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जनमानस में लोकप्रिय हो रही वैश्विक कूटनीति
By EditorialPublished on
शिवेश प्रताप : वैचारिक विविधताओं से भरा भारत हुआ देश है। साथ ही राजनीतिक विमर्श देश के लोगों का सबसे बड़ा मनोरंजन भी है। भारत में राजनीति का अर्थ केवल राजनीतिक दलों की बातों तक सीमित नहीं है। भारत में राजनीति का विमर्श नीतियों, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, सुर

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देश की आजादी के बाद भारतीय जनमानस के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते थे। अंतरराष्ट्रीय विषयों पर केवल सरकारी तंत्र कार्य करते थे, परंतु आम जनमानस इस विषय के प्रति उतना सजग नहीं था । विषय विशेषज्ञों को लगता था कि आम जनमानस के लिए गरीबी, भुखमरी एवं बेरोजगारी (Unemployment) महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। साथ ही, भारतीय विदेश नीति उनके लिए अहम मुद्दा नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञ भी तथाकथित एलीट वर्ग की ही राय पर अधिक फोकस करते थे। प्रसिद्ध शोध संस्था 'आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन' द्वारा वर्तमान भारतीय विदेश नीति को लेकर देश के युवाओं के बीच हाल ही में एक सर्वे किया गया है। इस अध्ययन में एकतरफा रूप से कई विषयों पर लोग एकमत पाए गए, जैसे चीन एवं पाकिस्तान के रूप में भारत के पड़ोसी शत्रु एवं रूस के रूप में भारत का एक नैसर्गिक मित्र । भारत-रूस मैत्री के बीच लोग सीमित आर्थिक अनुबंधों पर भी चिंतित दिखे, तो वहीं दूसरी ओर रूस एवं चीन की गहरी दोस्ती भारतीयों को चिंतित करती है । लोगों के द्वारा भारत एवं अमेरिका के संबंधों पर सकारात्मक रूख दर्शाया गया ।
भारत सामान्य तौर पर अमेरिका तथा चीन की आपसी प्रतिस्पर्धा में तटस्थ रहता है, परंतु भारत के हितों आधार पर 73 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका का पक्ष लेने का समर्थन किया है। चीन, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान को छोड़कर शेष सभी पड़ोसी देशों को लोगों ने भारत के लिए विश्वासपात्र माना । भारतीय नागरिकों द्वारा कोविड, आतंकवाद एवं जलवायु परिवर्तन जैसे गैर पारंपरिक विषयों एवं दूसरे देशों से पैदा होने वाली सुरक्षा संकट की भी चर्चा की गई। लगभग 91 प्रतिशत भारतीय नागरिक संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता को महत्वपूर्ण मानते हैं। ये सब बातें यह सिद्ध करती है कि भारतीय जनता वर्तमान में विदेश नीति से अनभिज्ञ नहीं है । यह अध्ययन इस तथ्य को साबित करता है कि परिवर्तनशील विश्व में भारत के हितों के साथ देश की जनता किस प्रकार से अपने विचारों में परिवर्तन कर रही है।
विदेश नीति की लोकप्रियता के प्रमुख कारक : विदेश नीति को अपने नागरिकों के बीच लोकप्रिय बनाने के पीछे मोदी सरकार के कुछ विशेष गुणों का महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही, पिछले 10 वर्षों में हुए स्मार्टफोन तथा इंटरनेट क्रांति ने भी इस क्षेत्र में व्यापक योगदान देते हुए बड़े शहरों से छोटे गांव तक सभी को मुख्यधारा से जोड़ दिया है। एक संबंधित शोध रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 68 प्रतिशत जनसंख्या किसी भी समाचार को सबसे पहले स्मार्टफोन पर देख लेती है। इस तरह से हम यह भी कह सकते हैं कि इंटरनेट और स्मार्टफोन के कारण वैश्विक समाचारों की पहुंच गांव तक हो चुकी है। वैसे इस मामले में समाचार पत्रों का भी व्यापक योगदान है जिसे लोग किसी विषय विशेष पर तथ्यात्मक और व्यापक जानकारी प्राप्त करने के लिए आवश्यक रूप से पढ़ते हैं ।
डायस्पोरा पालिटिक्स : केंद्र सरकार की विदेश नीति का यह महत्वपूर्ण अंग है। प्रधानमंत्री मोदी जब भी किसी अंतरराष्ट्रीय लोगों से संवाद अवश्य करते हैं। यात्रा पर जाते हैं, वहां रहने वाले भारतीय मूल प्रधानमंत्री की सभी अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में सर्वाधिक चर्चा वहां के प्रवासी भारतीयों से मिलने की होती है। प्रवासी भारतीयों को अपनी जड़ों से जुड़ने तथा भारत के विकास में उनका योगदान सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री उन्हें प्रेरित भी करते हैं। दशकों तक भारत सरकार का संवाद प्रवासी भारतीयों के साथ नहीं के बराबर रहा। पहली बार यह संवाद अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के साथ व्यापक संवाद कायम करते हुए देश में प्रारंभ हुआ । वर्तमान सरकार ने प्रवासियों के विकास में उनके योगदान को सुनिश्चित किया है। वस्तुतः नरेन्द्र मोदी प्रवासी भारतीयों को ब्रेन- ड्रेन के बजाय ब्रेन - गेन समझते हैं। आज संसार के 136 देशों में फैले लगभग 8 करोड़ लोगों का एक मजबूत समूह सालाना 87 अरब डालर भारत भेजता है । साथ ही, प्रवासी भारतीय जिस देश में हैं वहां की अर्थव्यवस्था में भी बढ़-चढ़कर योगदान दे रहे हैं। जैसे यूके की जनसंख्या में मात्र 1.8 प्रतिशत का योगदान देने वाले भारतीय वहां की जीडीपी में 6 प्रतिशत का योगदान देते हैं। इतना ही नहीं, भारतीय प्रवासियों ने विश्व भर में भारत का सांस्कृतिक राजदूत बनकर देश के प्रति कायम नकारात्मक विचारों को सकारात्मक बिंदुओं में बदलने का भी कार्य किया है।
वर्तमान सरकार द्वारा विदेश नीति में भारत की सफलताओं को अपने राजनीतिक अभियानों में भी बढ़-चढ़कर सराहा गया। जनता के चुनावी रूझान कोइन नीतियों ने बड़े स्तर तक प्रभावित भी किया। उदाहरणस्वरूप एयर स्ट्राइक ने आम जनमानस को संतुष्ट पुलवामा आतंकी हमले के बाद किए गए किया। लिहाजा भारत का मतदाता चुनाव के समय अब घरेलू मुद्दों के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति से संबंधित मामलों को भी ध्यान में रखता है।

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