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विपक्ष को कितना मजबूत करेंगे राहुल
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देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने कभी राजनीति को असीमित संभावनाओं का खेल बताया था। राहुल गांधी इन संभावनाओं का नया उदाहरण बनते दिख रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा और फिर मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत के बाद संसद सदस्यता की बहाली से राहुल के लिए राजनीतिक संभावनाओं के द्वार फिर से खुलते नजर आ रहे हैं।

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राजकुमार सिंह
देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने कभी राजनीति को असीमित संभावनाओं का खेल बताया था। राहुल गांधी इन संभावनाओं का नया उदाहरण बनते दिख रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा और फिर मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत के बाद संसद सदस्यता की बहाली से राहुल के लिए राजनीतिक संभावनाओं के द्वार फिर से खुलते नजर आ रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल ने जिस तरह अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और फिर नेहरू-गांधी परिवार के बाहर से कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर अड़ गए, उसे कई राजनीतिक पंडितों ने हठधर्मी छवि के विस्तार के रूप में देखा, लेकिन अब वह एक सुविचारित राजनीतिक दांव बनता दिख रहा है।
प्रत्यक्ष संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त राहुल ने जनसंपर्क के जरिये राजनीतिक-सामाजिक समझ बढ़ाने और छवि सुधारने का जो प्रयास शुरू किया, कन्याकुमारी से कश्मीर तक की साढ़े तीन हजार किलोमीटर से भी लंबी भारत जोड़ो यात्रा उसी की परिणति रही। भारतीय राजनीति में पदयात्राओं और सघन जनसंपर्क की परंपरा रही है, लेकिन 21वीं शताब्दी में उसकी जगह रोड शो ने ले ली है। इसलिए अपनी विशिष्ट पारिवारिक पृष्ठभूमि के लिए कठघरे में खड़ा किए जाने वाले अपेक्षाकृत युवा राजनेता की इतनी लंबी यात्रा, खासकर युवा पीढ़ी के लिए एक अनूठी और सकारात्मक पहल बन गई।
दलगत आकलन और रणनीति अपनी जगह है, पर तटस्थ प्रेक्षक मानते हैं कि न सिर्फ राहुल की छवि, बल्कि राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक समझ भी यात्रा से बेहतर हुई, इसलिए भी अब अचानक विभिन्न वर्गों के बीच पहुंच कर उनसे सहज-सरल संवाद को उनके सलाहकार राजनीतिक रणनीति की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। मोदी सरनेम मामले में गुजरात की अदालत द्वारा दो वर्ष की अधिकतम सजा के बाद गई अपनी सांसदी सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत की बदौलत वापस मिलने पर भी लोकसभा जाने से पहले राहुल दिल्ली की आजादपुर मंडी में व्यापारियों- मजदूरों से मिलने चले गए। तीन महीने से भी ज्यादा समय से जातीय हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर भी राहुल सरकार के कुछ प्रतिबंधों के बावजूद गए और पीड़ितों से मिले। दरअसल, भारत जोड़ो यात्रा से राहुल की समझ और छवि निखरी, तो मानहानि मामले में आए उतार-चढ़ाव से विपक्ष की राजनीति में भी उनका कद बढ़ा है।
चौथी बार लोकसभा के लिए चुने गए राहुल के बारे में कहा जाता रहा कि वह शर्मीले हैं और आगे आकर जिम्मेदारियां लेने से कतराते हैं । इसीलिए मनमोहन सिंह के दूसरे प्रधानमंत्रित्व काल में उनके मंत्री बनने की चर्चाएं महज अटकलें बनकर रह गईं। शायद इसीलिए कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी राहुल की राजनीतिक क्षमताओं के प्रति ज्यादा आश्वस्त नहीं रहे, लेकिन 11 महीने में राहुल की समझ और उनकी क्षमताओं को लेकर प्रेक्षकों का आकलन बदला है।
जब पिछले साल कांग्रेस के उदयपुर चिंतन शिविर में राहुल गांधी द्वारा भारत जोड़ो यात्रा की घोषणा की गई, तब उस पर राजनीतिक क्षेत्रों से लेकर मीडिया तक में कैसी प्रतिक्रिया हुई थी ? पर 7 सितंबर, 2022 को कन्याकुमारी से शुरू यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, तटस्थ सोच भी बदलती गई। चुनाव -दर- चुनाव पराजय से पस्त कांग्रेस को तो इस यात्रा से नया उत्साह मिला ही, संपर्क- संवाद के बाद जन-साधारण की राय भी राहुल के बारे में बदली। गुजरात की हार व हिमाचल प्रदेश की जीत में वह यात्रा भले कारक न रही हो, पर कर्नाटक में कांग्रेस ने जिस तरह भाजपा से सत्ता छीनी, उसमें राहुल की यात्रा की बड़ी भूमिका रही राहुल की जो छवि बड़ी विरासत के सहारे राजनीति में आए युवा की थी, यात्रा और मानहानि मामले से एक जुझारू राजनेता की बनती दिख रही है । अब उनकी सांसदी बहाली और अगला लोकसभा चुनाव भी लड़ सकने का मार्ग प्रशस्त हो गया है ।
बेशक सुप्रीम कोर्ट ने राहुल को क्लीन चिट नहीं दी है, बल्कि उनके बयान को आपत्तिजनक मानते हुए नसीहत दी है कि सार्वजनिक जीवन में संयमित भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह राहुल समेत उन तमाम नेताओं के लिए सबक है, जो समर्थकों की तालियों और मीडिया की सुर्खियों की लालसा में ऐसी जुमलेबाजी करने में संकोच नहीं करते, जो अमर्यादित भाषा के दायरे में आती है। राजनीतिक मतभेद के चलते की जाने वाली आलोचना अक्सर मुद्दों व तथ्यों पर आधारित होती है, जबकि मनभेद में व्यक्तिगत टीका- टिप्पणी की जाती है, जिसके लिए स्वस्थ लोकतंत्र और सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
राहुल प्रकरण और उन्हें राहत देते हुए भी सुप्रीम कोर्ट की नसीहत से हमारे राजनेता क्या सबक लेंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन इस राहत ने विपक्ष की राजनीति में राहुल की राह आसान कर दी है। चंद महीने पहले तक कई विपक्षी दिग्गज राहुल को चेहरा बनाए जाने को चुनावी संभावनाओं के लिए बेहतर नहीं मान रहे थे, लेकिन सांसदी बहाली के बाद 7 अगस्त को जब राहुल संसद पहुंचे, तो उनके स्वागत के लिए नवगठित विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलायंस यानी 'इंडिया' के सभी सांसद एकजुट हो गए। शायद विपक्ष ने अंतर्विरोधों और महत्वाकांक्षाओं के टकराव के बावजूद राहुल की शहीद वाली छवि के चुनाव प्रभाव और परिणाम का आकलन करते हुए उन्हें अपना चेहरा बनाने का मन बना लिया है। मोदी सरकार और भाजपा की आलोचना में ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल भी पीछे नहीं हैं, पर राहुल अपने विरोध को ज्यादा आगे तक ले गए।
राहुल को सजा भले आपत्तिजनक बयान के लिए मिली हो, लेकिन पूरे प्रकरण से कांग्रेस यह अवधारणा बनाने की कोशिश कर रही है कि उन्हें राजनीतिक वजह से निशाना बनाया गया। राजनीति में कई बार वास्तविकता से ज्यादा धारणा प्रभावी साबित होती है। लोकसभा के संख्या गणित के मद्देनजर वर्तमान अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम सभी जानते हैं, पर असली लक्ष्य तो अगले साल होने वाला आम चुनाव है। केंद्रीय सत्ता के संघर्ष में चुनावी मुद्दों के साथ अवधारणा क्या भूमिका निभाएगी- यह इस पर निर्भर करेगा कि अपनी छवि बदलने में सफल दिख रहे राहुल गांधी निहित स्वार्थ के लिए एकजुट होने की विपक्ष की छवि को कितना बदल पाएंगे, ताकि मतदाता उसे विश्वसनीय विकल्प के रूप में देख सकें?

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