✕
मोहनीय कर्म की तीव्रता से बचने का हो प्रयास
By EditorialPublished on
नन्दनवन (Nandanvan) परिसर में तीर्थंकर समवसरण में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि तीन कर्म बंधनों की चर्चा के उपरान्त चौथे मोहनीय कर्म बंध के संदर्भ में प्रश्न किया गया कि मोहनीय कर्म का बंध कैसे होता है? उत्तर दिया गया कि तीव्र क्रोध, तीव्र मान, तीव्र लोभ, तीव्र मोह और तीव्र माया के कारण मोहनीय कर्म का बंध होता है।

x

मुंबई । नन्दनवन (Nandanvan) परिसर में तीर्थंकर समवसरण में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि तीन कर्म बंधनों की चर्चा के उपरान्त चौथे मोहनीय कर्म बंध के संदर्भ में प्रश्न किया गया कि मोहनीय कर्म का बंध कैसे होता है? उत्तर दिया गया कि तीव्र क्रोध, तीव्र मान, तीव्र लोभ, तीव्र मोह और तीव्र माया के कारण मोहनीय कर्म का बंध होता है। आठ कर्मों में मोहनीय कर्म सबसे मुख्य कर्म है। सभी कर्मों के क्षय के अंत में यह समाप्त होता है। यह चाहे तो साधु को साधना से च्यूत कर दे, यह चाहे तो सामान्य मनुष्य को मिथ्यात्वी बना दे और यह चाहे तो मिथ्यात्वी को पातकी बना दे। साधना में सबसे बड़ा बाधक मोहनीय कर्म है। इसलिए आदमी को क्रोध, अहंकार, माया, लोभ आदि की तीव्रता से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को तीव्र गुस्सा, तीव्र अहंकार, तीव्र लोभ से यथासंभव बचने का प्रयास करे। जहां तक संभव को तीव्र, तीव्रतम और तीव्रतर से बचते हुए मंद, मंदतम और मंदतर बनाने का प्रयास हो। कषाय जितने मंद/क्षीण हों, आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। कषायों के परित्याग से आत्मा का ही नहीं, पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था भी अच्छी बनी रह सकती है। इसके बाद उन्होंने आचार्य कालूगणी द्वारा उदयपुर में आयोजित दीक्षा समारोह के कार्यक्रम की भव्यता, उसकी व्यवस्था का वाचन किया।

Editorial
Next Story
Related News
X
