शब्द व रूप काम तथा रस, गंध और स्पर्श हैं भोग : आचार्य महाश्रमण
तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने बुधवार से 32 जैन आगमों में सबसे बड़े ग्रन्थ भगवती सूत्र पर आधारित प्रवचन का क्रम प्रारम्भ किया तो वहीं श्रद्धालुओं (Devotees) के लिए ‘कालूयशोविलास’ की आख्यान माला भी आरम्भ की। उन्होंने कहा कि जैन (Jain) परंपरा में 32 आगम मान्य हैं, जिनमें भगवती सूत्र सबसे बड़ा आगम है।
मुम्बई : तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने बुधवार से 32 जैन आगमों में सबसे बड़े ग्रन्थ भगवती सूत्र पर आधारित प्रवचन का क्रम प्रारम्भ किया। वहीं, श्रद्धालुओं (Devotees) के लिए ‘कालूयशोविलास’ की आख्यान माला भी आरम्भ की। उन्होंने कहा कि जैन (Jain) परंपरा में 32 आगम मान्य हैं, जिनमें भगवती सूत्र सबसे बड़ा आगम है। आगमों की मूल भाषा प्राकृत अथवा अर्धमागधि है, जो वर्तमान में जनमानस की भाषा में नहीं है, इसलिए आम लोगों के लिए यह सुगम भी नहीं है। आचार्य तुलसी की आज्ञा से आचार्य महाप्रज्ञ ने जैन आगम आचारांग पर संस्कृत भाषा में भाष्य लिखा। मुझे भी उसे लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आचार्य महाप्रज्ञ बोलते और उसे लिखते थे।
मूल 11 अंग आगमों में पांचवां और सबसे बड़ा आगम है भगवई बिआहपण्णत्ती, जिसे छोटे रूप में भगवती सूत्र भी कहते हैं। इसे पढ़ने से विभिन्न विषयों का ज्ञान होता है। इसमें भगवान महावीर ने बताया है कि शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श का सेवन आदमी की पांचों इन्द्रियों द्वारा होता है। इन पांचों को दो भागों में विभक्त किया गया है। शब्द और रूप को काम कहा गया है और रस, गंध और स्पर्श को भोग कहा गया है। जिन विषयों की कामना की जाए और संवेदन न हो उन्हें काम और जिन विषयों का संवेदन भी हो वह भोग होता है। रस, गंध और स्पर्श को इन्द्रियों से भोग किया जाता है।
जीव कामी भी होते हैं और भोगी भी होते हैं। मनुष्य कामी और भोगी होता है। आदमी को अपने जीवन में यह प्रयास करना चाहिए कि इन्द्रियों का अनावश्यक उपयोग न हो। काम और भोग में संयम करने का भाव होना चाहिए।
उन्होंने कालूयशोविलास आख्यान का आरम्भ करते हुए कहा कि छापर चतुर्मास के दौरान हमने इसका आख्यान आरम्भ किया था। उन्होंने इसके माध्यम से आचार्य कालूगणी के सुजानगढ़ चतुर्मास के प्रसंगों का वर्णन किया।



