दिल्ली की राजधानी
ब्रजेश कुमार तिवारी... दिल्ली एक सदी से भी ज्यादा समय से भारत की राजधानी है। दशकों तक कोलकाता से देश का शासन चलाने के बाद दिल्ली को 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अंग्रेजों ने पूरी भव्यता के साथ राजधानी के रूप में स्थापित किया था। दिल्ली में पूरा देश रहता है और इसकी भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि करीब चार राज्य इसके आस-पास मौजूद हैं। यह केवल महानगर नहीं है, इसमें पुरानी और नई दिल्ली के शहरी और ग्रामीण इलाके शामिल हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2028 तक भारत की राजधानी दिल्ली दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले शहरी समूह के रूप में टोक्यो को पीछे छोड़ देगी, लेकिन सुविधाओं के पैमाने पर इस महानगर की क्या स्थिति है ?
साल 1991 और 2011 के बीच दिल्ली का खूब विस्तार हुआ है। जनसांख्यिकीय संरचना में भी बहुत बदलाव हुए हैं। शहरी परिवारों की संख्या तीन गुना हो गई, जबकि ग्रामीण परिवारों की संख्या आधी से भी कम रह गई है। आज से सौ साल पहले दिल्ली की आबादी पांच लाख भी नहीं थी, पर आज दो करोड़ से अधिक है। केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय देश में सर्वाधिक है, हालांकि पिछले कुछ वर्षों में आय बढ़ने की रफ्तार कुछ धीमी हुई है।
दिल्ली में होने वाली कमाई देश भर के लोगों को यहां खींच लाती है । लोगों को जब कोई रास्ता नहीं सूझता, तो वह दिल्ली का रूख करते हैं और दिल्ली सबके लिए कोई न कोई व्यवस्था कर ही देती है। दिल्ली में भाषा भी बाधक नहीं है। कोलकाता में बांग्ला का वर्चस्व है, चेन्नई में तमिल हावी है और मुंबई में माराठी का दबदबा है, पर दिल्ली ऐसे किसी भाषायी दबाव से ऊपर है। दिल्ली में हर भाषा और संस्कृति का समाज दशकों से रहता आया है। चूंकि यहां आकर्षण ज्यादा है, इसलिए यहां जनसंख्या में वृद्धि तेज है। आए दिन असंख्य लोगों का उम्मीद के साथ यहां आना थम नहीं रहा है, परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि भी धीमी हो जाती है।
दिल्ली का आकर्षण बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास किए जा सकते हैं और केंद्र सरकार के अलावा दिल्ली सरकार को भी इस दिशा में ज्यादा पहल करने की जरूरत है। दिल्ली में जरूरत से ज्यादा आबादी, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाओं पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव बड़ी चिंता का विषय है। दिल्ली में हर साल कुछ महीनों में लोग प्रदूषण से इतने पीड़ित हो जाते हैं कि यहां से दूर जाने की सोचने लगते हैं, पर दिल्ली का मोह ऐसा है कि पीछा छुड़ाना आसान नहीं है। यहां हम क्षेत्रवाद नहीं कर सकते । हमें सोचना होगा, दिल्ली किस तरह से एक बड़ी आबादी को स्थायी रूप से आश्रय दे सकती है। दिल्ली को आज यथोचित आर्थिक विकास योजना की जरूरत है, जो न्यायसंगत और टिकाऊ, दोनों हो।
बड़ी आबादी के प्रबंधन के लिए विश्व स्तर पर हमारे पास मिसालें मौजूद हैं, जिनमें पेरिस और बीजिंग जैसे शहर शामिल हैं। बढ़ती शहरी आबादी के साथ बड़े क्षेत्रों में परस्पर आर्थिक निर्भरता का विस्तार जरूर होना चाहिए। वर्ष 1985 में दिल्ली योजना बोर्ड सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की स्थापना हुई थी, जिसका प्राथमिक उद्देश्य दिल्ली और इसके बाहरी शहरी केंद्रों का कुशल और संगठित विकास करना था। साथ ही, भीड़भाड़ को कम करने के लिए 100-300 किलोमीटर के दायरे में स्थित कुछ शहरों को 'काउंटर मैग्नेट' के रूप में स्थापित करना था, परंतु ऐसा पूरी तरह से नहीं हो पाया । गुरूग्राम को अपनी चमक बनाने में काफी समय लगा और नोएडा ने भी बसने में काफी समय लिया। दिल्ली को राहत देने के लिए उसके बाहर जो विस्तार हुआ, वह दिल्ली जैसा रचनात्मक या चर्चित नहीं रहा। हम भूल नहीं सकते कि किसी समय यहां का चांदनी चौक एशिया का सबसे बड़ा कपड़ा बाजार था, तो खारी बावली एशिया का सबसे बड़ा मसाला बाजार हुआ करता था । विकसित वृहद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की योजना अभी भी पूरी तरह साकार नहीं हो पाई। दिल्ली के लिए अभी भी समन्वय का वह स्तर नहीं है, जो होना चाहिए।
दिल्ली के पास एक बड़ा कौशल आधार है। सभी राज्यों की तुलना में दिल्ली में कुशल कार्यबल की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है, जो इसे आईटी, डिजाइनिंग, आरऐंडडी और वित्तीय सेवाओं की आर्थिक गतिविधियों के लिए उपयुक्त बनाती है। दिल्ली को चौबीसों घंटे चलने वाले शहर में बदलना होगा, साथ ही, ऐसे विकास को बढ़ावा देना है, जो प्रदूषण से निपटने में कारगर है। प्रदूषण को कम करने के लिए क्या दिल्ली अपने पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय के साथ चल पा रही है ? यह एक आकर्षक रियल एस्टेट बाजार है और साथ ही पसंदीदा पर्यटन स्थल है। अपने स्थान, कनेक्टिविटी व देश की राजधानी होने के नाते हमारे पास वह सब कुछ है, जिससे दिल्ली के आर्थिक पक्ष को हम और मजबूत बना सकते हैं।
दिल्ली के सेवा उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, होटल, बैंकिंग, मीडिया और पर्यटन क्षेत्र को समय की मांग के साथ नए आयाम देने की जरूरत है। यहां उच्च शिक्षा के कई संस्थान हैं। माना कि दिल्ली के पर्यावरण को देखते हुए कारखाने नहीं बनाए जा सकते, फिर भी इसे ज्ञानपरक अर्थव्यवस्था (नॉलेज बेस्ड इकोनॉमी) तो बनाया ही जा सकता हैं। महिलाओं को अर्थव्यवस्था में भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल सुविधाओं को सुरक्षा के साथ बढ़ाना होगा। दिल्ली-एनसीआर के पुनरोद्धार के लिए एक आर्थिक विकास निगम भी स्थापित किया जा सकता है। साथ ही, विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र, औद्योगिक निकायों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को एक मंच पर आना होगा। इसके साथ ही परस्पर जुड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले विस्तारित क्षेत्रों की खोज करनी पड़ेगी ।
वास्तव में, दिल्ली का मामला लगातार अध्ययन करने योग्य है। हम आजतक दिल्ली की झुग्गियों को खत्म नहीं कर पाए हैं। दिल्ली के लिए हमें 25 वर्ष आगे का मास्टर प्लान बनाना होगा। महत्वाकांक्षी योजनाओं व उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच एक बड़े अंतर को पाटने की जरूरत है। इसे एक समावेशी, रोजगारपरक और रहने योग्य वैश्विक शहर बनाना होगा। दिल्ली देश की राजधानी ही नहीं, दिल भी है।
Editorial

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