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कर्म के आधार पर है संसार में भिन्नता
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आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने मंगलवार को भगवती सूत्र आगम के आधार पर कहा कि दुनिया में भिन्नताएं देखने को मिलती हैं। एक ही जीव भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है। एक बच्चा जन्म लेता है शिशु रूप में, फिर किशोर, युवा, प्रौढ और वृद्धावस्था को प्राप्त करता है और फिर मृत्यु को भी प्राप्त कर लेता है। जीव कभी नरक, तीर्यंच, मनुष्य और कभी देव गति में भी पैदा होता है। कोई-कोई भव्य जीव साधना के आधार पर मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है। मनुष्य की तुलना में नरकीय और देव गति के जीवों की संख्या बहुत अधिक होती है

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मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने मंगलवार को भगवती सूत्र आगम के आधार पर कहा कि दुनिया में भिन्नताएं देखने को मिलती हैं। एक ही जीव भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है। एक बच्चा जन्म लेता है शिशु रूप में, फिर किशोर, युवा, प्रौढ और वृद्धावस्था को प्राप्त करता है और फिर मृत्यु को भी प्राप्त कर लेता है। जीव कभी नरक, तीर्यंच, मनुष्य और कभी देव गति में भी पैदा होता है। कोई-कोई भव्य जीव साधना के आधार पर मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है। मनुष्य की तुलना में नरकीय और देव गति के जीवों की संख्या बहुत अधिक होती है। यह जीव की व्यवहार राशि में भिन्नता है। दुनिया की समस्त भिन्नताएं कर्मों के आधार पर होती हैं। जैन दर्शन कर्मवाद को मानने वाला है। कोई गोरा, कोई काला, कहीं जन्म, कहीं मृत्यु, कहीं शादी तो कहीं दीक्षा, कितने देश, कितनी भाषाएं, कितने रूप आदि की विभिन्नताएं देखने को मिलती हैं। मनुष्यों में ही कोई बुद्धिमान होता है तो कोई मंदबुद्धि भी होता है। कितने मनुष्य शांत स्वभाव वाले होते हैं तो कितने अत्यधिक क्रोध वाले भी होते हैं। कितने मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं तो कितने लोग अल्पायु वाले भी होते हैं। कितने-कितने लोगों को प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो कितने अपमानित-सा जीवन भी जीते होंगे। कितने-कितने उद्योगपति हैं, धनाढ्य हैं तो दुनिया में कितने निर्धन भी हैं। यह भिन्नताएं कर्म के कारण ही होती है, अकर्म से नहीं। आदमी इस सिद्धांत को समझकर अच्छा कर्म करने का प्रयास करे। आदमी अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों में भी समताभाव रखने का प्रयास करे और अपने पूर्वकृत कर्मों को धर्म-साधना, स्वाध्याय, जप, तप के द्वारा काटकर हल्का बनने का प्रयास करे। आदमी को बुरी प्रवृत्तियों को छोड़ने और अपने कर्म को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए।
इसके बाद उन्होंने गंगापुर चतुर्मास (Gangapur Chaturmas) के दौरान आचार्य कालूगणी के स्वास्थ्य में हुई गड़बड़ी के बाद संघ की आगे की व्यवस्था पर आचार्य कालूगणी और मुनि मगनजी के बीच हुई वार्ता और उसके घोषणा से संबंधित प्रसंगों का वर्णन किया।

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