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विरोध की बेजा दलीलें
By EditorialPublished on
ए. सूर्यप्रकाश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने कुछ दिन पहले समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया। इससे पहले विधि आयोग इस पर विमर्श शुरू कर चुका है। विधि आयोग को इतनी प्रतिक्रियाएं मिली हैं कि उसे इस पर सुझाव देने की मियाद

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ए. सूर्यप्रकाश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने कुछ दिन पहले समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया। इससे पहले विधि आयोग इस पर विमर्श शुरू कर चुका है। विधि आयोग को इतनी प्रतिक्रियाएं मिली हैं कि उसे इस पर सुझाव देने की मियाद बढ़ानी पड़ी। भारत (India) में सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधता के चलते प्रतिक्रियाओं में इतनी व्यापकता स्वाभाविक है।
समान नागरिक संहिता (uniform civil code) को लेकर देश भर से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं ही मिली हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय और आदिवासी वर्ग के नेताओं की ओर से विरोध के स्वर सुनाई पड़े। इसमें आदिवासी समाज की बात तो समझ आती है, क्योंकि देश में भिन्न-भिन्न प्रकार के आदिवासी समूह हैं और प्रत्येक समूह की अपनी अपनी मान्यताएं और रस्म रिवाज हैं। विरोध के इन स्वरों के बीच इस बिंदु पर ईमानदारी से विचार किया जाना चाहिए कि क्या न्याय, समानता और बच्चों के अधिकारों जैसे हमारे संविधान के मूल सिद्धांत पूरी तरह से देश में लागू हो पाए हैं? समान नागरिक संहिता (uniform civil code) के मुद्दे से जुड़े विभिन्न पहलुओं की अपनी जटिलताएं हैं, लेकिन कुछ वर्गों की ओर से इसका विरोध समझ नहीं आता। इसके विरोधियों में एक तबका तो वही नेहरूवादी छद्म-पंथनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ने वाला वर्ग है, जिसने हमेशा उन मुस्लिम परंपराओं का बचाव किया है, जो भले ही मूलभूत संवैधानिक मूल्यों का मखौल उड़ाती हों।
दरअसल यह दौर संविधान सभा में कई साल पहले हुई बहस की पुनरावृत्ति कराने वाला है। तब संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने संशोधन प्रस्ताव रखा कि समुदायों के पर्सनल कानूनों को किसी सूरत में न छेड़ा जाए। मोहम्मद इस्माइल साहिब, नजीरूद्दीन अहमद, महबूब अली बेग साहिब बहादुर, बी. पोकर साहिब बहादुर और हुसैन इमाम ने यह प्रस्ताव रखकर एक तरह से समान नागरिक संहिता की राह ही रोक दी। उसके इतने वर्षों बाद वर्तमान दौर भी यही दर्शाता है कि ऐसे मामलों में देश में कुछ भी नहीं बदला। समान नागरिक संहिता को लेकर मस्लिम समुदाय का विरोध जस का तस कायम है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड, जमीयत-ए-उलमा-ए-हिंद, दारूल उलूम देवबंद के मौलाना अरशद मदनी, असदुद्दीन ओवैसी, सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क मुस्लिम समुदाय से जुड़े कुछ प्रमुख संस्थान और व्यक्ति रहे, जिन्होंने समान नागरिक संहिता का मुखर विरोध किया है।
संविधान सभा में उक्त मुस्लिम सदस्यों के विचारों को भी जान लीजिए जो यह गारंटी चाहते थे कि पर्सनल कानून अक्षुण्ण बने रहें। हसैन इमाम ने कहा कि क्या भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में नागरिक कानूनों में एकरूपता हो सकती है ? मोहम्माद इस्माइल साहिब ने दावा किया कि पर्सनल कानून उनके मजहब का हिस्सा हैं और समान नागरिक संहिता से असंतोष एवं विसंगतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। नजीरूद्दीन अहमद ने कहा कि विवाह एवं विरासत से जुड़े कानून इस्लामिक परंपरा का हिस्सा हैं और इस कारण अपरिवर्तनीय हैं। महबूब अली बेग साहिब बहादुर ने कहा कि उत्तराधिकार, विरासत, विवाह और तलाक जैसे मसले पूरी तरह इस्लाम से निर्धारित होते हैं, लिहाजा उनके साथ कोई छेड़छाड़ न की जाए। पोकर साहिब बहादुर ने तो यहां तक कह दिया कि समान नागरिक संहिता से जुड़ा अनुच्छेद एक तानाशाही प्रवृत्ति वाला प्रविधान है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और अगर यह अनुच्छेद पारित हो जाता है तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि तानाशाही होगी।
इन दावों पर डा. भीमराव आंबेडकर की प्रतिक्रिया ने यही दर्शाया कि मुस्लिम सदस्यों की दलीलें कितनी खोखली थीं। भारत जैसे विशाल एवं विविधतापूर्ण देश में समान नागरिक संहिता पर हुसैन इमाम के सवाल पर आंबेडकर ने बड़ी हैरानी जताते हुए कहा, हमारे देश में मानवीय संबंधों के लगभग प्रत्येक पहलुओं का संज्ञान लेने वाली एक समान कानून संहिता है। उन्होंने अपराध संहिता और संपत्ति के हस्तांतरण से लेकर कई ऐसे उदाहरण गिनाए, जो अपनी प्रकृति में नागरिक संहिता के अंतर्गत ही देश भर क लिए एकसमान है।
उन्होंने शरीयत कानून की अक्षुण्णता के मुस्लिम समुदाय के दावे की धज्जियां उडाते हुए कहा कि 1937 में शरीयत कानून लागू होने से पहले तक उत्तराधिकार के मामले में संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बांबे और मालाबार प्रांत सहित देश के बड़े हिस्से में मुस्लिम समुदाय हिंदू कानूनों के अनुरूप चलता रहा।मालाबार में तो मुस्लिम समुदाय मातृसत्तात्मक प्रकृति वाले मरूमक्कथायम कानून के अनुसार चला। ऐसे में मुस्लिम कानूनों के अपिरवर्तनीय होने के तर्क में कोई दम नहीं कि वे प्राचीन काल से इसी प्रकार चले आ रहे हैं। बात केवल इतनी ही नहीं थी। शरीयत अधिनियम, 1937 के प्रविधान भी हिंदू कानूनों से प्रेरित थे। इसमें मुसलमानों को वसीयत और वसीयतनामा बनाने की अनुमति दी गई। इसके पीछे माना जाता है कि यह समायोजन भी मोहम्मद अली जिन्ना और बड़े मुस्लिम जमींदारों के अनुकूल था। ऐसे में शरीयत कानूनों की अटल स्थिति भला कैसे स्थापित होती है?
केएम मुंशी ने हिंदू कानूनों में परिवर्तन के संदर्भ में कहा कि भले ही अधिकांश कानून मनु और याज्ञवल्क्य के विपरीत थे, पर उनकी राह आगे बढ़ी। उन्होंने कहा कि विरासत और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों का धर्म से कोई सरोकार नहीं और 'हम धर्म को पर्सनल कानूनों से अलग करना चाहते हैं।' अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर ने कहा कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत विवाह विशुद्ध रूप से एक नागरिक अनुबंध है। मुस्लिम न्यायशास्त्र की अवधारणा में यह संस्कार की श्रेणी में नहीं आता, लिहाजा मजहब के खतरे में पड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अय्यर ने इसे सारगर्भित रूप से समझाते हुए कहा, 'हम पूरे भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करना चाहते हैं। क्या हम अपने प्रयासों से इसमें सहायता कर रहे हैं या फिर इस देश को मंप्रदायों में अंतहीन संघर्ष के हवाले छोड़ना चाहते हैं।' केएम मुंशी इस मुद्दे पर और भी अधिक मुखर थे। उन्होंने कहा कि हमें अपना रूख नरम करते हुए सोचना चाहिए कि यह मामला धर्म-पंथ का नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से संथनिरपेक्ष कानून का है।

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