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जन्मों-जन्मों तक चल सकता है प्रेम व वैर का संबंध
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आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने शुक्रवार को भगवती सूत्र के माध्यम से पाथेय प्रदान करते कहा कि अहिंसा के पालन के लिए हिंसा को जानना भी आवश्यक होता है। भगवती सूत्र में वैर भाव से की गई हिंसा का जिक्र है। वैर का अर्थ किसी से दुश्मनी के भाव रखना और इस कारण किसी का वध भी आदमी कर देता है। हिंसा के कार्य और वैर की भावना का भी अनुबंध होता है। यह वैर की परंपरा इस अनुबंध के कारण आगे के अनेक जन्मों तक भी चल सकती है।

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मुम्बई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने शुक्रवार को भगवती सूत्र के माध्यम से पाथेय प्रदान करते कहा कि अहिंसा के पालन के लिए हिंसा को जानना भी आवश्यक होता है। भगवती सूत्र में वैर भाव से की गई हिंसा का जिक्र है। वैर का अर्थ किसी से दुश्मनी के भाव रखना और इस कारण किसी का वध भी आदमी कर देता है। हिंसा के कार्य और वैर की भावना का भी अनुबंध होता है। यह वैर की परंपरा इस अनुबंध के कारण आगे के अनेक जन्मों तक भी चल सकती है। किसी को मारने के बाद उससे जुड़े हुए लोग भी वैर की भावना से कभी न कभी उसको मारने का प्रयास करेंगे और फिर उसकी अगली पीढ़ी भी ऐसा भाव रख सकती है। इतना ही नहीं, वैर भाव का अनुबंध मानों आगे के कई जन्मों तक भी चल सकता है।
वैर की भांति ही प्रेम, स्नेह व मित्रता का अनुबंध भी होता है। प्रेम, स्नेह, मित्रता का अनुबंध आदमी के साथ कई जन्मों तक चल सकता है। इस प्रकार वैर हो या प्रेम जन्म-जन्मांतर तक चल सकता है। किसी को देख कर बहुत प्रसन्नता होती है तो किसी को देखकर प्रसन्नता नहीं होती। भगवती सूत्र में हिंसा-वैर के अनुबंध को व्याख्यायित करते हुए बताया गया कि आदमी को वैर-विरोध और द्वेष और हिंसा की भावना को छोड़कर उससे खमतखामणा कर लेने का प्रयास करना चाहिए। वर्ष में एक बार तो खमतखामणा कर वैर-विरोध के भावों को एक बार के लिए तो समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए। एक-दूसरे से खमतखामणा कर लेने से चेतना की निर्मलता हो सकती है। आदमी को किसी से वैर-विरोध नहीं, बल्कि क्षमा देकर और क्षमा प्राप्त किया जा सकता है। वैर भाव को समाप्त कर आदमी अपनी आत्मा को हल्का बना सकता है तथ अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
इसके बाद उन्होंने ‘कालूयशोविलास’ के आख्यान क्रम को आगे बढ़ाया। साध्वी काव्यलता ने आचार्यश्री से अठाई की तपस्या का प्रत्याख्यान लिया। शांतिलाल चोरड़िया ने गीत का संगान किया। तनसुलाल बैद ने स्वरचित ‘आचार्यांजलि’ पुस्तक को लोकार्पित किया।

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