Pratahkal-Acharya Mahashraman-It is meaningful to call the Mahasabha as the institution Shiromani

मुम्बई । सृष्टि में दो प्रकार की व्यवस्थाएं बताई गई हैं। एक व्यवस्था जहां कोई मुखिया नहीं होता, वहां सभी अपने कार्य स्वतः संपादित करते हैं। दूसरी व्यवस्था होती है जहां परिवार, समाज, संगठन, संस्था अथवा राष्ट्र का कोई न कोई मुखिया होता है, कोई विधान, संविधान, मर्यादा, व्यवस्था, नियम आदि होते हैं, जिसके माध्यम से व्यवस्थाएं संचालित की जाती हैं। इस सभी तंत्रों व व्यस्थाओं का एक ही लक्ष्य होता है कि इससे जुड़े हुए लोग सुखी रहें, व्यवस्थाएं सुचारू चलें और उनकी सुरक्षा, सुविधा आदि के द्वारा सार-संभाल होती रहे व विकास होता रहे। तेरापंथ धर्मसंघ में भी शासन, विधान, मर्यादा व व्यवस्था के लिए संहिताएं और मर्यादावली आदि बने हुए हैं। धर्मसंघ की संस्थाओं के लिए भी नियम हैं। हमारे धर्मसंघ में अनेक संस्थाएं हैं, उनमें से एक है तेरापंथी महासभा। इसका शुभारंभ आचार्य कालूगणी के समय हुआ था। इस संस्था को बने हुए सौ वर्षों से अधिक का समय हो गया। महासभा के तत्वावधान में कार्य सुन्दर रूप में हो रहे हैं। महासभा तेरापंथ समाज की सर्वोपरि संस्था है। महासभा के नेतृत्व में विराट अधिवेशन हो रहा है। सभी सभाएं और प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों में पूर्ण जागरूकता रखें। हमारी चारित्रात्माएं क्षेत्रों में खूब धार्मिक जागरण करती रहें। उक्त विचार आचार्य महाश्रमण
(Acharya Mahashraman)
ने सोमवार को तेरापंथी महासभा के प्रतिनिधि सम्मेलन के दूसरे दिन रखे।
उन्होंने भगवती सूत्र के माध्यम से पाथेय प्रदान करते कहा कि सोना और जागना भी जीवन में लगा रहता है। ये दोनों प्रवृत्तियां बाहर से भी सम्बन्धित होती हैं और इन्हें आंतरिक रूप से देखा जाए तो प्रमाद, मूर्छा, मोह, अज्ञान को सुसुप्ता अवस्था मान लिया जाए और ज्ञान, ध्यान, अप्रमाद और जागरूकता को जागना मान लिया जाए। भगवती सूत्र में तीन प्रकार की जागरिका बताई गई है-बुद्ध, अबुद्ध और सुद्रष्टा जागरिका। बुद्ध जागरिका केवलज्ञानी को होती है, जिनका मोह क्षीण हो चुका है। अबुद्ध जागरिका साधुओं की होती है। जिनके पास केवलज्ञान तो नहीं, किन्तु मति-श्रुत ज्ञान होता है। इसमें किसी-किसी को अवधि ज्ञान और मनः पर्यव ज्ञान भी हो सकता है। सुद्रष्टा जागरिका श्रमणोपासकों में बताई गई है। जो श्रावक जीव-अजीव को जानता हो, तप करने वाला हो, देव, गुरु और धर्म के प्रति जागरूक हो उनमें सुद्रष्टा जागरिका होती है। श्रावक समाज अपनी सुद्रष्टा जागरिका को बनाए रखने का प्रयास करे। जीवन में कितना भी दुःख, कष्ट, अथवा विपदा आए, किन्तु धर्म के प्रति निष्ठा कम नहीं होनी चाहिए।
कार्यक्रम में महासभा अध्यक्ष मनसुखलाल सेठिया ने महासभा के विभिन्न कार्यक्रमों का उल्लेख किया तो मुख्य न्यासी सुरेशचन्द गोयल ने आगामी योजनाओं की जानकारी दी। संचालन महामंत्री विनोद बैद ने किया।
Editorial

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