Pratahkal-Spiritual happiness is the end of deeds: Acharya Mahashraman

मुम्बई । भगवती सूत्र में प्रश्न किया गया कि जो नारकीय जीव पाप किए हैं, कर रहे हैं और आगे भी करेंगे वह दुःख है और कर्म की निर्जरा सुख है? उत्तर दिया गया कि हां, जो पाप कर्म किए हैं, कर रहे हैं और आगे करेंगे वह दुःख और कर्मों की निर्जरा सुख है।
जीव जो भी पाप किया है, कर रहा है और आगे करेगा, वही पापकर्म उसके लिए दुःख होता है और जब पाप कर्मों की निर्जरा हो जाती है, जब पाप कर्म क्षीण हो जाते हैं तो वह सुख की प्राप्ति कर सकता है। जो पाप कर्म हैं, वे दुःख के मूल कारण है। पाप कर्म को ही अध्यात्म जगत में दुःख कहा गया है। तपस्या वह कारण है, जिसके माध्यम से कर्म निर्जरा रूपी कार्य होता है। तपस्या, स्वाध्याय, सेवा आदि से कर्मों की निर्जरा होती है। आदमी की आत्मा स्वयं में सुख होती है। आत्मा को न जानने वाला और उससे दूर रहने वाला आदमी बाह्य जगत में इन्द्रिय सुख को खोजता रहता है। आदमी को तपस्या, साधना, स्वाध्याय और सेवा के द्वारा कर्मों की निर्जरा कर वास्तविक सुख की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। बाह्य सुख तो पुण्य से प्राप्त होते हैं। पुण्य समाप्त होते ही बाह्य सुख समाप्त हो जाते हैं, किन्तु निर्जरा के माध्यम से प्राप्त सुख शाश्वत सुख होता है। इसलिए आदमी को अपने कर्मों को क्षीण करने का प्रयास करना चाहिए।
उक्त प्रेरणा आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने शुक्रवार को नंदनवन परिसर में बने तीर्थंकर समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को दी। समणी कुसुमप्रज्ञा ने भी अभिव्यक्ति दी।
Editorial

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