✕
भीड़ को पिशाच बनने से रोकिए
By EditorialPublished on
कुछ छवियां पूरे राष्ट्र (Nation) की आत्मा को झकझोर देती हैं। एक ऐसी ही छवि थी तीन वर्ष पूर्व पुलिस (Police) अधिकारी डेरेक चाविन की मजबूत पकड़ में सांस लेने के लिए छटपटाते अश्वेत युवक जॉर्ज फ्लायड की, जिसके चलते पूरे अमेरिका में उबाल आ गया था।

x

विभूति नारायण राय
कुछ छवियां पूरे राष्ट्र (Nation) की आत्मा को झकझोर देती हैं। एक ऐसी ही छवि थी तीन वर्ष पूर्व पुलिस (Police) अधिकारी डेरेक चाविन की मजबूत पकड़ में सांस लेने के लिए छटपटाते अश्वेत युवक जॉर्ज फ्लायड की, जिसके चलते पूरे अमेरिका में उबाल आ गया था। अक्सर आलोचना के शिकार सोशल मीडिया (Social Media) को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि वर्चस्ववादी मुख्यधारा चाहते हुए भी अप्रिय सूचनाओं का प्रवाह रोक नहीं पाती। पिछले दिनों ऐसी ही एक छवि भारतीय सोशल मीडिया पर आई और पूरा देश स्तब्ध रह गया । इनमें दो असहाय औरतें निर्वस्त्र घुमाई जा रही हैं और एक हिंसक भीड़ पैशाचिक आनंद के साथ छेड़छाड़ करती उनके पीछे-पीछे चल रही है।
चिंताजनक रूप से शर्मनाक है कि जिस दिन मणिपुर (Manipur) की इन औरतों का वीडियो वायरल हुआ, उससे दो महीने पहले इस वारदात की एक एफआईआर दर्ज हुई थी। जातीय वफादारियों में बुरी तरह से विभक्त मणिपुर प्रशासन व पुलिस अधिकारी इस एफआईआर पर पालथी मारकर बैठे रहे और जब वह विजुअल सामने आया, जिसके फलस्वरूप प्रधानमंत्री, संसद व सर्वोच्च न्यायालय ने गम व गुस्से का इजहार किया, तब जाकर तस्वीरों में कैद कुछ नरपिशाच पकड़े जा सके। याद रहे, वहां डबल इंजन की सरकार है और राज्य को केंद्रीय बलों की भरपूर खेप मिल रही थी, पर अगर एक इंजन का ब्रेक डाउन हो जाए, तो वही सब कुछ होगा, जो मणिपुर में हो रहा है। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, यह वीडियो हफ्तों पहले राष्ट्रीय महिला आयोग के पास भी पहुंच गया था और यह संस्था भी तभी सक्रिय हुई, जब प्रधानमंत्री का भाषण आया और सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया। युद्ध में स्त्री-शरीर विजेता के लिए ढाल का काम करता है। बलात्कार शारीरिक सुख से बढ़कर मनोवैज्ञानिक संतुष्टि का हथियार है। पराजित पक्ष की स्त्री को अपमानित कर पूरे समुदाय को अपमानित किया जाता है। मणिपुर में युद्धरत दोनों समुदाय इस क्षेत्र में होड़ ले रहे हैं। वीडियो में दिख रही दोनों औरतें एक समुदाय के बलवाइयों के हाथों पीड़ित हैं, लेकिन उनके समुदाय के सशस्त्र नौजवानों का एक दूसरा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें वे विरोधी पक्ष की महिलाओं का अपहरण कर उनके साथ यही व्यवहार करने की धमकी देते दिख रहे हैं। मणिपुर में क्षैतिज विभाजन कितना स्पष्ट है, इसका अंदाजा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि बलवाइयों को पुलिस शस्त्रागार से हथियार दिए गए। मैंने आतंकवाद की पराकाष्ठा के दिनों में कश्मीर घाटी में काम किया है। आज से भिन्न उन दिनों यह महसूस किया जा सकता था कि जम्मू-कश्मीर पुलिस का एक धड़ा पाकिस्तान प्रायोजित विद्रोहियों से सहानुभूति रखता है और वहां कभी-कभी शस्त्रागार लूटने की वारदातें तो हुई, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि रक्षकों ने खुद ही शस्त्र आतंकियों को सौंप दिए हों । इंफाल में स्थित सशस्त्र पुलिस बटालियन में पंक्ति में खड़े नागरिकों को हथियार बांटे गए। यहां तक हुआ कि आधार कार्ड जांचकर 'लाभार्थियों' का चयन किया गया। स्वाभाविक था कि मैतेई बहुल पुलिस ने अपने समाज को हथियारबंद किया।
दूसरी तरफ, कुकी नौजवानों के पास भी आधुनिक हथियारों की कमी नहीं है। खबरों के मुताबिक, उनकी आपूर्ति का स्रोत सीमा पार म्यांमार और विभिन्न सुरक्षा बलों से भगोड़े कुकी सैनिक हैं । गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी हालिया यात्रा के दौरान अपील की, तो कुछ हथियार वापस पहुंच गए, पर अब भी काफी उपद्रवियों के पास हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि मणिपुर पुलिस पिछले कई दशकों से पृथकतावादी संगठनों से जूझ रही है और इसके फलस्वरूप इसके पास मौजूद हथियार आधुनिकतम हैं। उनकी रणनीति भी किसी समकालीन सैनिक टुकड़ी की सी है। इसका नमूना मैतेई और कुकी बस्तियों की सीमा पर दोनों जातीय समुदायों द्वारा बनाए गए सुदृढ़ बंकर और वहां से की जाने वाली हिंसक कार्रवाइयां हैं। हिंसा के वर्तमान दौर का फौरी कारण तो उच्च न्यायालय का विवादास्पद निर्णय है, लेकिन जिस तरह इसका विस्फोट हुआ है, उससे स्पष्ट है कि यह बहुत दिनों से शरीर के अंदर इकट्ठा हो रहा मवाद था, जो बाहर निकलने के लिए बेकरार हो रहा था, और जैसे ही मौका मिला, फट पड़ा। इन दोनों समुदायों में कितनी कटुता और अविश्वास है, इसका मुझे व्यक्तिगत अनुभव तब हुआ, जब मैंने हिंदी विश्वविद्यालय में पढ़ चुके मैतेई और कुकी छात्रों से अलग-अलग बातें कीं। एक ही घटना के उनके विवरणों मे इतना फर्क था कि ऐसा लगा, वे अलग-अलग घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं। ऐसे में, फौरन किसी नतीजे पर पहुंचना लगभग असंभव सा लगता है। कुल मिलाकर, यह कहा ही जा सकता है कि स्थिति बड़ी नाजुक है और इससे निपटने में राज्य पुलिस पूरी तरह से असफल हो गई है। ऐसा शायद राज्य के बुरी तरह से विभाजित राजनीतिक नेतृत्व के कारण हुआ है। केंद्र ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक तो बदल दिए, पर सभी जानते हैं कि निर्णायक फैसले मुख्यमंत्री के स्तर पर ही लिए जाते हैं। अब नौबत आ गई है कि नई दिल्ली को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। इस बीच आदिवासी इलाकों और घाटी को अलग राज्यों में विभक्त करने की बात भी उठी है। हमें याद रखना होगा कि सांप्रदायिक आधार पर एक बार विभाजन के लिए हां कहने का मतलब देश भर में इसी तरह की मांगों के लिए तैयार होना होगा। यह एक संवेदनशील मसला है और इसे जरूरी संवेदनशीलता से ही सुलझाया जा सकता है। मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता से छेड़छाड़ का प्रयास बार पहले भी हुआ था, जब कुछ नगा- बहुल इलाकों को इससे काटकर नगालैंड में मिलाने का प्रस्ताव आया था । फलस्वरूप, महीनों तक मणिपुर जलता रहा था। मैतेई और कुकी, दोनों इलाकों में महिला संगठनों, चर्च या संस्कृति क्षेत्र में काम कर रहे गैर-सरकारी संस्थाओं का हमेशा से प्रभाव रहा है। उनको शांति के प्रयासों के लिए सक्रिय करना उपयोगी हो सकता है । अब भी लूटे गए हथियारों की वापसी में उनका बड़ा योगदान रहा है । सबसे जरूरी है कि विभिन्न राजनीतिक दल संकट के समय अपने राजनीतिक हितों को कुछ देर के लिए दरकिनार कर संवेदनशील तरीके से शांति स्थापित करने के उपायों पर मिल-बैठकर गौर करें और सामान्य जिंदगी बहाल करने में मदद करें।

Editorial
Next Story
Related News
X
