India's Path to Becoming the Third Largest Economy
अरुण कुमार : मंगलवार को लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने अगले पांच साल में भारत (India) को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (Third Largest Economy) बनाने का वादा फिर से दोहराया। उनके मुताबिक, भ्रष्टाचार (Corruption) पर रोक लगाकर, गरीबों के कल्याण के लिए अधिकाधिक पैसे खर्च करके और की क्षमता बढ़ाकर भारत ने ब्रिटेन को पीछे छोड़ दिया है। निस्संदेह, तीन सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों में शामिल होना हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। मगर इस मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। अगर यह मान लें कि अभी हमारी अर्थव्यवस्था 3.5 ट्रिलियन डॉलर की है, तब भी पांच ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य पाने के लिए हमें वास्तविक अर्थों में तकरीबन सात फीसदी की वृद्धि दर पानी होगी । फिर अगर रूपया यूं ही कमजोर होता रहा, तो अपेक्षित वृद्धि दर बढ़कर नौ फीसदी तक हो सकती है। ऐसे में, 4.5 फीसदी की औसत दर से बढ़ रहे भारत के लिए जर्मनी व जापान को पछाड़ना मुश्किल होगा, क्योंकि उनकी सुस्त होती अर्थव्यवस्था भी एक-डेढ़ प्रतिशत की दर से बढ़ेगी ही।
मगर यह लक्ष्य असंभव नहीं है । हां, इसके लिए हमें कुछ ठोस उपाय करने होंगे। हमें यदि विकसित बनना है, तो सबको साथ लेकर चलना होगा। आम लोगों में मांग बढ़े, इसके लिए माइक्रो सेक्टर, यानी सूक्ष्म उद्योग पर विशेष ध्यान देना होगा । इस क्षेत्र में हमारे श्रम-बल का 48 फीसदी हिस्सा काम करता है, और यहां की स्थिति कैसी है, इसका खुलासा खुद प्रधानमंत्री के बयान से होता है। 'ई-श्रम' पोर्टल के हवाले से उन्होंने बताया था कि पिछले साल नवंबर तक करीब 28 करोड़ लोगों ने अपना निबंधन यहां कराया था, जिनमें से 94 प्रतिशत की आमदनी मासिक 10,000 रूपये से कम थी । विश्व बैंक के मुताबिक, 2.15 डॉलर तक प्रतिदिन कमाने वाला शख्स गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है। अगर इसे भारतीय रूपये में प्रति परिवार के आधार पर बांट दें, तो यह आंकड़ा महीने का करीब 26 हजार रूपये है। क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के पैमाने यह रकम करीब नौ हजार रूपये होगी। इस लिहाज से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले तमाम लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को अभिशप्त हैं। इस तस्वीर को बदलने के लिए सूक्ष्म उद्योगों को मदद देनी होगी। उनको कर्ज बांटना होगा, मार्केटिंग का तरीका बताना होगा और तकनीक आदि मुहैया करानी होगी । माइक्रो सेक्टर में औसतन 1.7 रोजगार है, यानी एक सूक्ष्म उद्योग में दो लोगों को भी काम नहीं मिलता।
लिहाजा, उनके लिए अपने तई मार्केटिंग या तकनीक पर काम करना मुश्किल है। दिक्कत यह भी है कि सरकार सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों के लिए जो घोषणाएं करती है, उसका अधिकाधिक लाभ मध्यम श्रेणी के उद्योग उठा ले जाते हैं। सूक्ष्म एवं लघु उद्योग ऐसे प्रयासों से वंचित न हो सकें, इसके लिए जगह- जगह कॉपरेटिव बनाना कारगर होगा। ऐसी संस्थाओं के माध्यम से सूक्ष्म व लघु उद्योग को जरूरी सुविधाएं पहुंचाई जा सकती हैं।
इसी तरह कृषि पर भी गौर करना होगा। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी मिलनी ही चाहिए। चूंकि किसानी अब घाटे का सौदा बनती जा रही है, इसलिए किसान एमएसपी को तार्किक बनाने और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग करते हैं। इनकी सुध लेना जरूरी है, क्योंकि देश की 46 फीसदी आबादी अब भी खेती-किसानी और इससे जुड़े कामकाज पर निर्भर है। रोजगार आर्थिक तरक्की का महत्वपूर्ण पैमाना है। विकसित भारत के सपने को साकार करने लिए हर हाथ में रोजगार आवश्यक है। इसके लिए शिक्षित युवाओं की खातिर शहरी रोजगार गारंटी योजना को मजबूत बनाया जाना चाहिए । कुछ राज्यों ने ऐसा किया भी है, मगर नजर केंद्र पर है। माना जा रहा है कि अभी 27 करोड़ जरूरतमंद हाथों के पास उचित काम नहीं है। अगर हम इनके लिए पर्याप्त रोजगार की व्यवस्था कर सकें, तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 16 फीसदी तक की वृद्धि हो सकती है।
यह सही हैकि सबके लिए सरकारी नौकरी संभव नहीं है। अभी देश में 43 करोड़ कामगार हैं, जिनमें से करीब तीन फीसदी, यानी 1.8 करोड़ कर्मी ही सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। बहुत प्रयास के बाद भी इनकी हिस्सेदारी चार या पांच फीसदी तक बढ़ाई जा सकती है, लिहाजा, सरकार ऐसा माहौल बनाए कि सूक्ष्म व कृषि क्षेत्र में स्फूर्ति आए। इसमें विकास की रोशनी सभी वर्गों तक बराबर पहुंचेगी।
भारत में करीब छह हजार बड़े उद्योग हैं, तो छह लाख के आसपास मध्यम व लघु उद्योग और छह करोड़ सूक्ष्म उद्योग । सरकार कारोबारियों के हित में जो भी कदम उठाती है, वह दरअसल बड़े औद्योगिक घरानों के खाते में चली जाती है। चूंकि कोरोना के बाद असंगठित क्षेत्र की मांग शिफ्ट होकर संगठित क्षेत्र के पाले में चली गई है, इसलिए असंगठित क्षेत्र पर ध्यान देना उचित होगा। जीएसटी ने इस क्षेत्र को ध्वस्त कर दिया है। बेशक यह कर अनौपचारिक क्षेत्र पर लागू नहीं होता, पर इनपुट क्रेडिट जैसे लाभ की वजह से संगठित क्षेत्र का माल सस्ता हो जाता है, जिसका नुकसान असंगठित क्षेत्र को हो रहा है। इससे बचने के लिए आखिरी पड़ाव पर जीएसटी लगना चाहिए, ताकि इनपुट क्रेडिट जैसी व्यवस्था ही न रहे।
अमीरों के देश छोड़ने का भी हमें नुकसान हो रहा है। यह कारोबारी माहौल के खराब होने के कारण हुआ है। 2014-19 के बीच करीब 23 हजार धनाढ्यों ने देश छोड़ा। 2019 में पांच हजार, और 2021-22 में करीब 6,500 ने ऐसा किया। उनके बिजनेस कॉन्फिडेंस को संभालना जरूरी है, तभी जरूरी विकास दर हासिल की जा सकेगी। यहां तकनीक भी एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसमें हम पिछड़ रहे हैं। हम जीडीपी का 0.7 प्रतिशत ही रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट पर खर्च करते हैं, जबकि कोरिया ( तीन प्रतिशत) और इजरायल (चार प्रतिशत) जैसे देश भी हमसे आगे हैं। चूंकि बेहतर तकनीक की वजह से अन्य देशों के उत्पाद सस्ते हो जाते हैं, इसलिए हमारा उद्योग प्रतिस्पर्द्धा में टिक नहीं पाता । इसलिए हमें खुद अपनी तकनीक विकसित करनी चाहिए। कुल मिलाकर, एक लंबा रास्ता अभी तय करना बाकी है। बड़ी ही नहीं, हर छोटी बात का ख्याल रखना आवश्यक होगा। जाहिर है, एक समग्र नीति ही हमें शीर्ष तीन आर्थिक ताकतों में शामिल करेगी।
Editorial

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