Pratahkal-Various service work by Mahaveer International

मुम्बई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने शनिवार को तीर्थंकर समवसरण में कहा कि कितनी संज्ञाएं प्रज्ञप्त हैं? उन्होंने कहा कि जैन आगमों में दस संज्ञाएं हैं- आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा, क्रोध संज्ञा, मान संज्ञा, माया संज्ञा, लोभ संज्ञा, लोक संज्ञा और ओघ संज्ञा। संज्ञा शब्द जैन तत्त्वज्ञान में प्रयुक्त हुआ है। यहां संज्ञा शब्द का प्रयोग भीतर की वृत्तियों के संदर्भ में किया गया है। सामान्य साधु अथवा गृहस्थ जीवन में रहने वाले मनुष्यों के भीतर अनेक वृत्तियां होती हैं। ये सभी के भीतर स्थित होती हैं। पहले तो यह सुप्तावस्था में पड़ी रहती हैं और जब जागृत अवस्था में आती हैं तो वह उभर आती हैं।
साधना की ऊंची भूमिका में तो ये संज्ञाएं समाप्त हो जाती हैं। पहली संज्ञा आहार संज्ञा बताई गई है। आदमी में खाने की इच्छा होती है। भोजन करने के बाद भी आदमी कोई मनोज्ञ पदार्थ देखकर खाने लग जाता है। यह खाने की मनोवृत्ति होती है। आदमी को जिह्वा के स्वाद अथवा लालचवश नहीं खाने का प्रयास करना चाहिए। आहार को स्वास्थ्य के लिए और साधना के लिए खाना है।
दूसरी भय संज्ञा बताई गई है। इसमें कोई आदमी जल्दी डर जाता है। छोटी-छोटी बातों से, किसी जानवर या स्थिति से डर जाता है तो कोई-कोई जल्दी भयभीत नहीं होता। अपनी भय संज्ञा पर आदमी को नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए। इसी प्रकार मैथुन संज्ञा है। आदमी के भीतर परिग्रह की संज्ञा भी जागृत हो सकती है। एक आदमी आवश्यकता के अनुसार पदार्थों को ग्रहण करता है और एक आदमी लालचवश पदार्थों का संग्रहण करता है। आदमी को परिग्रह संज्ञा को भी नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। इसी प्रकार क्रोध संज्ञा, मान संज्ञा, माया संज्ञा, लोभ संज्ञा को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अपने जीवन में क्रोध, लोभ, मोह, माया, भय, परिग्रह आदि को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आचार्य कालूगणी के जीवन वृतांत ‘कालूयशोविलास’ का सरसशैली में वाचन किया।
आचार्यश्री ने इक्कीस रंगी तपस्या के आठवें दिन तपस्या करने वालों को तपस्या का प्रत्याख्यान कराया। मुनि अनेकांतकुमार ने तपस्या के संदर्भ में सूचना दी।
Editorial

Editorial

Next Story