India's development roadmap
संजय गुप्त : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले (Red Fort) की प्राचीर से अपने संबोधन में स्वाभाविक रूप से अपनी सरकार की उपलब्धियां बताने के साथ ही विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए भावी पथ का विस्तार से उल्लेख किया। चूंकि प्रधानमंत्री अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अंतिम बार स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित कर रहे थे, इसलिए उनके भाषण पर देश-दुनिया की निगाहें कुछ अधिक ही लगी हुई थीं।
लाल किले से प्रधानमंत्री के संबोधन का अपना विशेष महत्व होता है, क्योंकि इससे सरकार की भावी दिशा दशा की झलक मिलती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने 2014 से अब तक इस अवसर पर जो भाषण दिए, वे कई अहम घोषणाओं के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन से देश की जनता को न केवल प्रेरित किया, बल्कि यह भरोसा भी दिलाया कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके अलावा पारंपरिक कौशल वालों के कल्याण के लिए उन्होंने विश्वकर्मा योजना शुरू करने की घोषणा की। यह एक महत्वाकांक्षी योजना है ।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले लगभग दस वर्षों में देश ने कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है। इसका सबसे अधिक श्रेय चुनौतियों से निपटने की प्रधानमंत्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को जाता है। यह उनके सक्षम नेतृत्व का ही परिणाम है कि देश कोविड महामारी जैसी वैश्विक चुनौती से निपट सका। उस कठिन दौर में जब विश्व की तमाम अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गई थीं तब देश की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत संभली रही। आज भारतीय अर्थव्यवस्था में जो तेजी दिख रही है, वह प्रधानमंत्री की दूरदर्शी नीतियों का ही प्रतिफल है।
अपने संबोधन में उन्होंने देश को यह याद दिलाया कि पिछली सरकारों में किस तरह गरीबों के कल्याण के लिए खर्च किया जा वाला धन भ्रष्ट तत्वों की जेब में पहुंच जाता था। आज अगर यह स्थिति बदली है तो इसकी सबसे बड़ी वजह सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन किए गए संस्थागत सुधार हैं। यह उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार लगभग 27 लाख करोड़ रूपये अनेक योजनाओं के पात्र लाभार्थियों के खाते में सीधे भेजने में सफल रही है।
घरेलू मोर्चे पर अनेक सफलताएं अर्जित करने के साथ प्रधानमंत्री ने भारत का अंतरराष्ट्रीय मान-सम्मान बढ़ाने का भी काम किया है। प्रधानमंत्री ने इसका उल्लेख करते हुए वे कारण भी गिनाए, जिनकी वजह से दुनिया भारत की ओर आशा भरी निगाह से देख रही है। इनमें से एक भारत की युवाशक्ति है। विश्व में 30 वर्ष से कम आयु की सबसे अधिक आबादी भारत में ही है। इस युवाशक्ति को यह अवसर मिला है कि वह अपनी ऊर्जा और संकल्प से देश को वह समृद्धि प्रदान करे जो कभी भारत की पहचान हुआ करती थी ।
यह अनायास नहीं कि प्रधानमंत्री ने एक बार फिर भ्रष्टाचार को वह दीमक बताया जो देश की संभावनाओं को खोखला कर रहा है। लाल किले की प्राचीर से उन्होंने भ्रष्टाचार को हर कीमत पर जड़ से मिटाने की बात कहकर नए सिरे से साफ कर दिया कि वह इसे सहन करने को तैयार नहीं। उनका यह संकल्प इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की समस्या जस की तस है।
मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार में शामिल रसूख वाले तत्वों के खिलाफ किस तरह कार्रवाई तेज की है, इसका प्रमाण यह है कि केवल प्रवर्तन निदेशालय मनी लांड्रिंग रोकथाम कानून के तहत एक लाख करोड़ रूपये से अधिक की संपत्ति जब्त कर चुका है। इसके बाद भी यह एक यथार्थ है कि नेताओं और नौकरशाहों का एक वर्ग अभी भी भ्रष्टाचार में लिप्त है। उनका यह भ्रष्टाचार देश के विकास में बाधक है। प्रधानमंत्री ने जिस तरह इसे सबसे बड़ी बुराइयों में से एक बताया, उससे यह आस बंधी है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के प्रयास और तेज होंगे।
2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे। इस लिहाज से अगले 25 वर्षों को अमृतकाल माना जा रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री ने भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आने वाले पांच साल सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताए हैं। उनका मानना है कि सशक्त सक्षम भारत बनाने के लिए आगामी पांच वर्ष में जो कार्य किए जाएंगे, वे अगले एक हजार साल का समृद्ध भारत बनाने का आधार तैयार करेंगे। देश की अर्थव्यवस्था जिस गति से आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए इसमें संदेह नहीं कि 2047 तक भारत आर्थिक दृष्टि से दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में होगा, लेकिन विकसित देश की कसौटी का केवल यही पैमाना नहीं होता ।
कोई देश विकसित तब बनता है जब वह आर्थिक रूप से संपन्न होने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और अन्य नागरिक सुविधाओं के जरिये अपने लोगों को सुगम जीवन की अनुभूति भी कराए। नागरिक एवं बुनियादी सेवाओं के ढांचे को विश्वस्तरीय बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश के साथ-साथ राज्यों के शासन- प्रशासन को हर स्तर पर इच्छाशक्ति भी दिखानी होगी। इस इच्छाशक्ति का फिलहाल अभाव ही दिखता है। इसी कारण हमारे बड़े शहर भी अपेक्षित नागरिक सुविधाओं से लैस नहीं।
स्पष्ट है कि सरकारी कामकाज में गुणवत्ता के मानकों को पूरा करने के लिए व्यापक प्रशासनिक सुधारों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। प्रधानमंत्री इन सुधारों पर जोर देने के साथ ही नागरिकों से भी यह आग्रह कर रहे हैं कि उन्हें अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति सजग-सचेत होना होगा। देश की व्यवस्थाओं में जो खामियां हैं, उनके लिए कहीं न कहीं आम नागरिकों का रवैया भी जिम्मेदार है । आम नागरिकों में नियम-कानूनों की अनदेखी की जो प्रवृत्ति नजर आती है, उसके पीछे अपनी जिम्मेदारी न समझने का भाव ही है। अक्सर यह भाव अनुशासनहीनता के रूप में नजर आता है। आम लोगों को समझना होगा कि देश को सबल बनाने के लिए उन्हें अपने नागरिक दायित्वों के प्रति वैसा ही समर्पण दिखाना होगा, जैसा प्रधानमंत्री दिखा रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में परिवारवाद से लड़ने का जो संकल्प जताया, वह समय की मांग है। परिवारवाद सामाजिक न्याय के साथ-साथ देश की प्रगति में भी बाधक बना हुआ है। यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के भी विरूद्ध है। लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए सिद्धांत पर चलता है, जबकि परिवार आधारित राजनीतिक दलों के लिए परिवार ही सब कुछ होता है। अगर लोकतंत्र को और मजबूत बनाना है और विकास की रफ्तार तेज करनी है तो भ्रष्टाचार और परिवारवाद को पूरी तरह समाप्त करना होगा। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के भावी एजेंडे को रेखांकित कर दिया है। अब देश को भी उनके इस एजेंडे को पूरा करने के लिए उनके साथ कदम मिलाकर चलना होगा।
Editorial

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