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न्याय की दिशा में प्रभावी पहल
By EditorialPublished on
दिव्य कुमार सोती : भारत को ब्रिटिश राज के कानूनों से मुक्ति दिलाने की दिशा में सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। इसके तहत गृहमंत्री अमित शाह ने संबंधित कानूनों से जुड़े विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किए। इस पहल में भारतीय दंड संहिता को बदलकर भारतीय न्याय संहित किए जाने का प्रस्ताव है।

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दिव्य कुमार सोती : भारत (India) को ब्रिटिश राज के कानूनों से मुक्ति दिलाने की दिशा में सरकार (Government) ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। इसके तहत गृहमंत्री अमित शाह ने संबंधित कानूनों से जुड़े विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किए। इस पहल में भारतीय दंड संहिता को बदलकर भारतीय न्याय संहिता किए जाने का प्रस्ताव है। इसी के साथ दंड प्रक्रिया संहिता, जिसका अधिकांश भाग अंग्रेजों के जमाने का ही था, स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लाई जा रही है । अत्यंत महत्वपूर्ण और आम जनमानस को प्रभावित करने वाले इन विधेयकों को फिलहाल संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया है।
दशकों तक आतंकवाद (terrorism) के भुक्तभोगी रहे भारत के मुख्य दंडात्मक कानून में अभी तक कतिपय राजनीतिक कारणों के चलते आतंकवाद की कोई परिभाषा ही नहीं थी । प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता आतंकवाद और आतंकवादी कृत्यों की एक व्यापक परिभाषा देती है और ऐसे किसी कृत्य के द्वारा किसी की मृत्यु हो जाने पर न्यूनतम दंड आजीवन कारावास निर्धारित करती है जिसके दौरान अपराधी को पैरोल भी नहीं मिल सकेगी। यह अत्यंत स्वागतयोग्य प्रविधान है।
इसके साथ ही संवेदनशील आधारभूत ढांचे पर हमले को भी आतंकवादी कृत्य की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे किसी आतंकी कृत्य में किसी की मृत्यु न होने की स्थिति में न्यूनतम पांच वर्ष के कारावास का प्रविधान रखा है। इसे बढ़ाकर सात वर्ष से अधिक कर दिया जाना चाहिए। साथ ही, ऐसे मामलों में भी पैरोल का प्रविधान न हो, ताकि आतंकी किसी भी प्रकार से प्रक्रियात्मक लाभ न उठा सकें, क्योंकि सात वर्ष तक की सजा के मामलों में भारतीय न्यायपालिका से आने वाले कई फैसलों का रूझान प्रक्रियात्मक बिंदुओं पर लचीला रहा है।
प्रस्तावित कानून संगठित अपराध (Organized crime) पर चोट करते हुए पहली बार मुख्य दंडात्मक विधि में संगठित अपराध की भी एक व्यापक परिभाषा देता है जिसके अंतर्गत तीन या उससे अधिक व्यक्तियों द्वारा संचालित सतत आपराधिक गतिविधियों को इसमें अपराध की श्रेणी में रखा गया है। साइबर एवं आर्थिक अपराधों को भी इसमें शामिल किया गया है। इस परिभाषा को और धार देने के लिए सतत आपराधिक गतिविधि माने जाने के लिए ऐसे आपराधिक सिंडिकेट के विरूद्ध दस साल की अवधि में दो आरोपपत्रों पर न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाना काफी होगा। इसका प्रभाव यह होगा कि दर्जनों आपराधिक मुकदमे दर्ज होने पर भी माफिया सरगनाओं के बाहर घूमने का चलन समाप्त हो जाएगा। साथ ही अब किसी प्रदेश में संगठित अपराध के विरूद्ध विशेष कानून न होने पर भी भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत माफिया तत्वों पर कार्रवाई की जा सकेगी।
भारत में भीड़ द्वारा घृणा के कारण हत्या या मॉब लिंचिंग के विरूद्ध पहली बार सजा के विशेष प्रविधान किए गए हैं जिसके अंतर्गत न्यूनतम सात वर्ष कारावास से लेकर मृत्युदंड तक की सजा हो सकती है। माब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर मोदी सरकार पर राजनीतिक हमले होते रहे हैं, लेकिन यही सरकार ही इस अपराध के विरूद्ध कड़ा कानून लेकर आ रही है।
मोदी सरकार ने शाहीन बाग, सीएए विरोधी दिल्ली दंगों और 26 जनवरी को किसान आंदोलन के नाम पर गणतंत्र दिवस की परेड के समय लाल किले पर खालिस्तान समर्थकों के उपद्रव को झेला है। ये तथाकथित आंदोलन ऐसे समय पर हो रहे थे जब देश कोविड महामारी से जूझ रहा था या चीन के साथ युद्ध के कगार पर खड़ा था। ऐसे गंभीर समय में भी देश की राजधानी को घेर कर रखा गया था और उसके कई हिस्सों का संपर्क बाकी देश से कटा था । शाहीन बाग धरने के समय तो पूर्वोत्तर भारत को देश से काट डालने का आह्वान भी किया गया था। नए कानून में ऐसी देशविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए समुचित प्रविधान किए गए हैं जिनके अंतर्गत भड़काऊ भाषणों द्वारा देश की एकता-अखंडता को खतरे में डालने के लिए लोगों को भड़काना या विध्वंसक गतिविधियों के लिए उकसाना अब दंडनीय अपराध होगा जिसके लिए सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा होगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों को देखते हुए ये सभी सराहनीय कदम हैं, परंतु कुछ अन्य मामलों से जुड़े कुछ प्रविधानों पर और गहन चिंतन की आवश्यकता है। जैसे कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 195 का चौथा उपबंध ऐसी किसी झूठी या भ्रामक सूचना के प्रचार-प्रसार को दंडनीय बनाता है जिससे देश की एकता-अखंडता या सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न होता हो। इस प्रविधान की वर्तमान भाषा के अनुसार आपराधिक मंशा होना आवश्यक नहीं है। सतही तौर पर फेक न्यूज से निपटने के लिए यह अच्छा प्रविधान लगता है, मगर इंटरनेट मीडिया के इस दौर में इस पहलू के राजनीतिक दलों द्वारा दुरूपयोग किए जाने की आशंका है। अक्सर सरकारें कई घटनाओं को दबा देना चाहती हैं और उनसे जुड़े समाचारों को फर्जी बताकर अपने हित साधती हैं। ऐसे में प्रश्न यह है कि फेक न्यूज क्या है और क्या नहीं, यह कौन तय करेगा? पूर्व में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66-ए का ऐसा दुरूपयोग देखा जा चुका है।
इसी प्रकार धारा 194 (2) में ऐसे किसी भी कृत्य को दंडनीय माना गया है जिसके द्वारा समूहों, जातियों अथवा संप्रदायों के बीच तनाव उत्पन्न होता हो। भारत में कई ऐसे मत-मजहब हैं जो तमाम कुरीतियों और अंधविश्वासों से भरे हैं, परंतु उनकी आलोचना की स्थिति में वे मार-काट पर उतर आते हैं। ऐसे में उनके सुधार हेतु कही गई कोई बात या आलोचना भी अपराध की श्रेणी में आ जाएगी जो भारत की सामाजिक उन्नति के लिए सही नहीं है। इसी प्रकार नए कानूनों में पशुओं से अप्राकृतिक लैंगिक संबंध बनाने को दंडनीय बनाने वाला कोई प्रविधान नहीं है जबकि ऐसे संबंध गंभीर संक्रामक रोगों का कारण बन सकते हैं। ऐसे कुछ अपराध सांप्रदायिक तत्वों द्वारा उन पशुओं के खिलाफ गलत मंशा से भी किए जाते हैं, जिनके प्रति दूसरा समुदाय आस्था रखता है। इन प्रविधानों पर पुनर्विचार और उन्हें अधिक युक्तिसंगत बनाना हमारे पिछले सामाजिक अनुभवों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक है। इससे ये न्यायिक सुधार और सार्थक बनेंगे।

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