Pratahkal - Suresh Goyal
हम लोग समुद्र किनारे ही थे। जिस बन्दरगाह से अगले दिन हमारा जल पोत स्थाना होने वाला था वह भी पास ही था। पार्क से रवाना होकर हम लोग इस की तरफ से ही गुजरे। सड़क के किनारे से ही पानी में खड़े कई जहाज आहे थे। सब बड़े बड़े और कई मंजिले थे। ये सभी क्रूज यात्रा के ही जहाज में से एक जहाज में हम भी यात्रा करने वाले थे। सड़क के उपर एक बहुत बड़ा पुल बना हुआ था। इसके एक तरफ समुद्र था तो दूसरी तरफ दो विशाल दोनों आमने सामने थे। यहां फुटबाल, बेसबाल व बास्केटबाल के खेल होते ही रहते हैं। ये तीनों ही खेल अमेरिका में बहुत लोकप्रिय है। न्यूयार्क से लॉस एफस आते हुए ट्रेन में जो अमरीकी मिला था वो भी शायद यहीं किसी खेल में भाग लेने आ रहा था।
हमारे यहां जिस तरह आई.पी.एल. क्रिकेट की दीवानगी है वैसे ही यहां इन तीनों खेलों की भी है। ये दोनों स्टेडियम सीएटल की दो प्रसिद्ध फुटबाल टीमों के घरेलू मैदान हैं। इनमें से सीएटल सी हाक्स स्टेडियम पर सीएटल सी हाक्स खेलती है जबकि सेन्चुरी लिंक फील्ड पर सीयेटल साउन्डर्स की टीम खेलती है। दोनों टीमों के मालिक आई.पी.एल. की तरह ही कोरपोरेट कम्पनियां होती हैं। इन तीन खेलों के अलावा आईस होकी का खेल भी अमेरिका में बहुत लोकप्रिय है।
यहां से गुजर रहे थे तभी राजा का फोन आ गया। यह हवाई अड्डे पहुँच गया था और उड़ान समय पर थी। न्यूयार्क से सीएटल पांच-छः घन्टे की उड़ान थी। सीएटल 3 घंटे पीछे था इस हिसाब से रात 10 बजे तक उसकी उड़ान पहुँचने वाली थी। हम सबको उसके फोन से तसल्ली हो गई और उसके आने नहीं आने की अनिश्चितता खतम हुई। क्रूज का टिकिट हालांकि सस्ता मिल गया था फिर महंगा था। मुनीश ने दो माह पहले ही इधर उधर सर्च कर कम से कम कीम टिकट हासिल कर लिये थे। दो हजार डालर का एक टिकट 1400 में ही मिल था फिर भी राजा नहीं आ पाता तो ये 1400 डालर तो पानी में जाते ही।
सीएटल शहर से थोड़ी ही दूरी पर वाशिंगटन प्रान्त का प्रसिद्ध क झरना था। हमारे पास काफी वक्त था। सीएटल आने वाला प्रत्येक पर्यटक झरने को देखना चाहता है मगर दूर स्थित होने के कारण सब अपनी इच्छा पूर्ण कर पाते।
स्नोवाल्मी हारना वही है जो प्रसिद्ध अंग्रेजी टी.वी. सील दिखाया जाता है। शीघ्र ही हम झरने के पास पहुँच गये। समू बहुत बड़ा उद्यान है, यहाँ तरह तरह के फूल के पौधे का मनमोह यहाँ से झरने तक जाने के लिये एक रास्ता बनाया हुआ है। रास्ते के स्टाल व गिफ्ट शॉप्स की कतारें है। यहां शौचालय भी अच्छी संख्या में पर्यटन स्थल पर ये तीनों चीजें अत्यन्त आवश्यक होती हैं।
हमारे यहां गिफ्ट शोष और फूड स्टाल तो छोड़ो समुचित शौचालय भी होते। उदयपुर के गुलाब बाग को ही लें, इतना लम्बा चौड़ा उद्यान है, दैनिक घूमने वाले और पर्यटक इतनी भारी संख्या में यहां आते हैं फिर भी सिर्फ एक ज शौचालय बना हुआ है वह भी सुलभ शौचालय। यदि बाग के एक कोने में किसी शंका महसूस होती है तो समाधान के लिये उससे इतनी दूर आने की अपेक्षा कला व्यर्थ है। बाग इतना बड़ा है कि इस तरह की सुविधाएं पांच-छ: स्थानों पर होनी चाहिये मगर सोच ही नहीं तो शौचालय कहां से आयेंगे।
गुलाब बाग के मुकाबले यह छोटा सा उद्यान था फिर भी इतनी कुशलता से इसका रख रखाव कर अत्यन्त सुन्दर रूप दिया गया था कि देखते ही बनता था। गुलाब बाग हमारी अमूल्य निधि है फिर भी उसकी उपेक्षा आपराधिक है। कई निजि कम्पनियों को इसके रख रखाव का काम सौंपा जाता है मगर सिवाय अपना अपना बोर्ड लगाने के और कोई काम इनसे नहीं होता।
झरने पर जाने के लिये अलग से टिकट था। वहां तक जाने के लिये रास्ते के बीच बीच में सीढ़ीयां थी। रास्ता लम्बा था, धीरे धीरे चलते हुए झरने के निकट पहुँचे जितने में बहुत थक गया मगर ज्यू ही झरने को देखा सारी थकान मिट गई।
झरने को देखने एक मंच बना हुआ था, यहां पहले से काफी लोग खड़े थे। इस मंच से झरना एकदम सामने दिखाई देता था। पानी बहुत उपर से अत्यन्त वेग से नीचे नदी में गिर रहा था, नदी लगभग 250 फुट नीचे थी, नीचे देखते हुए ही चक्कर आ आते थे। सभी लोग मंच पर झरने के सामने खड़े होकर फोटो ले रहे थे। कई लोग अकेले होते तो वे अन्य दर्शकों से प्रार्थना कर अपने फोटो खिंचवा रहे थे। मंच छोटा था और लोग ज्यादा इसलिये लोग बारी बारी से देखते हुए और फोटो खींचते हुए हटते भी जा रहे थे। यही से एक रास्ता नीचे की तरफ जाता था। सीढीया उतर कर नीचे स्थित नदी तक इस रास्ते से जाया जा सकता था। कई लोग नीचे जा भी रहे थे। यहां एक बात बहुत आश्चर्यजनक लगी, पर्यटकों में भारी संख्या में भारतीय लोग नजर आ रहे थे। यूं भारतीयों की उपस्थिति सर्वत्र दिखाई देती है मगर इतनी बड़ी संख्या में देखने का अवसर यहीं मिला था।
झरने को देखने 4-5 हजार पर्यटक रोज आते हैं। पानी 268 फुट उपर से नीचे स्नोकाल्मी नदी में गिरता है जो बिजली घरों तक जाता है। वर्षा के दिनों में मानी का वेग इतना अधिक होता है कि झरने से उत्पन्न धुन्ध के कारण कुछ नजर नहीं आता। मंच पर खड़े होकर जब झरने को निहार रहे थे तो गिरते पानी के साथ हल्के हल्के बादल इसकी सुन्दरता में अभिवृद्धि कर रहे थे।
झरना, नदी और यह गांव सभी स्नोकाल्मी नाम से जाने जाते हैं। यहां के मूल निवासियों के लिये यह झरना उनकी संस्कृति, विश्वासों और आध्यात्मिकता का केन्द्र बिन्दु है। इनकी मान्यता है कि प्रथम स्त्री व पुरूष इसी झरने में चन्द्रमा द्वारा बनाये गये थे। झरने के गिरने से जो धुन्ध बनती है वह रचियता तक लोगों की प्रार्थनाएं ले जाती है। इस धुन्ध को धरती और स्वर्ग का सम्पर्क माना गया है।
झरना देख कर सभी प्रसन्न थे तभी मुनीश के मस्तक पर चिन्ता की रेखाएं देख सब अचरज में पड़ गए। मुनीश ने बताया कि अभी अभी डेल्टा एयर लाइन्स से ई मेल आया है कि डा. सोढी का सामान उनके साथ नहीं जा पाया है और उसे सीवेटल भेजने की अलग से व्यवस्था की जा रही है। राजा तो उड़ान में था, उसे पता ही नहीं था कि उसका सामान विमान में नहीं चढ़ पाया है। यदि सामान नहीं आया तो 8 दिन का क्रूज वह कैसे कर पायेगा इसी चिन्ता में सब परेशान हो गये।
सामान विमान में नहीं चढने का कारण यह बताया गया था कि डा. सोढी को उड़ान के 45 मिनट पहले चेक इन करना था मगर वे देर से पहुँचे तब तक सारा सामान विमान में चढ़ चुका था, इसलिये उनका सामान अब अलग से भेजा जा रहा है। मुनीश ने वापस मेल कर दिया कि सामान शीघ्र पहुंचना जरूरी है अन्यथा हमारा आगे का क्रूज का कार्यक्रम गड़बड़ हो जायगा।
झरने से हम सीधे घर पर लौटे। दिन भर के निकले हुए थे, भूख भी लग आई थी, कादम्बरी व प्रीति जल्दी से खाना बनाने में जुट गई, मुनीश व मयंक राजा क लेने एयरपोर्ट जाने की तैयारी करने लगे।
Editorial

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