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विकल्प की राजनीति का विचित्र चेहरा
By EditorialPublished on
बेंगलुरू (Bangalore) में एकत्र हुए 26 दलों गठबंधन आईएनडीआइए (INDIA) यानी इंडिया अर्थात इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (Indian National Developmental Inclusive Alliance) ने स्वयं को भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाले राजग के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर दिया है।
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राजीव सचान
बेंगलुरू (Bangalore) में एकत्र हुए 26 दलों गठबंधन आईएनडीआइए (INDIA) यानी इंडिया अर्थात इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (Indian National Developmental Inclusive Alliance) ने स्वयं को भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाले राजग के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। बेंगलुरू में यह स्पष्ट हुआ कि इस गठबंधन की कमान कांग्रेस ने अपने हाथ में ले ली है और शायद इसीलिए विपक्षी दलों को एकजुट करने की पहल करने वाले नीतीश कुमार बैठक के बाद होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में नहीं दिखे। लालू यादव भी नहीं दिखे।
एक समय था, जब नीतीश कुमार ने जनता दल यू को लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल के विकल्प के रूप में पेश किया था । यह कहकर कि लालू यादव का राज तो जंगलराज है, लेकिन आज वह न केवल राजद की गोद में हैं, बल्कि उस पर आश्रित भी हैं। यह मेल-मिलाप इसके बाद भी है कि लालू यादव भ्रष्टाचार के कई मामलों में सजायाफ्ता हैं। जो जद-यू और राजद कभी एक-दूसरे के विकल्प थे, वे अब साथ- साथ हैं और अब राजग का विकल्प बनने का दम भर रहे हैं। यह वही जद यू है, जो कभी देश को आरएसएस मुक्त करने की बात किया करता था और फिर भाजपा से जा मिला था। विडंबना केवल यही नहीं ।
जो आम आदमी पार्टी डंके की चोट पर यह कहती थी कि हम किसी का विकल्प नहीं बनेंगे, बल्कि देश में वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने के साथ नई तरह की राजनीति करेंगे, वह आज आईएनडीआइए के तले कांग्रेस समेत उन अनेक दलों के साथ है, जिनके नेताओं को एक समय भ्रष्ट, चोर, बेईमान, परिवारवादी और न जाने क्या- क्या कहती थी। आज आम आदमी पार्टी के नेता लालू यादव समेत इन्हीं सब नेताओं से खुशी-खुशी मिल रहे हैं । यह अजब भी है और गजब भी कि वे भी उनसे मिल गए, जो औरों के लिए कहते थे-सब मिले हुए हैं जी।
आईएनडीआइए में उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी है और इस गठबंधन की मुंबई में होने वाली अगली बैठक में कांग्रेस और शरद पवार की बची-खुची राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी के साथ मेजबानी करती दिख सकती है। शिवसेना ने कभी खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश किया और फिर उसके साथ-साथ एनसीपी से भी लोहा लिया। भाजपा की सहायता से वह इन दोनों दलों का विकल्प भी बनी और सत्ता तक भी पहुंची, लेकिन आज वह कांग्रेस और एनसीपी, दोनों की गोद में है। शिवसेना दावा करती है कि वह हिंदुत्ववादी दल है, लेकिन इससे किसी को आपत्ति नहीं-न कांग्रेस को, न एनसीपी को, न राजद को और न ही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को। इतना ही नहीं, हिंदुत्ववादी भाजपा से लड़ने का दम भरने वाले अन्य अनेक दलों और खासकर द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और यहां तक कि वाम दलों के नेताओं को भी उद्धव ठाकरे साथ मंच साझा करने में कोई संकोच- समस्या नहीं। हैरानी नहीं कि राहुल गांधी का ऐसा कोई बयान आने ही वाला हो कि जिस तरह इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग पूरी तौर पर सेक्युलर है, उसी तरह उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी। बेंगलुरू में आईएनडीआइए की बैठक में ममता बनर्जी को विशेष महत्व मिला। उनकी कुर्सी सोनिया गांधी के बगल में थी । वह कभी कांग्रेस में थीं, लेकिन जब उन्होंने देखा कि बंगाल के कांग्रेसी नेता वाम दलों से न तो मुकाबला कर सकते हैं और न ही ऐसी कोई इच्छा रखते हैं तो उन्होंने अपना अलग दल तृणमूल कांग्रेस बनाया। लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने वाम दलों को सत्ता से उखाड़ फेंका और तृणमूल कांग्रेस को उनके विकल्प के रूप में स्थापित किया, लेकिन आज ममता को कांग्रेस के साथ-साथ वाम दलों के नेताओं संग मंच साझा करने में कोई समस्या नहीं। हालांकि, उन्हें बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों का साथ स्वीकार्य नहीं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व इस आशा में है कि हम सबमें कोई समझबूझ बन जाएगी। बंगाल कांग्रेस के नेता तृणमूल कांग्रेस समर्थकों की हिंसा से त्रस्त्र हैं, लेकिन कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व इस हिंसा पर मौन रहना ही बेहतर समझ रहा है। वह ममता को नाराज करने से बच भी रहा है और डर भी। ममता की आपत्तियों के बाद भी लगता नहीं कि बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों का साथ छूटने-टूटने वाला है। वे यहां मिलकर चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन केरल में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। वास्तव में केरल में कांग्रेस और वाम दल ही एक-दूसरे के विकल्प हैं। क्या कोई यह कह सकने का साहस कर सकता है कि आईएनडीआइए समान विचारधारा वाले दलों का गठजोड़ है? ऐसा कारनामा वही कर सकता है, जो किन्हीं कुतर्कों के जरिये यह सिद्ध करने में सक्षम हो कि वास्तव में 'समान' और 'विपरीत' एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं ? निःसंदेह आईएनडीआइए के पास यह कहने की सुविधा है कि राजग में भी ऐसे दल हैं, जो एक-दूसरे के विरोध में रहे - चुनाव लड़े और फिर उन्होंने आपस में हाथ मिला लिए। इसके उदाहरण भी गिनाए जा सक हैं, जैसे हरियाणा में भाजपा अब जननायक जनता पार्टी के साथ है और मेघालय में अपने खिलाफ चुनाव लड़ने वाली नेशनल पीपुल्स पार्टी के साथ। आईएनडीआइए के पास यह कहने की भी सुविधा है कि भाजपा जिन अजीत पवार को भ्रष्ट बताती थी, वह अब महाराष्ट्र में उसके संग सरकार में हैं, लेकिन क्या इससे 26 दलों वाला आईएनडीआइए 38 दलों वाले एनडीए से प्रभावी और राजनीतिक रूप से सशक्त हो जाता है? यदि कोई ऐसा मान लेता है तो उस पर किसी का वश नहीं, लेकिन विकल्प की ऐसी विचित्र राजनीति देखना दुर्लभ भी है और दयनीय भी ।

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