Pratahkal-Acharya Mahashraman -Money earned by justice and policy is pure
मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने रविवार को तीर्थंकर समवसरण में भगवती सूत्र आगम के माध्यम से पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया आकाश में स्थित है। जैन दर्शन के अनुसार आकाश अनंत है। आकाश को दो भागों में बांटा जाता है- लोकाकाश और अलोकाकाश। आकाश ठहरने के लिए स्थान देता है। काल का कार्य बीतना होता है। कोई भी कार्य करने के लिए काल अर्थात समय की आवश्यकता होती है। जो आंखों से दिखाई दे रहा, वे सभी पुद्गल हैं। परमाणु रूप में भी पुद्गल होते हैं, जिन्हें सामान्य आंखों से नहीं देखा जा सकता। जहां छहों द्रव्य हों, वह लोक होता है। जीव और पुद्गल का सम्बन्ध होता है। वे एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। भगवती सूत्र में माया, छलना, वंचना के संदर्भ में बताया गया है कि माया पांच वर्ण, दो गंध, पांच रस और चार स्पर्श वाली होती है। माया में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श होता है।
कोई आदमी अपने जीवन में माया-धोखाधड़ी करता है तो पापचार में प्रवृत्त हो जाता है। माया आत्मा को पाप कर्मों का बंध कराने वाली होती है। वर्तमान में संसारी आत्मा कर्मों से बंधी हुई होती है। आदमी माया का व्यवहार करता है। आदमी इसी माया के कारण व्यापार, व्यवहार, समाज आदि में धोखाधड़ी करता है। दूसरों को ठगता है तो कभी टैक्स की चोरी आदि का भी प्रयास कर लेता है। कहीं झूठ बोलकर किसी को फंसा देना, झूठ बोलकर किसी का धन हड़प लेना, यह सबकुछ मायाचार होता है। झूठ, चोरी, छल, कपट और धोखाधड़ी से कमाया हुआ पैसा अशुद्ध होता है तथा न्याय नीति और श्रम से कमाया हुआ धन शुद्ध होता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में मायाचार से बचने और जीवन में सरलता, ऋजुता, सच्चाई, ईमानदारी और प्रमाणिकता जैसे सद्गुणों का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में पैसे की आवश्यकता हो तो न्याय और नीति के साथ शुद्ध धन को अर्जित किया जा सकता है। गृहस्थ जीवन में माया-धोखाधड़ी न आए, ऐसा प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन में प्रमाणिकता रखने का प्रयास करना चाहिए और अपनी आत्मा को पापों से बचाने का प्रयास करना चाहिए। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा ने भी उद्बोधित किया।
Editorial

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