✕
भारत को सशक्त बनाती अमेरिकी साझेदारी
By EditorialPublished on
तेजी से बदल रही दुनिया में अमेरिका (America) के साथ भारत के संबंध बहुत प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। अफसोस इसी बात का है कि द्विपक्षीय संबंधों में आज जो गर्मजोशी आ रही है वह बहुत पहले ही आ जाती, तो शायद भारत (India) के विकास की गाथा ही अलग होती। ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू ही भारतीय विदेश नीति के एकमात्र निर्धारक एवं नियंता थे। आजादी के पहले से ही उनका वैचारिक झुकाव सोवियत रूस की ओर रहा।

x
कैप्टन आर. विक्रम सिंह
तेजी से बदल रही दुनिया में अमेरिका (America) के साथ भारत के संबंध बहुत प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। अफसोस इसी बात का है कि द्विपक्षीय संबंधों में आज जो गर्मजोशी आ रही है वह बहुत पहले ही आ जाती, तो शायद भारत (India) के विकास की गाथा ही अलग होती। ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू ही भारतीय विदेश नीति के एकमात्र निर्धारक एवं नियंता थे। आजादी के पहले से ही उनका वैचारिक झुकाव सोवियत रूस की ओर रहा।
योजनाबद्ध विकास (Planned Development) के लिए रूसी मॉडल का पंचवर्षीय योजना प्रारूप उपयोगी तो था, लेकिन सीमित पूंजी और सीमित विदेशी सहायता के चलते इसका लाभ आर्थिक कम वैचारिक अधिक था। साम्यवादी या समाजवादी विचारों के अतिशय प्रभाव का परिणाम यह हुआ कि हमने सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को प्रश्रय दिया जो यूनियनबाजी और घाटे के शिकार होकर बोझ बन गए। जबकि विश्व युद्ध के बाद जापान, जर्मनी और फ्रांस जैसे बर्बाद हुए देश अमेरिका और यूरोप के पूंजीगत सहयोग से अपने पुनर्निर्माण में लग गए थे।
आर्थिक प्रगति के लिए तब हमें भी अमेरिकी वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग की आवश्यकता थी, लेकिन हम वैचारिक विभ्रम के शिकार बने रहे। उस समय अपनाए गए विकास मॉडल के अनुसार सोवियत रूस और जापान ने हमें बड़े कारखाने बनवाने में तकनीकी एवं सीमित पूंजीगत सहयोग तो दिया, लेकिन हमने पूंजी के बड़े स्रोत जो हमारे अपने उद्यमी भी हो सकते थे, उन्हें आर्थिक गतिविधियों में अपेक्षित भागीदारी नहीं दी और न उन्हें अपने स्तर पर निवेश के लिए प्रोत्साहित किया। उलटे उन पर कोटा परमिट राज थोप दिया। नतीजा भारत की सुस्त आर्थिक वृद्धि के रूप में निकलता रहा। असल में चीन से मित्रता की नेहरू की रोमांटिक ललक बहुत आश्चर्यजनक थी। वह 'एशिया फार एशियंस' के अनावश्यक से नारे के तले चीन से मिलकर एक नई गुटबंदी की परिकल्पना कर रहे थे । अमेरिका धैर्य से नेहरू की इन वैश्विक कलाबाजियों को देख रहा था ।
तुलनात्मक आर्थिक पड़ताल करें तो पाएंगे कि 1962 में जब चीनी आक्रमण हुआ था तब चीन की जीडीपी 47 अरब डालर, जापान की 60 और भारत की 44 अरब डालर थी। यानी तीनों देशों में कोई विशेष अंतर नहीं था। फिर 1970 के बाद भारत का पीछे छूटना साफ दिखने लगा। उस दौर में चीन की जीडीपी 92 अरब डालर, जापान की 212 अरब डालर और जर्मनी की 215 अरब डालर थी। उनकी तुलना में भारत की जीडीपी 60 अरब डालर के स्तर पर अटकी थी। यदि एक ट्रिलियन ( लाख करोड़ डालर अर्थव्यवस्था की बात करें तो जापान 1978 में जर्मनी 1986 में, चीन 1998 और भारत 2007 में इस मुकाम तक पहुंच पाया। जबकि 1980 से लेकर 1990 तक भारत और चीन की जीडीपी लगभग समान थी ।
फिर चीन ने साम्यवादी फरेब से मुक्ति पाकर अमेरिकी और यूरोपीय सहयोग से पूंजीवाद को अपनाया । परिणामस्वरूप 2014 में जब हम 2 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बन जाने का जश्न मना रहे थे तब तक चीन 10 ट्रिलियन डालर के स्तर को पार कर चुका था । यह सफलता उसे अमेरिकी-यूरोपीय पूंजी के निवेश और वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बन जाने के कारण मिली इसका सबक यही है कि साम्यवादी समाजवादी विचारों ने भारत को जो आर्थिक-सामाजिक क्षति पहुंचाई है, वह हमारा बड़े से बड़ा शत्रु भी न कर पाता। इस दौरान भारत क्षेत्रीयता, भ्रष्टाचार और परिवारवाद से बीमार होकर पस्त ही पड़ा रहा।
फिर भारत में नरेन्द्र मोदी का आगमन होता है और चीजें बदलने लगती हैं। उन्होंने अमेरिका के साथ रिश्तों को नया आयाम दिया। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बीते दिनों प्रधानमंत्री मोदी की ऐतिहासिक रूप से सफल अमेरिका यात्रा राष्ट्रपति कैनेडी काल में हुई नेहरू की उच्चस्तरीय, किंतु असफल अमेरिकी यात्रा की भरपाई करने जैसी रही। इस यात्रा के दौरान निवेश के लिए वह विश्वास कायम किया गया, जिसकी एक दौर में भारी कमी महसूस हुई। अन्यथा भारत तो अमेरिकी औद्योगिक पूंजी निवेश का चीन से भी बेहतर विकल्प बन सकता था। इतिहास की भूल सुधारते हुए हमें अब सहज निवेश का ऐसा परिवेश सृजित करना है, जिसमें संकीर्ण सोच वाली राज्य सरकारें बाधा न बन सकें।
स्मरण रहे कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है । इन हितों के लिए यदि संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता भी पड़े तो किया जाना चाहिए। यह न है भूला जाए कि विदेशी निवेश की बदौलत ही आज चीन 17 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बना हुआ है और हम अभी 4 ट्रिलियन डालर के पड़ाव को पार करने की प्रतीक्षा में हैं। अच्छी बात कि अमेरिका भी भारत की आवश्यकताओं- अपेक्षाओं को समझ रहा है। इसीलिए मोदी की यात्रा के दौरान भारत में निवेश के अतिरिक्त अमेरिका ने रक्षा एवं तकनीकी हस्तांतरण के समझौते भी किए। जैसे जीई-414 इंजनों के निर्माण की राह आसान होने से अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकास में बड़ी मदद मिलेगी। इससे हमारी वायु सेना की क्षमताएं बढ़ेंगी । यही इंजन अमेरिकी सेना के एफ-18 लड़ाकू विमानों में उपयोग किया जाता है।
आर्थिक परिदृश्य से इतर सामरिक मोर्चे की बात करें तो पश्चिम एशिया और हिंद- प्रशांत क्षेत्र में भारत और अमेरिकी हितों में समानता दृष्टिगोचर हो रही है, लेकिन हमारी बड़ी चिंता उत्तरी हिमालयी सीमाएं हैं। इस लिहाज से चीन को एक हाथ की दूरी पर रोकना और पाकिस्तान समस्या का स्थायी समाधान भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें हिमालयी क्षेत्र में अमेरिका के सक्रिय सहयोग से भारतीय सीमाओं के लिए एक संयुक्त रक्षा-प्रबंधन प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है। यह व्यवस्था चीन-पाकिस्तान की संयुक्त रणनीति को निरर्थक बना देगी।
भारत-अमेरिका के करीब आने से एक बड़ी रणनीतिक-आर्थिक साझेदारी आकार ले रही है। पश्चिम एशिया से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र क दोनों देशों को एक दूसरे की आवश्यकता है। मोदी के नेतृत्व में बढ़ रही दोनों देशों की निकटता से वामपंथियों और भारत विरोधी शक्तियों को भले ही परेशानी महसूस हो रही हो, लेकिन अतीत की हिचक तोड़कर हमारे साझा आर्थिक- रणनीतिक हितों की दिशा में यह एक ऐसे सशक्त अभियान का प्रारंभ है, जिसके बहुत दूरगामी परिणाम होंगे।

Editorial
Next Story
Related News
X
