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दवा कहीं दर्द न बन जाए
By EditorialPublished on
केंद्र सरकार संसद के मौजूदा सत्र में जम्मू-कश्मीर विधानसभा को लेकर नया विधेयक पेश करने जा रही है। कुछ लोग इस पहल को 'ऐतिहासिक' बता रहे हैं, लेकिन इस बिल के मसौदे ने उन लोगों को मायूस किया है, जो जम्मू- कश्मीर की व्यवस्था को भारत विरोधी बनाए रखने वाले मूलभूत कारणों की इससे हमेशा के लिए समाप्ति की आस लगाए हुए थे।

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विजय क्रांति
केंद्र सरकार संसद के मौजूदा सत्र में जम्मू-कश्मीर विधानसभा को लेकर नया विधेयक पेश करने जा रही है। कुछ लोग इस पहल को 'ऐतिहासिक' बता रहे हैं, लेकिन इस बिल के मसौदे ने उन लोगों को मायूस किया है, जो जम्मू- कश्मीर की व्यवस्था को भारत विरोधी बनाए रखने वाले मूलभूत कारणों की इससे हमेशा के लिए समाप्ति की आस लगाए हुए थे। केंद्र सरकार का दावा है कि इस पहल के माध्यम से कश्मीरी हिंदुओं और गुलाम कश्मीर से बेदखल किए गए नागरिकों के लिए विधानसभा में तीन सीटें आरक्षित करने से उन्हें न्याय मिलेगा, लेकिन बीते सात दशकों में जम्मू-कश्मीर की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था में आए चारित्रिक परिवर्तनों को देखते हुए यह खतरा बढ़ गया है कि यह नया बिल कुछ सुधार लाने के बजाय राज्य के शासन-प्रशासन पर उन्हीं विभाजनकारी तत्वों के शिकंजे को हमेशा के लिए सुनिश्चित न कर दे, जो जम्मू- कश्मीर में सांप्रदायिक आधार पर अन्याय और भारत विरोधी माहौल के लिए जिम्मेदार हैं। बात केवल इतनी ही नहीं है। विधानसभा में 1951 से खाली रखी जा रही 24 सीटों को भरने के बजाय मात्र तीन सीटों पर निर्वासित कश्मीरियों और गुलाम कश्मीर विस्थापितों के समायोजन का नया कानून इन भारत समर्थक समुद यों में फूट के बीज बो सकता है। यह भी ध्यान रखें कि महबूबा मुफ्ती और अन्य कुछ नेता इन सीटों पर नामांकन का अधिकार भी उपराज्यपाल के बजाय अपने हाथ में रखना चाहते हैं।
केंद्र सरकार द्वारा गठित परिसीमन आयोग ने राज्य में विधानसभा की सीटें 111 से बढ़ाकर 114 कर दी हैं। पहले कश्मीर में 46 और जम्मू में 37 सीटें थीं। अब इस अंतर को घटाकर कश्मीर में 46 और जम्मू में 43 सीटों का प्रविधान किया गया है। अगस्त 2019 में राज्य पुनर्गठन के कारण लद्दाख के हिस्से की चार सीटें भी अब नई जम्मू-कश्मीर विधानसभा का हिस्सा हैं। हालांकि, पुनर्गठन आयोग ने शेष 24 सीटों को पूर्व की तरह खाली छोड़ दिया। इसके चलते राज्य की विधानसभा में बहुमत वाला संतुलन कश्मीर घाटी के पक्ष में झुका रहेगा। संसद में पेश होने वाला बिल इस असंतुलन को संवैधानिक मान्यता देकर उसे स्थायी कर देगा।
वर्ष 1951 में जब देश के संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के लिए पहला आयोग बना था, तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर में बिना किसी चुनाव के ही नियुक्त किए गए अपने चहेते 'प्रधानमंत्री' शेख अब्दुल्ला को राज्य विधानसभा का परिसीमन करने का अधिकार दे दिया था। तब शेख ने मनमाने ढंग से 100 सदस्यीय विधानसभा का गठन किया । उसमें कश्मीर घाटी को 43 सीटें, जम्मू को 30 और लद्दाख को मात्र दो सीटें दी गई थीं। जबकि राज्य की राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था पर कश्मीर घाटी के वर्चस्व के लिए उन्होंने बची हुई 25 सीटों को पीओजेके-गुलाम कश्मीर की मुक्ति होने तक खाली छोड़ दिया। बाद में शेख अब्दुल्ला के इस 'परिसीमन आयोग' को 1957 का 'जम्मू-कश्मीर जनप्रतिनिधि एक्ट' बनाकर कानूनी रूप दे दिया गया। 1995 में राज्य के दूसरे परिसीमन में विधानसभा की सीटें बढ़ाकर 111 कर दी गईं। इनमें कश्मीर घाटी को 46, जम्मू को 37 और लद्दाख को चार सीटें दी गईं। तब भी विधानसभा पर कश्मीरी नेताओं का दबदबा बनाए रखने के लिए 24 सीटें गुलाम कश्मीर के नाम पर खाली छोड़ दी गई। इससे पहले अनुच्छेद 370 की आड़ लेकर 2002 में नेशनल कांफ्रेंस सरकार ने भारत सरकार को राज्य में चौथे परिसीमन आयोग के प्रविधान लागू करने से रोक दिया, ताकि राज्य की व्यवस्था पर कश्मीरी नियंत्रण बना रहे। उस सरकार ने राज्य के संविधान में 29वां संशोधन करके विधानसभा के गठन को 2031 की जनगणना होने तक रोक दिया । इसका अर्थ था कि विधानसभा के प्रारूप में 2036 के चुनाव तक कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। विधानसभा पर अपने नियंत्रण और अनुच्छेद 370 के माध्यम से कश्मीरी नेताओं के मनमाने, अलोकतांत्रिक और अमानवीय फैसलों के उदाहरणों की भरमार है। ऐसे उदाहरण किसी भी लोकतंत्र को शर्मसार करते हैं। जैसे शेख अब्दुल्ला द्वारा 1957 में पंजाब से रिझाकर लाए गए वाल्मीकि समुदाय, पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, राज्य के महाराजा की सेना में पीढ़ियों से सेवारत गोरखा सैनिकों के परिवारों और इन समुदायों की भावी पीढ़ियों से नौकरी, उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और विधानसभा में वोट देने के अधिकार कानूनन छीन लिए। यहां तक कि उन्हें जमीन खरीदने, सहकारी बैंक से ऋण लेने और केंद्र की इंदिरा आवास योजना जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया। 2019 में मोदी सरकार के संवैधानिक संशोधन के बाद ही ये प्रतिबंध समाप्त हुए। पाकिस्तानी हमले में मुजफ्फराबाद, मीरपुर, कोटली आदि में अपना सब कुछ लुटाकर आए हिंदू और सिख शरणार्थियों के लिए भी शेख सरकार ने इतनी कठिन परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि उनका एक बड़ा तबका बाद में राज्य छोड़कर ही चला गया। राज्य सरकार ने कई प्रशासनिक पेचीदगियां खड़ी करके इनमें से अधिकांश परिवारों को जम्मू-कश्मीर से बेदखल भी कर दिया।
संसद में पेश किए जाने वाले बिल को लेकर यही शिकायत है कि इसके पारित होने से केवल 2031 या 2036 तक ही नहीं, बल्कि अनंतकाल तक जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर कश्मीर घाटी और वहां के नेताओं का वर्चस्व कायम रहेगा। नए कानून में विधानसभा में खाली रखी गईं 24 सीटें गुलाम कश्मीर के विस्थापितों और घाटी से बेदखल किए गए हिंदुओं तथा सिख समुदाय के प्रतिनिधियों को देकर राज्य को हमेशा के लिए अतिवादी राजनीति से मुक्त कराया जा सकता था। इन सीटों पर कोई साहसिक फैसला करने के बजाय केंद्र सरकार ने गुलाम कश्मीर से आए समाज को मात्र एक नामित सीट देकर और युगों से कश्मीर घाटी का अभिन्न हिस्सा रहे हिंदुओं को मात्र दो सीटों का झुनझुना पकड़ाकर ऐसा काम किया किया है, जिसके दुष्परिणाम भारत को पीढ़ियों तक भुगतने पड़ सकते हैं।
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