Pratahkal - Suresh Goyal
कम्प्यूटर का हमारे जन जीवन में इतना जबर्दस्त हस्तक्षेप हो गया है यह दुनिया की नब्ज बन गया है। नब्ज रूकी नहीं कि दुनिया भी थम जाती है। सीयेटल में घूमते घूमते दिन पूरा होने को आ रहा था। अगले दिन हम 8 दिन की समुद्री यात्रा पर निकलने वाले थे। हमारे साथ राजा भी आने वाला था। वह न्यूयार्क से शाम तक पहुँचने वाला था मगर जिस विमान सेवा से उसका टिकिट बुक था, हफ्ते भर से उसकी उड़ानें गड़बड़ चल रही थी।
डेल्टा एयरलाइन्स दुनिया की व्यस्ततम विमान सेवाओं में से एक है। अमेरिका में भी घरेलू उड़ानों में यह दूसरे नम्बर पर है। राजा इसी विमान से आ रहा था मगर सवाल यह था कि उसकी उहान आ पायेगी भी कि नहीं। 5 दिन पहले, यानि 8 अन को डेल्टा के कम्प्यूटर उप्प हो गये। सिस्टम के अन्दर के सारे डेटा गड़बड़ हो गये। डेल्टा की 6 हजार उड़ानें थम गई। दुनिया के कई देशों में, जहां जहां भी डेल्टा चलती है, सब जगह यात्री हवाई अड्डों पर तपस्या तापने को गये। पूरे अमेरिका में त्राहि त्राहि मच गई। डेल्टा के पास न तो कोई जवाब था, न ही कोई समाधान।
यह घटना अभूतपूर्व नहीं थी, इससे पहले अमरीकी एयर लाइन्स और साउथ वेस्ट एयर लाइन्स भी इस तरह की परेशानी झेल चुके हैं मगर डेल्टा की समस्या का जो विकराल रूप था वो उन्होंने अनुभूत नहीं किया था। डेल्टा के तमाम इन्जीनीयर और विशेषज्ञ डेटा रिस्टोरेशन में जुट गये। जब तक डेटा वापस नहीं आयेंगे पता कैसे चलेगा कि कौन कहां से उड़ रहा है। अन्य तमाम तकनीकी बारीकिया भी कम्प्यूटर पर निर्भर थी।
यह घटना तो महज एक एयर लाइन्स के साथ हुई जिससे इतनी उथल पुथल मच गई। सोची, इसी तरह की गड़बड़ी अत्यन्त व्यापक स्तर पर हो जाये तो दुनिया का क्या होगा। इस घटना से डेल्टा की साख को जबर्दस्त बट्टा लगा हजारों यात्रियों के आगे से आगे के कार्यक्रम रद्द हो गये जिनसे अन्य हजारों-लाखों लोग प्रभावित हो गये। डेल्टा ने साख बचाने हर प्रभावित यात्री को 200 डालर के वाउचर देने की घोषणा की मगर इससे क्या होता है, लोगों के तो लाखों का नुकसान हो गया था, इससे वह मुकदमों से बच नहीं पाई।
एक दिन निकल गया और 6 हजार में से सिर्फ 1600 उड़ानों के आंकड़े पुनः तलाशे जा सके। जैसे तैसे ये उड़ानें शुरू हुई। यात्री हवाई अड्डों पर अपना सामान लिये पड़े रहे। अमेरिका के हर हवाई अड्डे पर कमोबेश यही दृश्य था। एक एक दिन गुजरने के साथ उड़ानों की संख्या बढ़ती गई। 12 अग. तक लगभग सभी उठाने वापस शुरू हो गई हालांकि समय की पाबन्दी की अनिश्चितता अभी भी बनी हुई थी। राजा की उड़ान 13 तारीख को थी हम सब यही आशा कर रहे थे कि उसका विमान आ जाये, चाहे कितनी भी देरी क्यूं न हो जाए। यदि नहीं आ पाया तो जलपोत उसके लिये रूकेगा नहीं।
इन्हीं चिन्ताओं में डूबते-उतराते हम एक पहाड़ी पर पहुँचे। यहां एक से एक आलीशान मकान बने हुए थे। यह बहुत मंहगी कोलोनी प्रतीत हो रही थी। यहां की खासियत यह थी कि इस स्थान से समुद्र का अत्यन्त सुन्दर दृश्य दिखाई देता था। मकानों के सामने एक बड़ा सा सार्वजनिक पार्क बना दिया गया था। यहां बेन्चें लगी हुई थी। लोग इन बेन्चों पर बैठ कर समुद्र के विहंगम दृश्य का रसपान करते रहते
ज्यू ही हम इस पहाड़ी पर पहुँचे सामने समुद्र का दृश्य देख कर हम चकित रह गये। मैं तो आदत के अनुसार वापस उदयपुर के खयालों में पहुँच गया। उदयपुर में भी पीछोला झील के आसपास स्थित सिसारमा की पहाड़ियों से पीछोल • फतहसागर झील का ऐसा विहंगम दृश्य दिखाई देता है कि एक क्षण के लिए स्वर्ग में पहुँच गये हो। इन पहाड़ियों पर जंगलात विभाग का कब्जा है और ये कि को हाथ तक धरने नहीं देते। यदि सरकार इन पहाड़ियों को लेकर यहां पर्यटन क विकसित कर दे तो यह उदयपुर का एक प्रमुख आकर्षण बन जाये। आसपास की जो वनवासियों और किसानों की जमीनें व पहाड़ियां थीं वे जरूर कुछ लोगों ने खरीद कर वहां अपने मकान और होटल विकसित कर लिये है मगर आम पर्यटक को इनसे कोई लाभ नहीं। दरअसल राजा-महाराजाओं द्वारा जो विरासत एवं प्राकृतिक स्थल विकसित कर छोड़े गए हैं उसी से हम कमा खा रहे हैं। पिछले 70 सालों में दुनिया भर में नये से नये पर्यटन स्थल विकसित हो गये, वहां न कोई विरासत है न इतिहास, फिर भी पर्यटकों का वहा हूजूम उमड़ता है मगर हम नये स्थल बनाने तो दूर जो प्राचीन स्थल हमें मिले उन्हें तक संवार नहीं सके।
यहां पार्किंग की कोई समस्या नहीं थी। पार्क व कोलोनी के बीच एक सड़क थी, वहीं गाड़ी खड़ी कर दी। पार्क में पहुँचे तो सामने ही एक आये। हमने सोचा शायद शादी की कोई पार्टी हो रही दिखती है मगर पास आये तो पता चला कि उनकी फोटोग्राफी चल रही है। आजकल शादी से पूर्व ही दुल्हा- दुल्हन की प्री वेडिंग एल्बम तैयार हो जाती है, शायद उसी सिलसिले में फोटू खिचा रहे थे।
सियेटल चूंकि पश्चिमी छोर पर प्रशान्त महासागर के किनारे अवस्थित है इसलिये यहां सूर्यास्त का दृश्य अत्यन्त सुन्दर दिखाई देता है। यह पार्क एक तरह का सनसेट पोइन्ट था। अभी तो दिन का भरपूर उजाला था, यहां सूर्यास्त 9 बजे तक होता है। हम लोग भी बेन्चों पर बैठकर समुद्र का आनन्द लेने लगे। एक तरफ समुद्र था तो पहाड़ी की दूसरी ओर डाउन टाउन इलाके की घनी बस्ती। दुल्हा- दुल्हन फोटू खिंचा कर कब चले गये पता ही नहीं चला।
पार्क में कुछ बच्चों को टेबल कुर्सी लगाते देखा तो मैं अचरज में पड़ गया। दरअसल ये बच्चे सामने की कोलोनी में ही रहते थे। ये अपने घर से शरबत या लेमनेड बनाकर लाये थे। लेमनेड एक जंग में भरा हुआ था, टेबल पर उन्होंने छोटी छोटी गिलासें रख दी। इन्हें देख कर कुछ पर्यटक उनके पास गये और पैसे देकर उनसे यह शरबत खरीदने लगे।
अमेरिका में उच्च वर्ग की कोलोनियों में अक्सर इस तरह के दृश्य देखे जा है।बच्चों का एक तरह से यह खेल और टाईम पास हो जाता है। बच्चे इस की दुकानें घर से ही सामान लाकर लगा लेते हैं। लेमनेड के साथ गोली, निष्ट चाकलेट आदि भी रखते हैं। लोग इन्हें प्रोत्साहित करने के लिये ग्राहक कर इनके पास जाते हैं, मोल भाव करते हैं और सामान खरीदते हैं। बच्चे भी है और खरीददार भी उनकी खुशी देखकर खुश होते हैं। मुनीश भी इन बच्चों के पास गया और तीन चार गिलास लेमनेड देने को कहा। एक गिलास आधा में दे रहे थे। बच्चों को कमाई से कोई मतलब नहीं होता, यह सब करने में जो उनकी कमाई होती है।
Editorial

Editorial

Next Story