Pratahkal - Suresh Goyal
कोस्टको एक वेयरहाउस क्लब स्टोर है अर्थात यह एक होलसेल स्टोर है जो सदस्यता आधारित है। इसके सदस्य ही यहां खरीददारी कर सकते हैं, जबकि वालमार्ट एक पूर्णतया रिटेल स्टोर है जहां हर कोई खरीददारी कर सकता है। यहीं वजह है कि वालमार्ट आज भी दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल चैन है। कोस्टको की सदस्यता बहुत आसान है इसलिये हर कोई सदस्य बन जाता है, इस कारण वालमार्ट के बाद दूसरी सबसे बड़ी रिटेल चैन में कोस्टको का ही नाम आता है जबकि सदस्यता आधारित रिटल चैन में कोस्टको सबसे अव्वल है। भारत में अभी तक न वालमार्ट और न ही कोस्टको का प्रवेश हुआ है मगर दोनों ही कम्पनियां भारत के मध्यम वर्ग के विशाल मार्केट को देखते हुए इस दिशा में प्रयत्नशील भारत में अभी मेट्रो तथा बेस्ट प्राईस जैसे वेयरहाउस क्लब स्टोर हैं। इनकी सदस्यता तभी मिलती है जब आपके पास वैध व्यापारिक लाइसेन्स हो । कोस्टको की सदस्यता के साथ एसी कोई बाध्यता नहीं है।
स्टोर के बाहर ही एक लम्बी लाईन लगी हुई थी। रविवार था इसलिये हमने सोचा आज भीड़ ज्यादा है, हम इस लाइन में खड़े हो गये मगर दूसरी तरफ लोगों को सीधे अन्दर जाते देखा तो पूछा, पता चला कि यह लाईन सामान वापस लौटाने वालो की थी। हम भी अब अन्दर प्रविष्ठ हो गये, स्टोर इतना विशाल था कि मैं आंखें फाड फाड़ कर ही देखता रहा, जिधर नजर घुमाओ उधर बड़ी बड़ी अल्मारियां, कहीं कोई छोर ही नजर नहीं आ रहा था, कोई तीन मंजिल ऊंची छत होगी जहां तक शेल्फें लगी हुई थी। हर तरह का सामान यहां उपलब्ध था। बाहर पेट्रोल पम्प था जिसमे पेट्रोल भराने के दाम सामान्य से आधा डालर प्रति गेलन कम थे।
यह आश्चर्य की ही बात है कि आधुनिकता का इतना बड़ा वाहक होने के बावजूद अमेरिका उसी दकियानूसी ब्रिटिश प्रणाली में अटका हुआ है जिससे स्वयं ब्रिटेन तक ने निजात पा ली है। आज भी यहां दूरी मीलों में, वजन पाउण्ड में, माप गेलन में, नाप इन्वों में और डिग्री फेरनहीट में आंकी जाती है। कई अमरीकीयों को इस बारे में बात करते हुए अपने पिछड़ेपन पर कुंठित होते देखा जाता है। वे यही सवाल करते हैं कि दुनिया किलोमीटरों में चल रही है और हम मीलों में अटके हुए हैं।
कोई एसा धन्धा नहीं जो कोस्टको नहीं करता हो, यात्रा के टिकट, होटल बुकिंग, साईट सिंग, क्रूज, प्रोपर्टी खरीद-बेच, लगभग हर तरह का व्यापार इसके माध्यम से होता है। बच्चों ने भारत से फरमाईशें भेज दी थी उसी के अनुसार प्रीति खरीददारी कर रही थी। आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब घूमते घामते एक जगह हल्दीराम के नमकीन के पैकेट सजे हुए नजर आ गये। यह बढ़ती हुई भारतीयों की उपस्थिति का प्रतीक था।
एक आश्चर्य खत्म हुआ नहीं कि दूसरा तैयार था। उदयपुर में डा. फतह सिंह मेहता एवं डा. गरिमा मेहता मेरे परम मित्र हैं। दोनों मुझे दादा कहते हैं। स्टोर में घूमते घामते अचानक इनकी पुत्री अम्बिका से भेंट हो गई। मुझे दूर से ही देख पहचान गई, उसके भी आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। मैं उस दिन कुर्ता-पाजामा पहने था इसलिए भारतीयों की श्रद्धा का केन्द्र था। हर कोई मुझे देख प्रशंसा के भाव में मेरी तरफ मुस्कुराहट फेंक देता था, मन ही मन एक क्षण के लिये शायद वो अपनी जड़ों की सैर कर आता था। अम्बिका भी दूर से इसी तरह आकर्षित हुई थी, पास में आई तो मुझे देख प्रसन्न हो उठी। मैंने अम्बिका के साथ अपनी फोटो वाट्स अप किया तो गरिमा ने जवाब दिया- दुनिया बहुत छोटी है दादा।
यहां की जो शोपिंग ट्रोलियां थीं वे भी बहुत बड़ी बड़ी थी। अमूमन माल्स में जो ट्रोली नजर आती है उससे दुगुनी लोग इतनी खरीददारी करते हैं कि इतनी बड़ी ट्रोलियां भी छोटी पड़ती है। यहां विकलांगों के लिये कई स्वचलित ट्रोलियां भी थीं जो बेट्री से चलती थी। एसी कई ट्रोलियों में बैठे विकलांग नजर आये जो स्टीयरिंग से हेन्डल घुमाते हुए इधर उधर घूम रहे थे, इनके साथ कोई न कोई था जो खरीददारी करता था।
प्रीति सामान देख देख उनके फोटो ले रही थी और भारत वास जा रही थी, उधर से जवाब आ रहा था कि ठीक है या नहीं है, रंग पसन्द है या न है। खरीददारी की इस आधुनिकता को देख मैं दंग था। कहाँ अमेरिका और भारत ? मगर लग ऐसा रहा था जैसे एक ही मोहल्ले की बात हो। यहां विभि कम्पनियां अपने प्रचार अभियान के अन्तर्गत समय समय पर डिस्काउन्ट कूपन जारी करती हैं जो पत्रिकाओं, अखबारों में छपते रहते हैं। लोग इन कूपनों को काट कर संभाल लेते हैं और जब जब उस कम्पनी के किसी उत्पाद को खरीदते तो इन कूपनों से रियायत ले लेते हैं। प्रीति ने भी ऐसे कई कूपन एकत्र कर रखे थे. भुगतान करते वक्त इन्हें बता कर लाभ ले लिया।
स्टोर बहुत बड़ा था, कहीं बैठने की एक सीट तक नहीं थी, में चल चल कर थक गया था, एक जगह सोफे और कुर्सिया बिक्री के लिये प्रदर्शित थी, वहीं जाकर बैठ गया, सोचा कोई उठायेगा तो उठ जाउंगा मगर किसी ने मना नहीं किया वरन उधर से गुजरने वाले स्टोर के कर्मचारियों ने मुस्कुरा कर एक तरह से स्वीकृति है प्रदान की। हमारे यहां एसा नहीं है, एक मिनीट में स्टोरकर्मी चिढ़ते हुए उठा दें कि यह बैठने की जगह नहीं है।
मैं बैठा था तभी मुनीश केनवास के स्पोर्ट्स शू की एक जोड़ी लेकर आया और बोला पहन कर देखिये। मैंने मना कर दिया कि एसे जूते तो मैं पहनता नह हूं। जयपुर में भी संदीप ने मुझे इस तरह के जूते लेने को कहा था पर मैं नहीं माना था। मुनीश ने कहा कि हमें प्लेशियर पर जाना है, बर्फ पर चलना है, बिना ऐसे जूतों के वहां जाने नहीं देंगे। मेरे पास कोई उत्तर नहीं था, मैंने जूते पहन कर देखे, थोडे बड़े थे तो एक नम्बर छोटे के खरीद लिये। पूरी जिन्दगी एसे लैस वाले जूते नहीं पहने थे, बचपन में पहने होंगे। जनम पत्री में जूते की कहावत शायद इसी से बनी थी।
लॉस एंजलेस पहाड़ी प्रदेश है, उदयपुर की तरह यहां भी जगह जगह छोटी मोटी पहाड़ियां नजर आ जाती है। खरीददारी करके हम बाहर निकले तो सामने है एक टाटली मगरी थी। इसकी विशेषता यह थी कि इसे पीले रंग से रंग दिया गया था। वनस्पति कोई उगी हुई नहीं थी इसलिये यह काम आसान था। रंगीन पहाड़ी इतना सुन्दर दृश्य उपस्थित कर रही थी कि उसका टाटलापन छिप गया था। यहाँ एक बहुत बड़ी बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा था, उसके पास मिट्टी के भराव से एक टीला बन गया था। मिट्टी शायद बाद में काम में आने वाली थी इसलिये उठाई। नहीं गई थी, इस मिट्टी के टीले को भी हरे रंग से रंग दिया गया था जिससे इसकी सारी गन्दगी छिप गई थी। लोगों की कल्पनाशीलता देख कर में दंग था। लॉस एन्जलेंस में इन दिनों एक आर्ट फेस्टीवल चल रहा था। इसी के तहत विश्व प्रसिद्ध पेजेन्टस ओफ दी मास्टर्स शो भी चल रहा था। शो के अन्तर्गत विश्व प्रसिद्ध चित्रों का सजीव रूपांतरण मंच पर किया जाता है। चित्रों के अन्दर जो पात्र होते हैं वे जीते। जानते मंच पर इस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं कि उन्हें देख कर ऐसा लगता है जैसे हम वह चित्र ही देख रहे हों। यह शो इतना लोकप्रिय है कि इसके टिकिट आसानी से नहीं मिलते मगर शैलेश ने किसी तरह हमारे लिये ये टिकिट जुटा लिये थे, वो भी रविवार के शो के। शाम को इसी शो में जाना था इसलिये जल्दी घर लौट आये।
Editorial

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