स (पूर्व में ट्विटर) प्लेटफार्म पर चंद्रयान- 3 (chandrayaan-3) को लेकर एक फोटो पोस्ट की। इसमें लिखा ब्रेकिंग न्यूज: विक्रम लैंडर द्वारा चंद्रमा से आने वाली पहली तस्वीर । '
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राजीव सचान... लोग किसी दल या नेता कुछ या फिर सरकार अथवा संस्था का विरोध करते-करते किस तरह देश विरोध की हद तक चले जाते हैं, इसका ताजा उदाहरण पेश किया अभिनेता प्रकाश राज ने। उन्होंने बीते रविवार को एक्स (पूर्व में ट्विटर) प्लेटफार्म पर चंद्रयान- 3 (chandrayaan-3) को लेकर एक फोटो पोस्ट की। इसमें लिखा ब्रेकिंग न्यूज: विक्रम लैंडर (Vikram Lander) द्वारा चंद्रमा से आने वाली पहली तस्वीर । '
यह फोटो एक कार्टून के रूप में थी, जिसमें एक मलयाली से लगने वाले व्यक्ति को अजीब सी मुद्रा में एक मग से दूसरे में चाय डालते हुए दिखाया गया था। उनकी इस पोस्ट पर लोग भड़क उठे। आम लोगों के साथ कई जाने-माने व्यक्तियों ने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। इस पर उन्होंने अपनी सफाई में लिखा कि वह तो यह बताना चाहते थे कि मलयाली लोग दुनिया में हर कहीं हैं और यहां तक कि चांद पर भी । उन्होंने यह भी समझाने की कोशिश की कि यदि आप मेरा मजाक नहीं समझ सके तो उपहास के पात्र आप स्वयं हैं। यह प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या दुनिया भर में फैले मलयाली चाय बेचने के लिए जाने जाते हैं?
प्रकाश राज (prakash raj) किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह कन्नड़ (kannada), तमिल (Tamil), तेलुगु (Telugu) और मलयालम (Malayalam) के साथ हिंदी फिल्मों में भी काम कर
चुके हैं। इनमें से कई हिट फिल्में रही हैं। वह आम तौर पर खलनायक के रूप में पर्दे पर आते हैं। वांटेड, सिंघम और दबंग-2 जैसी सफल हिंदी फिल्मों में काम करने के कारण उनकी राष्ट्रीय पहचान बन गई है, लेकिन हिंदी भाषा की जिन फिल्मों ने उन्हें मान- सम्मान दिया, वह उसके भी विरोधी हैं। कुछ वर्ष पहले हिंदी दिवस के अवसर उन्होंने एक ऐसी टी-शर्ट पहनी, जिसमें कन्नड़ भाषा में लिखा था- मुझे हिंदी नहीं आती, दफा हो जाओ! क्या यह विचित्र नहीं कि वह हिंदी फिल्मों में काम करते हैं और हिंदी बोलते भी हैं, लेकिन उन्हें यह भाषा स्वीकार नहीं? अरे भाई, हिंदी से इतना बैर है तो हिंदी फिल्मों में काम ही क्यों करते हो? प्रकाश राज राजनीतिक विषयों पर भी बेबाकी से बोलते हैं। वह टीवी चैनलों की बहसों में भी शामिल होते रहते हैं। उन्होंने 2019 में बेंगलुरू सेंट्रल से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था, लेकिन हार गए थे। वह भाजपा (BJP) के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) के भी कटु आलोचक हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं। लोकतंत्र में यह अधिकार जैसे अन्य लोगों को है, वैसे ही उन्हें भी है। वह प्रधानमंत्री का भी खुलकर विरोध कर सकते हैं, लेकिन एक तो उन्हें विरोध और अंध विरोध में अंतर करना आना चाहिए और दूसरे, यह समझना चाहिए कि भारत सरकारविरोध की हद लांघना ठीक नहीं।
उन्होंने सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक यानी इसरो (ISRO) का किया। ऐसा करने वाले वह अकेले उपहास उड़ाने में भी संकोच नहीं नहीं हैं। देश में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो यह समझने को तैयार नहीं कि भारत सरकार (Bharat Sarkar) का विरोध करते हुए देश विरोध की हद नहीं लांघी जानी चाहिए। हर देश में कुछ संस्थाएं ऐसी होती हैं, जिनका आदर सभी करते हैं। इसरो एक ऐसी ही संस्था हैं। इसी तरह की संस्था हमारी सेना है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि किस तरह कुछ नेताओं ने सर्जिकल स्ट्राइक (Surgical strike) के प्रमाण मांगे थे। राहुल गांधी (Rahul gandhi) ने तो यहां तक कह दिया था कि प्रधानमंत्री जवानों के खून की दलाली कर रहे हैं। एक प्रख्यात पत्रकार और लेखक ने तो सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जिकल स्ट्राइक करार दिया था।
कुछ इसी तरह का काम एयर स्ट्राइक (air strike) के समय भी किया गया था । तब कई लोग कह रहे थे कि आखिर सरकार यह क्यों नहीं बताती कि बालाकोट में कितने आतंकी मारे गए ? यह भी विस्मृत नहीं किया जा सकता कि एक जनरल बिपिन रावत को 'गली का कांग्रेसी नेता ने किस तरह सेनाध्यक्ष गुंडा' करार दिया था। जब नेशनल बुक ट्रस्ट ने अदम्य साहस का परिचय देने वाले सैनिकों पर 'वीरगाथा: परमवीर चक्र अवार्डीस' नाम से पुस्तकें प्रकाशित कीं तो एक न्यूज पोर्टल ने लिखा कि बच्चों के लिए लिखी गईं ये किताबें बहादुरी नहीं, बल्कि हिंसा को बयान करती हैं।
यह भी किसी से छिपा नहीं कि कश्मीर (kashmir) को लेकर किस तरह चीन (Chin) और पाकिस्तान (pakistan) को रास आने वाले बयान हमारे नेताओं की ओर से दिए गए थे। ऐसे बयानों को चीन और पाकिस्तान ने भुनाया भी । नेता और राजनीति में दखल देने वाले अभिनेता अंध विरोध से ग्रस्त हो जाएं तो एक बार को समझ आता है, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा भी प्रायः अंध विरोध की हदों को पार कर जाता है। जब बह्मपुत्र नदी पर असम के डिब्रूगढ़ को अरूणाचल के पासीघाट से जोड़ने वाला देश का सबसे लंबा सड़क तब एक अंग्रेजी साप्ताहिक में लिखा और रेल पुल बनकर तैयार हुआ, गया कि इस पुल के बन जाने से तो नावों से सामान ढोने वालों नाविकों का नुकसान होगा। यदि आपको याद हो तो यह भी कहा जा चुका है कि हाईवे और एक्सप्रेसवे का उपयोग तो धनी लोग करते हैं। आखिर गरीबों को इनसे क्या लाभ?
यह भी ध्यान रहे कि बुलेट ट्रेन परियोजना का मजाक उड़ाया जा चुका है। पिछले कुछ समय से एक के बाद एक वंदे भारत ट्रेनें (Vande Bharat trains) चलाई जा रही हैं, लेकिन इसी के साथ देश के विभिन्न हिस्सों पथराव की भी खबरें आ रही हैं। पता नहीं कौन हैं वे लोग, जो इन ट्रेनों को निशाना बना रहे हैं,ये वही हो सकते हैं, जिन्हें देश की प्रगति से इतनी अधिक जलन है कि राष्ट्रीय संपदा को नष्ट कर आनंदित होना चाह रहे हैं।

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