Pratahkal - Lekh Update - Government and opposition got a chance
विजय त्रिवेदी
मणिपुर (Manipur) में हिंसा को लेकर नाराज विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की मंजूरी लोकसभा (Loksabha) अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) ने दे दी है। इस आदेश के साथ ही पांच साल पहले का वह दिन 20 जुलाई, 2018 याद आ गया, जब मोदी सरकार (Modi Government) के कार्यकाल में पहले अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी सदन में सामने बैठे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झप्पी देने पहुंच गए थे। उनके इस व्यवहार से सदन चौंक सा गया था और झप्पी देने के बाद लौटते हुए उन्होंने अपने सबसे करीबी मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया को मजाक में आंख मारी थी। तब की लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उनके इस आचरण को उचित नहीं माना था। जो लोग कुछ देर पहले मोदी से झप्पी को बड़ा राजनीतिक करतब समझ रहे थे, वे भी राहुल गांधी के आंख मारने से हैरान हो गए थे । खैर, वह अविश्वास प्रस्ताव गिर गया था और प्रधानमंत्री मोदी ने तंज में कहा था कि मुझे उम्मीद है, आप 2023 में भी मेरी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे। उनका इशारा था कि 2019 के चुनाव में वह फिर से सत्ता में लौटने वाले हैं। इस बार भी अविश्वास प्रस्ताव पर यदि मतदान होता है, तो सरकार को कोई खतरा नहीं है, पर इस बार की बहस में सदन में राहुल गांधी नहीं होंगे, उनकी सदस्यता समाप्त हो गई है। उनके मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया इस बार प्रधानमंत्री मोदी
(PM Modi)
के पीछे बैठे होंगे। तब लोकसभा में नेता रहे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अब राज्यसभा में होने से चर्चा में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। पिछली बार प्रस्ताव टीडीपी ने रखा था, क्या इस बार वह भी सरकार के खिलाफ जाएगी?
संविधान के अनुच्छेद 75 ( 3 ) के मुताबिक, मंत्रिमंडल सामूहिक तौर पर लोकसभा के लिए जिम्मेदार होता है और सदन का बहुमत हासिल रहने तक ही वह सरकार में रह सकता है, यानी बिना चुनाव में गए सरकार को गिराने या बाहर करने का ब्रह्मास्त्र अविश्वास प्रस्ताव को माना जा सकता है। पिछले 75 साल में अब तक केवल 27 बार अविश्वास प्रस्ताव सदन में रखे गए, इनमें से केवल दो बार सरकार गिरी है, पहली बार जनता पार्टी की IPL MEN मोरारजी देसाई सरकार 1979 में और दूसरी बार, 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार। पिछली बार 20 जुलाई, 2018 को जो अविश्वास प्रस्ताव राफेल के मसले पर लाया गया था, वह 199 मतों से गिर गया था ।
शुरूआत में अविश्वास प्रस्ताव के लिए सिर्फ 30 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती थी, जिसे बढ़ाकर 50 कर दिया गया । पहली और दूसरी लोकसभा में कोई अविश्वास प्रस्ताव नहीं आया था। तीसरी लोकसभा में 1963 में आचार्य जे बी कृपलानी नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए, जिस पर 40 सांसदों ने 21 घंटे ज्यादा चार दिनों तक लंबी चली बहस में हिस्सा लिया। इस बहस के जवाब में प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि 'अच्छी बहस रही और इसका फायदा भी हुआ। ... मैं निजी तौर पर इस प्रस्ताव और बहस का स्वागत करता हूं और अच्छा होगा कि समय-समय पर ऐसे 'टेस्ट' होते रहें ।' अविश्वास प्रस्ताव पर अब तक की सबसे लंबी बहस लाल बहादुर शास्त्री सरकार के खिलाफ रखे गए अविश्वास प्रस्ताव पर हुई, जो 24 घंटे से ज्यादा चली थी। सबसे ज्यादा कुल 15 अविश्वास प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ रखे गए थे।
अविश्वास प्रस्ताव से पहली बार 1979 में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार गिरी थी । तब नौ घंटे से ज्यादा चर्चा हुई थी और मतदान से पहले देसाई ने इस्तीफा दे दिया और सरकार गिर गई। फिर 1987 में अब तक की सबसे ज्यादा बहुमत वाली राजीव गांधी सरकार के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से गिर गया। सबसे मुश्किल या कम बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव नरसिंह राव सरकार के वक्त गिरा था। 1993 में सीपीएम के अजॉय मुखोपाध्याय के झारखंड मुक्ति मोर्चा घोटाले पर अविश्वास मत को राव सरकार ने सिर्फ 14 वोट से गिरा दिया था। साल 2003 में वाजपेयी सरकार के खिलाफ सोनिया गांधी का अविश्वास प्रस्ताव भी गिर गया था । मनमोहन सिंह सरकार को दस साल में किसी अविश्वास प्रस्ताव का सामना नहीं करना पड़ा।
अब यदि इस अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होता है, तो सरकार के पास 333 वोट हैं, जबकि गैर एनडीए के पास कुल 202 वोट हैं। इनमें से 'इंडिया' के पास 142 वोट और बाकी गैर-एनडीए के 64 वोट हैं। 64 सांसद फिलहाल किसी के साथ नहीं हैं, यानी साफ है, विपक्ष सरकार गिराने की स्थिति में नहीं है और उसका मकसद बहस कराना है। यानी चुनावों से करीब दस महीने पहले सरकार के पास अपने कामकाज का बहीखाता रखने का मौका भी होगा। मानसून सत्र में 30 से ज्यादा विधेयक रखे जाने हैं, जिनमें 21 विधेयक नए हैं। करीब एक सप्ताह का समय बिना चर्चा के बीत गया है, तो बेहतर है कि इस तरह का विमर्श तैयार किया जाए कि सदन में गंभीर और उपयोगी चर्चा हो । मणिपुर में हुई हिंसा पर तो चर्चा होनी ही है, इसके साथ राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा पर भी चर्चा होगी, पर अविश्वास प्रस्ताव में विपक्ष के पास मौका होगा, सरकार की नाकामियों को गिनाने का, बेरोजगारी, महंगाई और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर उसे घेरने का । विपक्ष को अपनी एकजुटता दिखाने का भी मौका मिलेगा। वह बताना चाहेगा कि मोदी सरकार के खिलाफ अब ज्यादातर लोग लामबंद हो गए हैं और 2024 के आम चुनाव में उसे 'वॉक ओवर' नहीं मिलने वाला।
वैसे हो सकता था कि अविश्वास प्रस्ताव की जरूरत नहीं पड़ती, अगर सदन में अहं के टकराव के बजाय मणिपुर और दूसरे मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो जाती । सरकार पहले दिन से चर्चा के लिए तैयार होने की बात करती रही, लेकिन विपक्ष मणिपुर पर विस्तार से और प्रधानमंत्री के बयान के साथ बहस की मांग करता रहा । खैर रात गई, बात गई, अब यह मौका है कि जब चर्चा शुरू हो, तो वह 'इंडिया' बनाम 'एनडीए' जैसे रास्ते पर न भटक जाए। बात इंडिया की हो, भारत की हो, हिन्दुस्तान की हो, नाम कुछ भी रखिए, पर सिर्फ और सिर्फ इस मुल्क की और अवाम की चिंता कीजिए । चुनाव जब होंगे, तब अपने एजेंडा तय कीजिएगा और जनता तय कर देगी कि कौन सही था?

Editorial

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