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लॉस एंजलेस 8 - अमेरिका में 100 सालों से भारतीय दर्शन का शिक्षण
By EditorialPublished on
शो समाप्ति के बाद सभी कलाकारों का परिचय कराया गया। इस बीच लोग अपनी अपनी जगह से उठ गये और बाहर निकलने लगे। लोग बहुत थे और रसा छोटा पहली बार थोड़ी अनुशासनहीनता और अव्यवस्था का एहसास हुआ। ए लग रहा था, मानों सभी लोग एक साथ बाहर निकलना चाहते हों।
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शो समाप्ति के बाद सभी कलाकारों का परिचय कराया गया। इस बीच लोग अपनी अपनी जगह से उठ गये और बाहर निकलने लगे। लोग बहुत थे और रसा छोटा पहली बार थोड़ी अनुशासनहीनता और अव्यवस्था का एहसास हुआ। ए लग रहा था, मानों सभी लोग एक साथ बाहर निकलना चाहते हों। मैं भी काफी देर से बैठा था इसलिये शंका समाधान की तीव्र आवश्यकता महसूस कर रहा था, शायद अन्यों पर भी एसा ही दबाव था। बाथरूम कई थे मगर सब पर लम्बी लम्बी कतारें लगी थी। गनीमत थी कि स्त्रियों की बनिस्पत पुरूषों की कतारें छोटी थीं।
अगले दिन हम सेन डियेगो के लिये निकल पड़े। यह लॉस एंजलेस के बाद केलिफोर्निया का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। पश्चिमी तट पर जब यूरोपीयन आये थे तो सबसे पहले इसी पर कब्जा किया था और इसे स्पेन का एक हिस्सा घोषित कर दिया, बाद में यह स्वतन्त्र मेक्सिको देश में शामिल कर लिया गया पर जल्द ही यह अमेरिका का अंग बन गया।
सेन डियेगो का जू विश्व प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिये पर्यटकों का तांता लगा रहता है। इस कारण यहां पर्यटन के कई अन्य आकर्षण भी पनप गये हैं। सेन हियेगो की तट रेखा बहुत लम्बी है, जगह जगह खूबसूरत बीच है। इन बीचों के किनारे धीरे धीरे बस्तीयां बसने लगी जिन्होंने कालान्तर में बीच सिटीज का रूप ले लिया। गहमागहमी और व्यस्तता से दूर इन छोटे छोटे उपनगरों में पर्यटकों की आवश्यकता की हर चीज सुलभ होने लगी। होटलें, खाने पीने के तरह तरह के रेस्टोरेन्ट और मनोरंजन के साधन।
हमारे यहां पूरब और पश्चिम दोनों तरफ हजारों कि.मी. की तट रेखा और बीच हैं मगर कुछ प्रमुख शहरों को छोड़ कर दूरस्थ तथा अलग थलग क्षेत्रों में इस तरह की बीच सिटीज पनपाने के प्रयास अत्यन्त कम है।
इसी तरह की एक छोटी सी बीच सिटी के किनारे परमहंस स्वामी योगानन्द का आश्रम है जो सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप हेतु प्रसिद्ध है। यहां सच की खोज करने वालों को वैज्ञानिक तकनीक द्वारा सीधे भगवान का व्यक्तिगत अनुभव कराया जाता है। इस हेतु यहां आत्म साक्षात्कार के पाठ पढाये जाते हैं। ये पाठ परमहंस योगानन्द के लेखों और भाषणों पर आधारित होते हैं।
आश्रम समुद्र किनारे अत्यन्त मनोरम प्राकृतिक वातावरण में स्थित है। यहां का परिसर बहुत बड़ा है। दूर से ही इसके किनारों पर स्थापित बड़े बड़े कमल के फूल की स्वर्ण आकृतियां आकर्षित कर लेती हैं। यहां की फेलोशिप लेने की भारी मरकम फीस है। प्रशिक्षण पत्राचार द्वारा या यहां आश्रम में रहकर प्राप्त किया जा सकता है।
देश से इतनी दूर, इतने सालों पहले एक हिन्दु योगी द्वारा इस तरह के आश्रम की स्थापना रोमांचित कर देने वाली थी। आश्रम में प्रवेश निषिद्ध था। हम बाहर बाहर से ही देख और इसके परिसर के चारों ओर चक्कर लगा कर ही सन्तुष्ट हो गये।
आश्रम में जन्माष्टमी, गुड फ्राईडे, ईस्टर व क्रिसमस के पर्व समारोह पूर्वक में मनाये जाते हैं। गोरखपुर के बंगाली परिवार में मुकुन्द लाल घोष के नाम से जन्म लेने वाले योगानन्द 1920 में एक जहाज में बैठकर अमेरिका आये और उसी वर्ष बोस्टन में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय धर्म सम्मेलन में भाग लिया। उसी वर्ष उन्होंने सेल्फ रियलाईजेशन फेलोशिप की स्थापना की तथा भारत की प्राचीन परम्पराओं व दर्शन की शिक्षा देना शुरू किया। उनके भाषण सुनने हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होते थे। 1925 में लॉस एन्जलेस के पास इस वर्तमान स्थान पर अपने आश्रम की स्थापना की। योगानन्द पहले एसे हिन्दु शिक्षक थे जिन्होंने इतने वर्ष अमेरिका में व्यतीत किये। 1920 से 1952 तक मृत्यु परन्त वे यहीं रहे। बीच में साल भर के लिये जरूर वे अपने गुरू से मिलने भारत आये। इस दौरान उन्होंने महात्मा नी भी भेंट की थी।
आश्रम में और इसके आसपास की बागवानी और फूलवाड़ी देती थी। आश्रम के इलाके में दूर दूर तक स्थित वृक्षों को इतनी सुन्दरता काटा-छांटा गया था कि एक पल के लिये तो ऐसा लगता जैसे ये कृत्रिम हो ।
केलीफोर्निया में भारतीय आप्रवासियों का जमावड़ा है ही। सेन फ्रांसि की सिलीकोन वेली में भारतीयों की भरमार है, उसी तरह सेन डियेगो में भी क भारतीय हैं। यहां भारतीयों के कई संगठन बने हुए हैं जो साल भर विविध आयोजन करते ही रहते हैं। एसा ही एक संगठन सेन डियेगो इण्डियन देशी है।
सेन डियेगों के जन्तुआलय की विश्व के प्रसिद्ध जन्म जाती है। यहां 650 प्रजातियों के लगभग 3700 जानवर है। जानवरों को बिना पिंजरे, खुली हवा में देखने की अवधारणा इसी जू से प्रारम्भ हुई थी। लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में फैले इस जू को देखने के लिये एक दिन पर्याप्त नहीं होता। जू में एक बस चलती है जिसमें बैठकर जरूर आधे के करीब जू का हिस्सा देखा जा सकता है। इसके अलावा केबल कार भी चलती है जिससे जू का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।
जानवरों को विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है और इन क्षेत्रों को उन भू भागों का ही रूप दिया गया है जैसे अफ्रीकी रेन फोरेस्ट, आर्कटिक टुन्ड्र क्षेत्र की विशेषता यहां के विशाल पाण्डा जानवर हैं। पोलर बीयर, गोल्ला चिम्पांजी अन्य प्रमुख आकर्षण है। शेष सभी प्रकार के जानवर तो हैं ही।
यहां के बड़े नगरों की एक विशेषता यह देखी कि इनके सभी उपनगरों को स्वायत्तता प्रदान है। छोटे छोटे नवसृजित उपनगरों की भी अपनी स्वायतानी म्यूनिसिपाल्टी है। इस कारण इन नगरों की साफ सफाई, बिजली, पानी, रहन सहन, रख रखाव आदि की मूलभूत आवश्यकताओं की देखभाल स्थानीय स्तर पर ही हो जाती है। हमारे यहां तो मुम्बई जैसे महानगर की करोड़ों की आबादी की भी एक ही म्यूनिसिपाल्टी है। अकेला अंधेरी क्षेत्र देश के किसी भी बड़े शहर के समकक है मगर वह भी बी. एम. सी. के तहत आता है। स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं का जितना अधिक विकेन्द्रीकरण होगा जन सामान्य की आवश्यकताओं की देखभाल उतनी ही त्वरित व गहन होगी।
ऐसे ही एक छोटे से उपनगर में जाने का अवसर मिला। मुश्किल से 4-5 हजार की आबादी थी फिर भी इसकी अपनी म्युनिसिपाल्टी थी। आस-पास के ही मिल कर इसे चलाते थे इस कारण उन्हें अपनी आवश्यकताओं और ताओं का भलिभाति ज्ञान था। हर उपनगर में एक सार्वजनिक पुस्तकालय होता ही है जिसका नागरिकगण भरपूर उपयोग करते हैं। बहुत दुःख की बात है कि हमारे यहा पुस्तकालयों की अवधारणा धीरे धीरे समाप्त होती जा रही है और लोगों कापने के प्रति रुझान कम होता जा रहा है।

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