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धर्म के देव होते हैं साधु : आचार्य महाश्रमण
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भगवती सूत्र में एक प्रश्न किया गया कि देव कितने प्रकार के होते हैं? भगवान महावीर (Bhagwan Mahavira) ने उत्तर प्रदान करते हुए कहा कि पांच प्रकार के देव बताए गए हैं- भव्य-द्रव्य देव, नर देव, धर्म देव, देवाति देव और भाव देव।

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मुंबई । भगवती सूत्र में एक प्रश्न किया गया कि देव कितने प्रकार के होते हैं? भगवान महावीर (Bhagwan Mahavira) ने उत्तर प्रदान करते हुए कहा कि पांच प्रकार के देव बताए गए हैं- भव्य-द्रव्य देव, नर देव, धर्म देव, देवाति देव और भाव देव।
इन पांच प्रकार के देवों की व्याख्या करते हुए बताया गया कि वह जीव जो अगले जन्म में देव गति में पैदा होने वाला होता है वह भव्य-द्रव्य देव होता है। इसमें कई मनुष्य और तीर्यंच गति के जीव भी हो सकते हैं। इस श्रेणी में साधु और श्रावक भी आते हैं। दूसरे प्रकार के देव नर देव होते हैं। भौतिक जगत में चक्रवर्ती सर्वोच्च होते हैं। तो मानव होते हुए भी देव के समान होते हैं। इसलिए वे नर देव कहे जा सकते हैं।
तीसरे प्रकार के देव धर्म देव होते हैं। धर्म की दृष्टि से जो पूजनीय होते हैं, वे धर्मदेव कहलाते हैं। धर्म की दृष्टि से देखा जाए तो साधु आमजन के लिए पूजनीय होते हैं तो साधु धर्म देव होते हैं। चौथे प्रकार के देव देवातिदेव कहे जाते हैं। अर्हत् भगवान जो सर्वज्ञ होते हैं, तीर्थंकर जो केवलज्ञानी होते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान को जानने वाले होते हैं, वे देवातिदेव होते हैं। पांचवे प्रकार के देव भाव होते हैं। वह जीव तो आयुष्य पूर्ण कर देव गति में पैदा होते हैं, वे भाव देव होते हैं। इस प्रकार देव के इस विभाग में मनुष्य, तीर्यंच, देव सभी समाहित हो जाते हैं। देव होना भी बड़े सौभाग्य की बात होती है। कई मनुष्य ऐसे भी होते हैं, जो एक जन्म के बाद ही देव गति को प्राप्त हो जाते हैं। भगवान शांतिनाथ की आत्मा ने एक ही जन्म में भौतिकता के शिखर पुरुष चक्रवर्ती भी बने और साधु दीक्षा लेकर अध्यात्म जगत के शिखर पुरुष तीर्थंकर भी बन गए। उक्त देवों के प्रकार की व्याख्या आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने बुधवार को तीर्थंकर समवसरण में की। इसके बाद उन्होंने आचार्य कालूगणी के गंगापुर प्रवास के ल प्रसंगों को प्रस्तुत किया।

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