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नाम परिवर्तन पर दोहरा रवैया
By EditorialPublished on
केरल (Kerala) का नाम केरलम करने का प्रस्ताव राज्य विधानसभा ने पारित कर दिया है । सर्वसम्मति से पारित इस प्रस्ताव पर केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन (CM Pinarayi Vijayan) ने कहा कि इस राज्य को मलयालम में केरलम ही कहा जाता है। अग्रिम कार्रवाई के लिए यह प्रस्ताव केंद्र के पास भेज दिया गया है। राज्यों, क्षेत्रों, नगरों और महानगरों के नाम परिवर्तन के प्रस्ताव बहुधा आते रहते हैं। बंगाल सरकार ने भी राज्य का नाम बदलकर बांग्ला करने का प्रस्ताव पारित कर रखा है।

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हृदयनारायण दीक्षित : केरल (Kerala) का नाम केरलम करने का प्रस्ताव राज्य विधानसभा ने पारित कर दिया है । सर्वसम्मति से पारित इस प्रस्ताव पर केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन (CM Pinarayi Vijayan) ने कहा कि इस राज्य को मलयालम में केरलम ही कहा जाता है। अग्रिम कार्रवाई के लिए यह प्रस्ताव केंद्र के पास भेज दिया गया है। राज्यों, क्षेत्रों, नगरों और महानगरों के नाम परिवर्तन के प्रस्ताव बहुधा आते रहते हैं। बंगाल सरकार ने भी राज्य का नाम बदलकर बांग्ला करने का प्रस्ताव पारित कर रखा है।
केरल का नाम भी 1956 से पहले त्रावणकोर-कोचीन था। तमिलनाडु का नाम मद्रास राज्य था। कर्नाटक का नाम मैसूर राज्य था । उड़ीसा की जगह ओडिशा हुआ है। नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) का नाम अरूणाचल प्रदेश किया गया। पोंडिचेरी भी पुदुचेरी हो गया। बंगलोर का नाम 2006 में बेंगलुरू हुआ। मुंबई शहर लंबे समय बांबे कहा जाता था । केरल के त्रिवेंद्रम का नाम 1991 में तिरूअनंतपुरम हुआ। कलकत्ता को कोलकाता हुए बहुत समय नहीं बीता । मद्रास का नाम चेन्नई हुआ पंजाब का नाम 1950 के पहले पूर्वी पंजाब था। उत्तर प्रदेश का नाम 1950 के पहले संयुक्त प्रांत था। नाम परिवर्तन नई बात नहीं है ।
सांस्कृतिक-राजनीतिक कारणों से ऐसे नाम परिवर्तन चला करते हैं। नामकरण में बहुधा संस्कृति, सभ्यता एवं इतिहास के प्रेरक तत्व होते हैं। कई देशों के नाम भी परिवर्तित हुए हैं। अमेरिकी राजधानी का नाम प्रथम राष्ट्रपति वाशिंगटन की स्मृति में रखा गया था। ईरान का नाम पर्शिया था। यहां पर्शियन साम्राज्य की स्थापना हुई। बाद में पर्शिया की जगह देश का नाम ईरान हो गया। म्यांमार पहले बर्मा था । जार्डन पहले ट्रांस जार्डन था। यह नाम जार्डन नदी से संबंधित बताया जाता है। कंबोडिया पहले कंपूचिया था। श्रीलंका ब्रिटिश काल में सीलोन था । 1972 में रिपब्लिक आफ श्रीलंका हुआ । 1978 में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ श्रीलंका हुआ । नाम महत्वपूर्ण है। नाम और रूप मिलकर परिचय बनते हैं। ऋग्वेद के ज्ञान सूक्त में कहा गया है कि, 'किसी पदार्थ का नाम रखकर परिचय करना ज्ञान की शुरूआत है। वास्तविक ज्ञान शब्द अर्थ के गर्भ में छुपा रहता है। ज्ञानी जन तप बल से वाणी का अभिप्राय प्राप्त करते हैं।
राज्यों और बड़े केंद्रों के नामकरण एवं नाम परिवर्तन के पीछे सांस्कृतिक इतिहास भी होते हैं। केरलम के संबंध में भी यही स्थिति है। केरलम नाम से राज्य के वाम विचार वाले मुख्यमंत्री का लगाव दिखाई पड़ता है। नाम को लेकर भारत और सारी दुनिया में गहन आकर्षण है। भले ही शेक्सपियर ने कहा हो कि नाम में क्या रखा है, लेकिन सच्चाई यही है कि नाम से फर्क पड़ता है। इतिहासकार विक्रम संपत ने सावरकर पर किताब लिखी है। सावरकर हिंदुत्व नाम को लेकर आग्रही थे ।
पुस्तक के अनुसार सावरकर ने शेक्सपियर के कथन पर व्यंग्य किया, 'नाम में क्या रखा है? क्या अयोध्या को होनोलुलू कह सकते हैं? अमेरिकियों को कहिए कि वाशिंगटन को चंगेज खां पुकारें या किसी मुस्लिम को खुद को यहूदी बुलाने पर राजी करिए।' केरल और बंगाल राज्यों द्वारा प्रस्तुत नाम परिवर्तन के प्रस्ताव संवैधानिक परीक्षणों की प्रक्रिया से गुजरेंगे। मूलभूत प्रश्न यही है कि अपने-अपने क्षेत्रों, राज्यों में संस्थाओं और केंद्रों के नाम बदलने वाला कथित उदारवादी - सेक्युलर खेमा राष्ट्रवादी विचार के ऐसे ही प्रस्तावों पर आक्रामक क्यों हो जाता है । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद नगर का नाम बदलकर प्रयागराज हड़बड़ी में नहीं किया गया था । प्रयाग सुप्रतिष्ठित अंतरराज्यीय सांस्कृतिक केंद्र है। यहां का कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा समागम है। दुनिया भर के जिज्ञासु और श्रद्धालु यहां आते हैं। प्रयाग नाम हजारों वर्ष प्राचीन है। यह भारतीय संस्कृति, उपासना और ज्ञान- विज्ञान की तपोभूमि है। ऐसे तमाम तथ्यों के बावजूद वाम सेक्युलर खेमा प्रयाग नामकरण का विरोध करता रहा । उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन रखने पर भी इन्हीं तत्वों ने अनावश्यक हल्ला मचाया था।
कथित सेक्युलरों को हिंदू राष्ट्र जीवन से जुड़ी प्रत्येक गौरवशाली स्मृति पर आपत्ति रहती है। भारत लंबे समय तक विदेशी सत्ता अधीन रहा । विदेशी शासकों ने यहां के सांस्कृतिक धार्मिक केंद्रों का सत्यानाश किया। उन्हें यथापूर्व बहाल करना राज और समाज का कर्तव्य है, लेकिन भारतीय संस्कृति को हृदय से न स्वीकार करने वाले तत्व सांस्कृतिक प्रतीकों पर भी आक्रामक रहते हैं । कुछ तत्वों को देश के नाम 'भारत' पर भी आपत्ति थी। संविधान सभा में इस पर व्यापक बहस हुई थी। देश का नाम 'इंडिया दैट इज भारत' रखा गया। जो भारत है कायदे से उसका नाम भारत ही होना चाहिए। संविधान सभा में हरिविष्णु कामथ ने 'भारत या अंग्रेजी भाषा में इंडिया' नामकरण का संशोधन रखा। उन्होंने भारत, हिंदुस्तान, हिंद, भरतभूमि और भारतवर्ष आदि नामों का सुझाव दिया।
सेठ गोविंददास ने कहा, 'इंडिया दैट इज भारत' यह नाम रखने का तरीका सुंदर नहीं है। भारत जिसे दूसरे देशों में इंडिया भी कहा जाता है, यह नाम ठीक होता।' उन्होंने महाभारत का भी उल्लेख किया। केएस सुब्बाराव ने भारत को प्राचीन नाम बताया और कहा, 'भारत नाम ऋग्वेद में भी है। कमलापति त्रिपाठी ने कहा, 'हजारों वर्ष की पराधीनता में देश ने अपना सब कुछ खो दिया-संस्कृति, सम्मान, मनुष्यता आत्मगौरव और अपना नाम भी।'
केरल की तरह उत्तर प्रदेश विधानसभा ने 2004 में 'इंडिया दैट इज भारत' की जगह 'भारत दैट इज इंडिया' रखने का प्रस्ताव किया था। दोनों में संस्थागत अंतर हैं। केरल विधानसभा ने राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव किया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा का प्रस्ताव देश के नाम से संबंधित है। भारत में पिछले 9 वर्षों से सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दौर चल रहा है। सांस्कृतिक प्रतीकों एवं प्राचीन धरोहरों के प्रति विशेष प्रकार की राष्ट्रीय चेतना का जागरण हो रहा है। इसके बावजूद कुछ तत्वों ने संसद के नए भवन के लोकार्पण अवसर पर सांस्कृतिक प्रतीक 'सेंगोल' को लेकर गलत बयानबाजी की थी, जो उचित नहीं । राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़े सभी प्रतीकों, स्मारकों, धरोहरों और नामों के प्रति आदर और सम्मान का भाव विकसित करना राष्ट्रीय कर्तव्य है । (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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