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सवाल समान नागरिक संहिता का
By EditorialPublished on
न्यायमूर्ति रंजना देसाई (Ranjana Desai) उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने संबंधी अपनी रिपोर्ट (Report) जल्द वहां की सरकार (Government) को सौंपेंगी। बकौल न्यायमूर्ति देसाई - 'हमने सभी पक्षों से बात की है। यह रिपोर्ट सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के साथ लैंगिक समानता (Gender Equality) को लागू करने वाली होगी।'

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न्यायमूर्ति रंजना देसाई (Ranjana Desai) उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने संबंधी अपनी रिपोर्ट (Report) जल्द वहां की सरकार (Government) को सौंपेंगी। बकौल न्यायमूर्ति देसाई - 'हमने सभी पक्षों से बात की है। यह रिपोर्ट सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के साथ लैंगिक समानता (Gender Equality) को लागू करने वाली होगी।'
यकीनन, उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार को यदि एक साल पहले गठित इस आयोग से मनोनुकूल रिपोर्ट मिलती है, तो वह बिना देर किए इसे विधानसभा में ले जाएगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हरचंद कोशिश होगी कि वह जल्द से जल्द इसे कानून का रूप दे दें। अगर ऐसा होता है, तो गोवा के बाद उत्तराखंड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला दूसरा राज्य बन जाएगा। ध्यान रहे, गोवा में समान नागरिक संहिता पुर्तगाली हुक्मरानों ने 1867 में लागू की थी। इसे 1962 में कुछ रद्दोबदल के साथ आजाद गोवा राज्य में भी मान्यता मिल गई थी।
याद करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरी 27 जून को भोपाल में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह एजेंडा स्थापित कर दिया था। तभी तय हो गया था कि भारतीय जनता पार्टी 2024 के चुनाव के लिए इसी रणनीति पर काम करने जा रही है । प्रधानमंत्री के बयान के बाद संसदीय समिति ने भी केंद्रीय विधि आयोग और कानून मंत्रालय के नुमाइंदों को इस मसले पर तलब किया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार इस मसले को मानसून सत्र के दौरान संसद में पेश कर सकती है। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि प्रधानमंत्री ने इसके लिए यही समय क्यों चुना? जवाब मुश्किल नहीं है। अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस दौरान इस मसले का 'लिटमस टेस्ट' हो जाएगा ।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ऋतुराज अवस्थी की अगुवाई वाले विधि आयोग ने जब गुजरी 14 जून को इस मामले में तीस दिन के भीतर लोगों की राय मांगी थी, तभी कांग्रेस के जयराम रमेश ने ट्वीट करके पूछा था कि साल 2018 में जब विधि आयोग अपने परामर्श पत्र में साफ तौर पर कह चुका है कि समान नागरिक संहिता की कोई जरूरत नहीं है, तो फिर इस मुद्दे को पुन: क्यों छेड़ा जा रहा है? विपक्ष का एक सवाल यह भी है कि गुजरात में भारतीय जनता पार्टी एक चौथाई सदी से शासन में है, पर वहां इस तरह की पहलकदमी क्यों नहीं ? क्या भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर गंभीर नहीं है? ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। आप 2019 का चुनाव याद करें। भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी अभियान के दौरान जो विज्ञापन सार्वजनिक किए थे, उनमें तीन तलाक और अनुच्छेद 370 का जिक्र मोटे शब्दों में था। मोदी सरकार ने दोबारा सत्ता संभालने के बाद बिना देर किए उनको अमलीजामा पहना दिया। क्या प्रधानमंत्री भोपाल में संदेश दे रहे थे कि आगामी चुनाव जिताइए, हम इस मसले को अंजाम तक पहुंचा देंगे? तीन तलाक और अनुच्छेद 370 की तरह भगवा दल का यह दशकों पुराना वायदा है।
यहां मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नजरिये पर भी चर्चा करनी चाहिए। मोदी के बयान के अगले दिन आयोजित इसकी बैठक में तय किया गया कि बोर्ड अपनी राय से विधि आयोग को अवगत कराएगा। मतलब साफ है, बोर्ड के सदस्य इस मसले को सरेआम तूल देने के बजाय फूंक-फूंककर कदम रखना चाहते हैं। वे जानते हैं कि सार्वजनिक हाय-तौबा से भारतीय जनता पार्टी को फायदा मिलेगा। क्या वे इस मुद्दे पर टीवी पर दहाड़ने वाले मौलानाओं को चुप करा पाएंगे? क्या विपक्ष के बयानवीर संयम बरतेंगे? भाजपा विरोधी मोर्चे की प्रमुख सदस्य शिवसेना (उद्धव) ने इस मुद्दे पर सहमति जताई है। क्या शरद पवार इसीलिए संयंत शब्दों में बोल रहे हैं? यहां आम आदमी पार्टी के रूख पर गौर फरमाइए । पार्टी का कहना है कि यदि सरकार सभी पक्षों की सहमति से इस फैसले को लेती है, तो हम साथ हैं। अनुच्छेद 370 की रूखसती के वक्त भी पार्टी ने उसका समर्थन किया था । तय है, अरविंद केजरीवाल 'राइट फ्रॉम सेंटर' का पुराना फॉर्मूला आजमा रहे हैं। कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेन्स जैसे दल खुलकर खिलाफ हैं। क्या इसका असर विपक्ष की एकता पर पड़ेगा? यहां आने वाले छह महीनों की दो महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी ध्यान देना चाहिए। सितंबर में भारत जी- 20 के शासनाध्यक्षों के सम्मेलन की मेजबानी करेगा। नरेंद्र मोदी इस समूह के अध्यक्ष होने के नाते हर गतिविधि के केंद्र में रहेंगे। इसी तरह, अगले साल के आरंभ में अयोध्या में रामलला के मंदिर का लोकार्पण होगा। आप काशी और उज्जैन के समारोहों को याद कर लीजिए। भव्यता और दिव्यता में उन्होंने तमाम ऐसे आयोजनों को फीका कर दिया था। भाजपा इसका भरपूर लाभ उठाने की कोशिश अवश्य करेगी, ताकि विपक्षी एकता के परवान चढ़ने की स्थिति में भी अपनी नाव पार लगाई जा सके।
कांग्रेस की दृष्टि से देखें, तो पिछले चुनाव के बाद एक सकारात्मक परिवर्तन जरूर हुआ है। राहुल गांधी ने 'भारत जोड़ो यात्रा' के बाद अपनी छवि पर थोप दी गई नकारात्मकता से मुक्ति पा ली है। अब उन्हें कोई 'पप्पू' नहीं कहता। वह लगातार अपनी 'इमेज' पर काम कर रहे हैं। जब जस्टिस रंजना देसाई पत्रकारों से बात कर रही थीं, तब वह मणिपुर में हिंसा पीड़ितों से मिल रहे थे। इससे पूर्व वह कभी ट्रक यात्रा, तो कभी छात्रों या कामगार महिलाओं के बीच पहुंचकर सुर्खियां बटोरने की कामयाब कोशिश कर
चुके हैं। हिमाचल और कर्नाटक जीत से कांग्रेस का हौंसला बढ़ा हुआ है। इस दौरान प्रियंका गांधी ने तेजी से अपनी मौजूदगी का एहसास कराया है और पार्टी ने अध्यक्ष पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे को चुनकर छिटके हुए दलित मतदाताओं को संदेश देने की कोशिश की है। खड़गे के केंद्रीय भूमिका में आ जाने से परिवारवाद के आरोप भी धुंधले पड़े हैं।
यहां विपक्षी एकता की बात करने में भी कोई हर्ज नहीं। पटना में 23 जून को पंद्रह दलों ने साथ चुनाव लड़ने की कसम खाई थी। अब वही नेता बेंगलुरू में दोबारा मिलने जा रहे हैं। ये नेता अपने- अपने क्षेत्रों और समूहों में अवश्य कद्दावर हैं, पर राष्ट्रीय रायशुमारी के वक्त उन्हें ठोस मुद्दों के साथ मैदान- ए-जंग में उतरना होगा। उन्हें याद रखना चाहिए कि अब तक मोदी और शाह की जोड़ी ने कई चुनावों में जाति और वर्ग के बंधनों को तोड़ा है। इस चुनाव में भी धर्म, राष्ट्रवाद, जन-कल्याण और प्रधानमंत्री की मजबूत शख्सियत के नाम पर तीसरी जीत की व्यूह रचना रची जाएगी। यही वजह है कि प्रतिपक्ष को जल्दी ठोस निर्णय पर पहुंचना होगा, क्योंकि भाजपा ने अपने मोहरे बैठाने शुरू कर दिए हैं।

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