Pratahkal-Acharya Mahashraman-compassion and kindness towards animals
मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने गुरुवार को कहा कि भगवती सूत्र में कर्मवाद के संदर्भ में बताया गया कि कर्मों का बंध किन कारणों से होता है।
प्राणी अपने जीवन में दुख पाता है और सुख भी पाता है। जिस आदमी का शरीर निरोगी और स्वस्थ है, परिश्रमी है, शरीर में कोई बीमारी न हो, मनोज्ञ और अनुकूल खाद्य पदार्थों की उपलब्धता हो और भी भौतिक अनुकूलताएं उपलब्ध हैं तो मानना चाहिए कि उस व्यक्ति अथवा मनुष्य के सातवेदनीय कर्म का उदय है। सातवेदनीय कर्म का बंध दया और अनुकंपा की भावना से होता है। प्राण, भूत, जीव और सत्व के प्राणियों के प्रति अनुकंपा की भावना, उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देना, किसी की शांति को भंग नहीं करने वाला सातवेदनीय कर्म का बंध करता है। इसके विपरित दुर्बल शरीर, शक्ति का अभाव, बीमारी से ग्रस्त होना असातवेदनीय कर्म के कारण होता है। प्राणी मात्र के प्रति दया की भावना नहीं रखने वाला, उन्हें प्रताड़ित करने अथवा जान से मारने वाला, उनको दुःख देने वाला, उन्हें रुलाने वाला असातवेदनीय कर्म का बंध करता है। इस कर्म के उदय के दौरान वह भौतिक प्रतिकूलताओं को प्राप्त करता है और दुःख भोगता है।
इससे मनुष्य को किसी भी प्राणी मात्र को कष्ट देने से बचने का प्रयास करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने आचार्य तुलसी द्वारा रचित आचार्य कालूगणी की जीवनगाथा ‘कालूयशोविलास’ को आगे बढ़ाया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा ने भी विचार रखे।
आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में जैन विश्व भारती द्वारा आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार समारोह का आयोजन किया गया। इसमें वर्ष 2020 के लिए नरेश शांडिल्य व 2021 के लिए डॉ. हरीश नवल को सम्मानित किया गया। जैन विश्व भारती महामंत्री सलिल लोढ़ा, सिद्धार्थ सुराणा व राजेश चेतन ने विचार रखे।

Editorial

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