✕
Home>
सीयेटल 04 :अमेरिका जैसे धनी देश में भी भूखमरे व बेघर लोग
By EditorialPublished on
मोनो रेल की दोनों तरफ बड़ी बड़ी खिड़कियां है। खिड़की से दूर बैठा पर्यटक भी इनसे बाहर का नजारा अच्छी तरह से देख सकता है। रेल चल पड़ी थी। डाउन टाउन इलाके की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों, बाजारों से होती हुई दस मिनट से भी कम समय में अपने गंतव्य पर पहुँच गई। हम समुद्र किनारे स्थित यहां के प्रसिद्ध पाईक प्लेस मार्केट के इलाके में थे। यहां से पैदल पैदल ही घूमते हुए हम उस मार्केट की तरफ अग्रसर हुए।
_202307252031346040.jpg)
x
मोनो रेल की दोनों तरफ बड़ी बड़ी खिड़कियां है। खिड़की से दूर बैठा पर्यटक भी इनसे बाहर का नजारा अच्छी तरह से देख सकता है। रेल चल पड़ी थी। डाउन टाउन इलाके की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों, बाजारों से होती हुई दस मिनट से भी कम समय में अपने गंतव्य पर पहुँच गई। हम समुद्र किनारे स्थित यहां के प्रसिद्ध पाईक प्लेस मार्केट के इलाके में थे। यहां से पैदल पैदल ही घूमते हुए हम उस मार्केट की तरफ अग्रसर हुए।
रास्ते में एक बड़ा सा चौक नजर आया। यहां टेबलें लगी हुई थीं और लोग ताश खेल रहे थे, शतरंज खेल रहे थे। बच्चों के छोटे मोटे झूले भी लगे थे। आस पास खाने पीने की स्टालें और डिपार्टमेन्ट स्टोर टाईप दुकानें भी थीं। यहां तीन चार आदमियों को सड़क पर बेसुध पड़े देखकर हैरानी हुई। ये नशे में धुत्त थे या हमारे यहां की तरह के गरदुल्ले थे या भिखारी थे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एक आदमी जो सड़क किनारे पड़ा था वह हिल डुल भी रहा था। इसके पास ही कुछ लोगों ने सिक्के भी फेंक रखे थे।
इन लोगों के बारे में जानकारी की तो पता चला कि ये कोई नशेड़ी या गरदुल्ले नहीं थे वरन बेघर लोग थे जिन्हें यहां होमलेस कह कर पुकारा जाता है। अमेरिका भले ही दुनिया का सबसे सम्पन्न और शक्तिशाली देश हो मगर यहां भी अन्य देशों के जैसी भूखमरी और बेकारी की समस्या है ही। एक आंकड़े के अनुसार अमेरिका की आधा प्रतिशत आबादी होमलेस है। 2008 की भयंकर आर्थिक मन्दी के बाद यह समस्या और बढ़ गई व इनकी संख्या भी बढ़ गई।
अमेरिका के बड़े बड़े शहरों में यह समस्या ज्यादा वीभत्स है। इसके लिये सरकार तथा निजि परमार्थ संस्थाओं द्वारा शेल्टर होम्स और सूप किचन खोले हुए हैं। सरकार द्वारा सोशल सिक्यूरिटी की व्यवस्था भी है जिसके तहत गरीबों को मासिक पेन्शन दी जाती हैं, मगर जिसका कोई घर ही नहीं, पता-ठिकाना ही नहीं उस पेन्शन देने कौन कहां जायगा, इसलिये होमलेस लोग इस सुविधा से वंचित रहते हैं। शेल्टर हाउस में भी इन्हें एक रात के लिये पनाह मिल जाती है मगर कोई हर रोज वहां रहना चाहे तो संभव नहीं इसलिये ये लोग बाजारों में, दुकानों के बाहर, चबूतरों पर सो जाते हैं, कचरा पात्र में फेंकी गई झूठन ढूंढ ढूंढ कर अपनी भूख मिटा लेते हैं। कई लोग कारों के नीचे तो कई बड़ी बड़ी बिल्डिंगों के नीचे सोते है।
कई बिल्डिंगों में सीढ़ियों पर भी ये लोग रात बिताते हैं क्यूंकि लिस्ट के वजह से सीढ़ियों का इस्तेमाल नहीं होता। अमेरिका के उस शहरों में पहती है, उन दिनों में इन लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती है। इन दिनों में लोगों के नीचे, कारों के नीचे, कोई कार खुली हो तो उसके अन्दर घुस कर रात बीता देते हैं।
होमलेस लोगों के लिये कई संस्थाओं द्वारा सूप किचन चलाये जाते हैं। यहां इन्हें दोनों समय सूप दिया जाता है। प्रत्येक होमलेस को अपना अपना बर्तन साथ लाना पड़ता है। कई बार यहां खाने की सामग्री भी वितरीत की जाती है। ये संस्थाएं लोगों से दान देने की अपील करती है। कई लोग नकद तो कोई लोग खाद्य स या पका हुआ खाना भी यहां दान करते हैं जो इन बेघरों को वितरीत कर दिया जाता है।
इन बेघर लोगों में महिलाओं की भी संख्या अच्छी खासी होती है। इनके साथ परेशानी यह होती है कि कोई इन्हें गर्भवती करके चला जाता है तो इनकी मुसीबतें और बढ़ जाती है। इतना आधुनिक व समृद्ध देश होने के बावजूद एसी होमलेस गर्भवती महिलाओं की प्रसूति तक की व्यवस्था नहीं। बेघर महिलाओं का यौन शोषण तो आम बात है।
जो देश एक आणविक शक्ति है. दुनिया भर में अरबों डालर सहायता के नाम पर बांटता फिरता है, खरबों डालर अपनी घरेलू व अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पानी की तरह बहाता रहता है, वह अपने ही नागरिकों को छत तक मुहैया नहीं करा सकता, उनके भरपेट भोजन तक की व्यवस्था नहीं कर सकता, यह आश्चर्यजनक ही है।
समस्या बेघरों तक ही सीमित नहीं है। घरों में रहने वाली अमेरिका की 14 प्र.श. आबादी को भी पर्याप्त भोजन नसीब नहीं है। 5-6 प्र.श. आबादी एसी है जिसे भोजन मिलने की निश्चितता नहीं है। अमरीकी सेन्सस के अनुसार वर्ष 2014 में लगभग 5 करोड़ लोग गरीब थे। 2007 में यह संख्या पौने चार करोड़ थी। सभी गरीब अश्वेत या हिस्पेनिक नहीं है, इनमें भी 10 प्र.श. गरीब तो श्वेत समुदाय के हैं। 2 करोड़ अमरीकी तो अत्यन्त गरीबी की हालत में रहते हैं।
यह मुक्त अर्थव्यवस्था की पराकाष्ठा का दुष्परिणाम है या प्रतिभाओं की प्रतिस्पर्धा का मगर सच यह है कि जो ज्यादा योग्य हैं उन्हें नौकरियां मिल जाती हैं। और जो कम योग्य है वे बेकार रहते हैं। मुक्त अर्थव्यवस्था जब तक इन कम योग्य की नियुक्ति के उपाय नहीं करेगी तब तक समाजवाद का विकल्प हमेशा मुँह खडरहेगा।
इन होमलेस भूखमरी को देख थोड़ा मन तो विचलित हो ही गया था मगर अन्दर ही अन्दर कहीं सुकून भी मिल रहा था, यह सोच कर कि अमेरिका जैसे देश का यह हाल है तो भारत क्या बुरा। अमेरिका का ऐसा हाल देख कर बार बार यह भी आ रहा था कि कभी भारत भी अमेरिका जैसा समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र जायगा तो भी भूखमरी और बेकारी की समस्या तो रहनी ही हैं, तब फिर एसी की के क्या मायने?
विचारों के एसी ही उहापोह के बीच हम लोग आगे बढ़े तो अचानक मुझे महसूस हुआ कि हम एक घाटी चढ़ रहे हैं। दोनों तरफ बाजार थे जो घाटी के उपर अवस्थित थे। एक घाटी चढ़कर उतरे तो दूसरी घाटी तैयार थी। उदयपुर भी इसी तरह की घाटियों के उपर बसा है। एक घाटी उतरे नहीं कि सामने ही समुद्र के पानी का अदभुत नजारा दिखाई दिया। उदयपुर की अरावली वाटिका की घाटी उतरते ही जिस तरह अचानक फतहसागर के दर्शन होते हैं बिल्कुल वैसा ही लग रहा था।
समुद्र किनारे दुकानों की श्रृंखला थी, पर्यटकों की रेलमपेल, रंग बिरंगे परिधान, मेले सा दृश्य उपस्थित कर रहे थे। दो तीन घाटियां चढ़ने उतरने और इतना पैदल चलने के कारण मैं थक गया था। यहां एक फोटोग्राफर एकदम पुरानी स्टाईल में फोटो खींच रहा था, उसकी कुर्सी खाली पड़ी थी, मैं उसी पर बैठ विश्राम करने लगा, सोचा कोई उठायेगा तो उठ जाऊंगा।
दैनिक हाट बाजार में हर तरह की वस्तुएं उपलब्ध
थोड़ी देर विश्राम करने के बाद उठने लगा तो फोटोग्राफर कहीं से दौड़ता हुआ आया और फोटो खींचने लगा। मैंने क्षमा मांगते हुए उसे धन्यवाद दिया और बताया कि थक गया था इसलिये कुर्सी पर बैठ गया। वह अवाक हो मेरा मुँह देखता रहा जितने में आगे बढ़ गया।
घाटी से नीचे उतरते ही हम समुद्र किनारे थे। चारों तरफ दुकानें ही दुकानें थी। समुद्र तट पर जाने के लिये एक तरफ रास्ता बना हुआ था। यहां एक सुन्दर उद्यान था और बैठने की प्रचुर मात्रा में बेन्चें लगी हुई थी। सामने चौपाटी थी, एकदम सफेद झक रेत में पर्यटक सूर्य स्नान कर रहे थे तो कोई जल स्नान यहां कुछ देर व्यतीत कर हम वापस बाजार में लौटे। यह यहां का प्रसिद्ध पाईक मार्केट था।
समुद्र किनारे दूर तक अस्थाई दुकानें लगी हुई थी। इन दुकान की वस्तुएं मिलती थी। भीड़ इतनी अधिक थी कि बिना एक दूसरे की बढ़ना मुश्किल था। सीयेटल शहर का यह प्रमुख आकर्षण था। प्रतिदिन 25 से 30 हजार पर्यटक यहां आते हैं। स्थानीय लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्णि मनोरंजन के लिये आते हैं उनकी गिनती अलग है। हमारे यहां साल में एक दृश्य आता है वैसा ही आभास यहां हो रहा था। मगर यहां तो यह मेला हर दिन लगता है।
अस्थाई दुकाने जो हाट बाजार सा रूप लिये थी, एक तरफ थी, सड़क थी और सामने स्थाई भवन थे। इनमें भी तरह तरह की दुकानें थी आदि थे। एक रेस्टोरेन्ट के बाहर बहुत लम्बी कतार देखकर में रेस्टोरेन्ट में एसा क्या है जो लोग यहीं खाने को आतुर है। दरअसल इस रेस्टोरेन्ट के साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। विश्व प्रसिद्ध कॉफी ब्राण्ड स्टार बक्स की शुरू इसी रेस्टोरेन्ट से हुई थी।
लोग इस दुकान में जाकर वहां कॉफी पीकर इतिहास का हिस्सा ब चाहते थे। इस दुकान को आज भी अपने मूल स्वरूप में ही रखा गया है। अन्दर से बाहर निकलने वालों के हाथों में स्टार बक्स के मूल गोल लोगो की छाप लगी हुई थी। सब दुकान के बाहर खड़े होकर सेल्फी ले रहे थे और वाट्स अप कर अपने मित्रों सम्बन्धियों के साथ इस अनुभूति को बांट रहे थे। हमारी एसी कोई दीवानगी नहीं थी इसलिये थोड़ी देर लोगों को देख हम आगे बढ गये और हाट बाजार में घुस गये।
हाट बाजार में दोनों तरफ स्टालें थी, बीच में संकड़ा सा रास्ता था, सभी दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ लगी थी इस कारण आगे बढ़ना तक मुश्किल हो रहा था। हमें कोई खरीददारी तो करनी थी नहीं, थोड़ी देर इस वातावरण का अनुभव करना था। थोड़ा आगे बढे तो दोनों तरफ फूलों की दुकानें। एकदम ताजा, तरह तरह के सुन्दर से सुन्दर फूल। यह फूलों का बहुत बड़ा मार्केट है, फूलों के थोक व्यापारी भी यहाँ से फूल खरीद कर ले जाते हैं। इसी तरह हर तरह के उत्पादों के छोटे छोटे व्यापारी भी अपना सामान यहीं बेचते है। हस्त ढेर सारी वस्तुएं यहां बिक रही थी, एसी आकर्षक कि हर वस्तु खरीदने का जी करता था, मगर कीमतें बहुत ज्यादा थी।
फल, सब्जी, शहद, मछली जैसे ताजा खाद्य के साथ साथ भण्डारित खाद्य की हर तरह की वस्तु यहां बिक रही थी। यहां किसी बड़ी कम्पनी या डिपार्टमेन्टल स्टोर की कोई दुकान नहीं थी। सभी दुकाने खुद मालिकों की ही थी इसलिये यहां दाम अपेक्षाकृत ज्यादा थे। यहीं एक दुकान पर भारतीय खाद्य भी बिकते नजर आये। आचार, पापड़, मसालों के अलावा नमकीन के पेकेट सजे हुए देख अच्छा लगा।
बाजार बहुत लम्बा था, बीच बीच में सामने घाटियों के बाजार से उतरते हुए रास्ते थे, इनके चौराहों पर कई जगह करतब दिखाने वाले प्रदर्शन कर रहे थे, कई जगह लोग गिटार तथा अन्य यन्त्र ले गीत प्रस्तुत कर रहे थे, सामने कपड़ा बिछा रखा था जिस पर आने जाने वाले लोग नोट सिक्के फेंक रहे थे। -
चल चल कर मेरे तो पगों का जैसे पानी निकल गया हो। मेरी यह दशा देख मयंक ने कहा कि वो गाड़ी यहीं ले आता है। गाड़ी काफी दूर पार्क थी, मैंने मना कर दिया और सबको आश्वस्त किया कि में चल लूंगा। धीरे धीरे हम पुनः जिधर से आये उधर ही चल पड़े। वापस मोनो रेल तक जाना था और बीच में दो तीन घाटियां बढ़नी थी। मैंने हिम्मत की और थकान भूल कर वापस घाटी चढने लगा। रास्ते में वही फोटोग्राफर वापस नजर आया। वो मुझे पहचान गया और हाथ हिलाकर मुझे अपने पास बुलाने लगा। इस बार में सड़क की दूसरी तरफ था इसलिये मैंने भी हाथ हिलाकर हाई-फाईव करते हुए अपनी हथेली दिखा अभिवादन कर दिया।
आगे बढ़े तो बाजार के किनारे एक अजीब सी बस नजर आई। बस खुली हुई थी जिसमें कई लोग बैठे थे, आगे से यह नाव की तरह नुकीली थी। दरअसल में यह डक बोट थी। यह जल-थल में चलने वाला उभयचरी वाहन था। पर्यटकों में डक बोट्स बहुत लोकप्रिय हैं। इनमें बैठकर जल और थल, दोनों स्थानों के पर्यटन स्थलों की सैर की जा सकती है।
अमेरिका में जहां जहां झीलें हैं, समुद्र हैं इस तरह की डक बोट्स बहुत चलती है। झीलें तो हमारे उदयपुर में भी हैं मगर इस तरह की डक बोट चलाने का ख्याल किसी को नहीं आया। आगे बढ़े तो इस तरह की डक बोट बसें और नजर आ गई।
वापस उसी चौक से गुजरे जहां बेघर लोग बेसुध पड़े थे। शीघ्र ही मोना का स्टेशन आ गया। यह दो मंजिल उपर था। नीचे सड़क से बड़ी सारी लिफ्ट जाती थी। यहां पहले से लोग खड़े थे। हम भी उनके साथ खड़े हो लिफ्ट आन इन्तजार करने लगे। ज्यू ही लिफ्ट आई, अन्दर के लोग निकले तो मैं अ लगा, प्रीति ने मुझे टोका तो अपनी भूल का अहसास हुआ, में रूक गया और हमा अन्दर जाने पहले जो लोग खड़े थे, उनको अन्दर जाने को कहा, उन्होंने प्रीति का धन्यवाद किया और अन्दर घुस गये। लिफ्ट बड़ी थी इसलिये हमारा भी नम्बर आ ही गया मगर मैं अपनी सौजन्यहीनता के लिये मन ही मन शर्मिन्दा था।
पैदल सड़क पार करते वक्त भी कई बार मुझे राजा और प्रीति ने टोका था। मैं बिना सामने की लाईट देखे सड़क पार करने लगता हू, तुरन्त ये लोग टोक देते तो मुझे अपनी गलती का एहसास होता है और मैं रूक जाता हूं।
वापस उसी मोनो रेल में बैठकर स्पेस नीडल वाले सीयेटल सेन्टर में आये। मयंक गाड़ी लेने चला गया था। हम लोग नीचे उतरें उतरें उतने वह गाड़ी लेकर आ भी गया था। पुनः गाड़ी में बैठे और आगे बढ़े।

Editorial
Next Story
Related News
X
